RIMS-2 Controversy: झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा (भारतीय जनता पार्टी) नेता चंपाई सोरेन ने पहली बार हेमंत सोरेन पर खुलकर हमला बोला है. उन्होंने हेमंत सोरेन सरकार को ‘आदिवासी विरोधी’ करार देते हुए कहा कि सूर्या हांसदा आदिवासी थे, इसलिए उनका फर्जी एनकाउंटर किया गया. उनको मार डाला गया. उन्होंने सूर्या हांसदा के एनकाउंटर पर गंभीर सवाल खड़े किये हैं.

महागठबंधन सरकार आदिवासी विरोधी – चंपाई

चंपाई सोरेन ने राज्य की झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल और वामदलों के महागठबंधन की सरकार को आदिवासी विरोधी बताते हुए, उसकी कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाये हैं. रांची में मंगलवार को अपने आवास पर पत्रकारों को संबोधित करते हुए उन्होंने सरकार पर आदिवासियों के हितों की अनदेखी करने का आरोप लगाया.

RIMS-2 के निर्माण के खिलाफ नहीं – चंपाई सोरेन

चंपाई सोरेन ने कहा कि वे रिम्स-2 के निर्माण के खिलाफ नहीं हैं. उनका विरोध आदिवासी किसानों की जमीन को अनुचित तरीके से लेने के खिलाफ है. पूर्व सीएम ने कहा कि जब स्मार्ट सिटी में सैकड़ों एकड़ जमीन उपलब्ध है, तो सरकार आदिवासियों की जमीन क्यों छीनना चाहती है? स्मार्ट सिटी में अस्पताल बनाने में क्या समस्या है?

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खेती पर निर्भर किसानों को भूमिहीन नहीं किया जा सकता

पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि नगड़ी में किसानों ने पिछले साल तक खेती की थी, लेकिन अब उस जमीन पर तार की बाड़ लगाकर उन्हें जाने से रोक दिया गया है. ग्रामीणों के अनुसार, जमीन का अधिग्रहण नहीं हुआ है. न ही उन्हें कोई नोटिस दिया गया है. इस पर भाजपा नेता ने कहा कि खेती पर निर्भर किसानों को भूमिहीन नहीं किया जा सकता. अगर जमीन का अधिग्रहण हुआ है, तो संबंधित विभाग उसकी जानकारी सार्वजनिक करे.

‘हल जोतो, रोपा रोपो’ आंदोलन में शामिल होंगे सोरेन

चंपाई सोरेन ने नगड़ी के किसानों के आंदोलन का समर्थन करते हुए घोषणा की कि वे 24 अगस्त को ग्रामीणों के ‘हल जोतो, रोपा रोपो’ आंदोलन में शामिल होंगे और रिम्स-2 के लिए प्रस्तावित जमीन पर हल चलायेंगे. उन्होंने कहा कि इस मामले में वर्ष 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून, सीएनटी एक्ट और ग्राम सभा के नियमों का पालन नहीं किया गया है.

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चंपाई सोरेन ने झारखंड आंदोलन के दिनों को किया याद

झारखंड आंदोलन के दिनों को याद करते हुए चंपाई सोरेन ने कहा कि उस दौरान हमारा लक्ष्य झारखंड के आदिवासियों एवं मूलवासियों के अधिकारों की रक्षा करना था, लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज उसी झारखंड में हमें आदिवासियों की जमीन की रक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है. क्या इसी दिन के लिए अलग झारखंड राज्य बना था?

चंपाई सोरेन के सवाल

  • वैधानिक रूप से अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई, तो किसानों को खेती करने से रोकने का आदेश किस आधार पर जारी किया गया?
  • उपजाऊ खेतिहर जमीन पर बाड़ किसके आदेश से लगायी गयी?
  • वो कौन लोग हैं, जो आदिवासियों की जमीन छीनना चाहते हैं, उन्हें बेघर करना चाहते हैं?

नगरी के किसानों ने चंपाई सोरेन से मांगी है मदद

नगड़ी के किसानों ने रविवार को पूर्व सीएम से मुलाकात कर अपने आंदोलन में शामिल होने का न्योता दिया था. किसानों का कहना है कि सरकार उनकी उपजाऊ जमीन पर बिना नोटिस और उचित प्रक्रिया के कब्जा कर रही है, जिसके कारण उनकी आजीविका पर संकट पैदा हो गया है.

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सूर्या हांसदा एनकाउंटर केस की सीबीआई जांच हो

पिछले दिनों गोड्डा में सूर्या हांसदा के एनकाउंटर पर सवाल उठाते हुए पूर्व सीएम चंपाई सोरेन ने सरकार पर तीखा हमला बोला. उन्होंने कहा कि सूर्या आदिवासी था, इसलिए उसको मार दिया. इस मामले की सीबीआई जांच होनी चाहिए. तभी पीड़ित परिवार को न्याय मिल पायेगा.

चंपाई बोले- समाजसेवी था सूर्या हांसदा

सूर्या हांसदा को समाजसेवी बताते हुए उन्होंने कहा कि जो शख्स विस्थापितों के अधिकारों के लिए लड़ रहा था, जिसने आदिवासी समाज की अगली पीढ़ी को शिक्षित बनाने का बीड़ा उठाया था, जो अधिकतर मामलों में बरी हो चुका था, उसका एनकाउंटर करके झारखंड सरकार की ‘कथनी और करनी का सच’ पूरी दुनिया के सामने उजागर कर दिया है.

चंपाई सोरेन ने पूछा- क्या यही अबुआ राज है?

राज्य सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि झारखंड में वीर सिदो-कान्हू के वंशजों पर हूल दिवस के दिन लाठीचार्ज होता है. वीर चांद-भैरव के नाम पर 350 गरीब बच्चों का स्कूल चलाने वाले का एनकाउंटर हो जाता है. बोकारो में आदिवासी समाज की बहू-बेटी से बलात्कार का प्रयास करने वालों को इनाम दिया जाता है, नौकरी दी जाती है. क्या यही अबुआ राज है?

झारखंड में आदिवासियों की स्थिति दयनीय

आदिवासी समाज के गौरवशाली इतिहास को याद करते हुए पूर्व सीएम ने कहा कि वर्ष 1770 में बाबा तिलका मांझी, उसके बाद वीर सिदो-कान्हू, भगवान बिरसा मुंडा, वीर पोटो हो से लेकर आज दिशोम गुरु तक, हमलोग जल-जंगल-जमीन के लिए लड़ते रहे, लेकिन हमारे समाज को क्या मिला? कहने को तो हम इस जमीन के मालिक हैं, लेकिन कड़वा सच यह है कि आज हमलोग राशन कार्ड से मिलने वाले 5 किलो चावल पर निर्भर हैं. उसके इंतजार में बैठे रहते हैं. इस परिस्थिति को बदलना होगा.

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