ITR: टॉप 10 टैक्सपेयर स्टेट में नहीं रहा अमीर गुजरात, