भक्ति के सुर, वर्षा के गीत और प्रेम की छवि… कहानी राग वृंदावनी सारंग की, जिससे धरती पर उतर आए ‘भगवान’ – Raag Vrindavani Sarang The Monsoon Melody of Vrindavan and love of radha krishna ntcpvp


महीना अगस्त का है, मौसम बारिश का, मथुरा-वृंदावन में जन्माष्टमी के बाद से उपजा उल्लास है और तिथियां भादों की हैं. भारतीय शास्त्रीय संगीत की राग पद्धति में यह समय सबसे अधिक अनुकूल है वर्षा से जुड़े रागों के लिए. वह राग जिनमें भक्ति भी शृंगार का रूप धरकर भक्तों के हृदय में प्रेम के साथ प्रकट होती है. जहां आराध्य भी सखा हो जाते हैं. जिनमें मन के सारे दोष-सारा मैल मिट जाता है और फिर इस तरह से शुद्ध हुआ हृदय भक्ति के लिए, ईश्वरीय तत्व से मिलन के लिए तैयार हो जाता है.

कैसे नाम पड़ा वृंदावनी सारंग?
रागों की परंपरा में मॉनसूनी रागों की लंबी सूची में वैसे तो मल्हार रागों का प्रमुख स्थान है, लेकिन मल्हारी की प्रकृति से अपने आप को सजाते हुए सारंग राग परिवार का एक प्रसिद्ध राग भी है, जिसमें वर्षा की नमी, उमस, तपिश और फिर रची-बसी शीतलता का अहसास भी है. इस राग को उत्तर प्रदेश की कृष्णलीला स्थली में ही प्रकट और सिद्ध किया गया, लिहाजा इसका नाम पड़ा राग वृंदावनी सारंग.

बादशाह अकबर और तानसेन की कथा
16वीं सदी की एक प्रचलित लोक कथा है. बादशाह अकबर ने एक दफा तानसेन से पूछा, तुम्हारे गुरुदेव कौन हैं तन्नाजी (तन्ना, तानसेन के बचपन का नाम)? यह प्रश्न सुनकर तानसेन अपनी गद्दी से उठ खड़े हुए और बड़े सम्मान से सिर झुकाकर कान पकड़ते हुए बोले- वह कृष्णभक्त हरिदास जी महाराज हैं. अकबर ने हरिदास जी को दरबार में बुलाने और उनसे संगीत सुनने की इच्छा जताई.

तानसेन ने कहा- वह मेरी तरह दरबारी गायक नहीं हैं. वह बस भाव भक्ति के भजन गाते हैं. वह भी आप उनसे कहकर नहीं सुन सकते. वो तो बस आप तब सुन सकते हैं, जब वह कभी प्रभु इच्छा से खुद ही भजन करने के लिए गाने बैठ जाएं. अकबर को आश्चर्य हुआ, पहले तो उसने धन-दौलत, सराय, जागीर सब देने की पेशकश की, लेकिन उसकी एक न चली. फिर वह हरिदास बाबा की कुटिया पर जाने के लिए तैयार हो गया.

राग वृंदावानी सरंग

जब तानसेन की गलती सुधारने के लिए स्वामी हरिदास ने गाया भजन
वहां पहुंचकर बादशाह अकबर ने कई दिन प्रतीक्षा की लेकिन बाबा ने कोई भजन नहीं गाया. फिर कहते हैं कि तानसेन ने जानबूझ कर एक दिन दोपहर के समय बाबा के सामने गलत तरीके से भजन गाया. तब बाबा हरिदास ने सिर्फ तानसेन की गलती ठीक करने के लिए खुद भजन गाना शुरू किया. उनका संगीत सुनकर ये प्रभाव हुआ कि, आकाश बादलों से घिर गया, बिजली कड़कने लगी, आंधी और बवंडर उठने लगे और अकबर जड़वत हो गया और आखिरी आलाप पहुंचते तक वह बेहोश हो गया.

कहते हैं कि बाबा हरिदास ने उस दिन राग वृंदावनी सारंग को ऐसा सिद्ध स्वरूप देकर गया था कि आकाश से स्वयं श्रीकृष्ण उतर आए थे वृंदावन के एक मंदिर में आज भी वृंदावन स्वामी मूर्ति रूप में विराजमान हैं.

क्या है राग वृंदावनी सारंग का परिचय?
शास्त्रीय संगीत के जानकार और रागों के वर्गीकरण-विश्लेषण के लिए प्रसिद्ध प्रोफेसर हरिश्चंद्र श्रीवास्तव अपनी पुस्तक राग परिचय में ‘वृंदावनी सारंग राग’ में इस राग का बहुत खूबसूरत परिचय देते हैं. वह लिखते हैं कि काफी थाट से जन्मा यह राग औडव-औडव जाति का है. औडव यानि कि इस राग के गायन में गंधार (ग ध्वनि) और धैवत (ध ध्वनि) ये दोनों प्रयोग नहीं की जाती है. जब इस राग का चढ़ाव यानी आरोह होता है तब शुद्ध नि (निषाद स्वर) और जब उतराव होता है तब इसमें (कोमल नि_) प्रयोग किया जाता है.  हालांकि कुछ विद्वान इसे खमाज थाट का राग भी मानते हैं, लेकिन काफी थाट का राग माना जाना ही ठीक है.

इस राग की जो भी रचनाएं और बंदिश हैं, वह अधिकतर राधा-कृष्ण के प्रेम को समर्पित हैं. वर्षा को समर्पित है. वन, नदी, झरने और पक्षियों (चातक, हंस, मयूर) जैसे प्राकृतिक तत्वों का खुलकर प्रयोग किया जाता है. ये सारे तत्व इस राग में प्रेम के आश्रय बन जाते हैं. दूसरी जो खास बात है, वह यह कि राग वृंदावनी सारंग को अधिकतर दोपहर के समय गाया जाता है और महीनों के अनुसार देखें तो जब गर्मी की तपिश अधिक बढ़ जाती है, तब वृंदावनी सारंग गाया जाता है.

उमस और वर्षा का राग है राग वृंदावनी सारंग
इस राग के गायन में जब आलाप-तान शुरुआत से अपने मध्य स्तर तक बढ़ती है तो तपिश बढ़ती जाती है और फिर राग गायन के अंत तक बारिश जैसी संभावना बन जाती है. इसलिए इस राग के गायन का ऋतुकाल वर्षा का ही समय है. हालांकि यह जरूरी नहीं कि राग के गाने से हर बार वर्षा हो ही जाए, लेकिन कहा जाता है कि राग गायन में एक कण और मींड की भी गलती न हो, स्वर पूरी तरह नियमानुसार शुद्ध-शुद्ध लगे और राग को सिद्ध कर लिया गया हो तो जो जरूर वर्षा हो जाती है.

वृंदावनी सारंग में सारंग शब्द अपने आप में कई अर्थ समेटे हुए है. सारंग, भगवान विष्णु के धनुष का नाम है. यह कैलासपति शिव का भी एक नाम है. सारंग हिरण को भी कहते हैं और मोर का भी एक नाम सारंग है. इंद्रधनुष के लिए भी सारंग शब्द का प्रयोग कुछ जगहों पर आया है. जब बादल आकाश में छा रहे होते हैं तो उन्हें भी सारंग कहा जाता है और भगवान विष्णु का भी एक नाम सारंगपाणि है.

श्रीकृष्ण की रासलीलाओं की कथाएं प्रचलित
श्रीकृष्ण की रासलीला की कई कथाएं प्रचलित हैं. इनमें राधा-कृष्ण के प्रेम के साथ उनकी शैतानियां, नटखट बातें भी शामिल हैं. एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि राधाजी श्रीकृष्ण से रूठ गईं. श्रीकृष्ण उस दिन ग्वालबालों के साथ गाय चराने गए. तब जब गोप-गोपिकाओं ने उनसे बंसी बजाने के लिए कहा- तो वह बोले- जबतक राधा नहीं आएगी, बंसी नहीं बजाऊंगा. उधर राधाजी को उस दिन उनकी मां ने घर से निकलने से रोक लगा दी थी. गोपियों ने राधा जी से बहुत बिनती की, कि वह मान जाएं और कृष्ण के पास चलें.

राग वृंदावानी सरंग

कहते हैं कि मां से छिपने के लिए राधाजी ने पुरुषों की तरह कपड़े पहने. पगड़ी पहनी. पीला पटका डाला और तन पर झबला (कुर्ता) पहना. फिर वह खुद को छिपाने के लिए एक गाय नई जन्मी बछिया को उठाकर सीने से लगा लिया और फिर वहां पहुंची जहां कृष्ण थे, लेकिन अब बारी कृष्ण के रूठने की थी. वह वहां मिले ही नहीं, जहां उन्हें होना था. इधर राधाजी बहुत थोड़े समय के लिए आई थीं.

तब उन्होंने कृष्ण की मनुहार करते हुए गाना शुरू किया.

वन वन ढूंढत जाऊं…
कितहूं छिप गए कृष्ण मुरारी

सीस मुकुट अरु कानन कुंडल
वानसधर मनकुनज रनिंग
गिरधारी….

वन-वन ढूंढत जाऊं… इस बंदिश को आप यूट्यूब पर सुन सकते हैं.

https://www.youtube.com/watch?v=DPMXOQCB3QU

यह बंदिश राग वृंदावनी सारंग में ही रची बसी है. हालांकि इस राग का इस लोककथा से कोई सीधा जुड़ाव नहीं है, क्योंकि राग की उत्पत्ति तो बहुत प्राचीन है और इसे शिवजी के कंठ से निकला हुआ भी बताते हैं, लेकिन श्रीकृष्ण की लीलाएं और उनकी लीलाभूमि वृंदावन इस राग को पूर्णता प्रदान करते हैं और सार्थक बनाते हैं. यह भी कहा जाता है कि इस राग को स्वामी हरिदास (तानसेन के गुरु) ने ही विकसित किया था. उन्होंने अपनी सिद्धि से इसे गाकर ऐसा चमत्कार किया था कि उनके गायन को सुनकर खुद भगवान कृष्ण धरती पर आ गए थे. जिन्होंने मथुरा में एक मूर्ति का रूप लिया, जो आज भी वहां देखी जा सकती है.

कई फिल्मों में गाया गया है राग वृंदावनी सारंग
अपनी किताब ‘रागगीरी’ में लेखक शिवेंद्र कुमार सिंर और गिरिजेश कुमार इस बात की ओर भी ध्यान दिलाते हैं कि राग वृंदावनी सारंग फिल्मी गीतों में भी खूब प्रयोग किया गया है. दीपिका पादुकोण की चर्चित फिल्म पद्मावत में उन पर फिल्माया ‘घूमर’ गीत इसी राग पर आधारित है. 1954 में आई फिल्म नागिन का गीत ‘जादूगर सैयां छोड़ो मोरी बंहिया…’ भी  इसी राग में रचा गया था.

1993 में आई फिल्म रुदाली में भी एक गीत है, ‘झूठी-मूठी मितवा आवन बोले’ यह भी वृंदावन सारंग में ही पिरोया गया है. इसके अलावा पुराने दौर की तो कई फिल्मों में वर्षा से जुड़े गीतों में राग वृंदावनी सारंग खूब रचा गया है. यहां तक की हनुमान चालीसा भी इसी राग में गायी गई है. यह राग श्रृंगार रस के साथ रोमांटिक प्रेम को तो जगाता ही है, शुद्ध भाव के साथ भक्ति रस भी ले आता है.

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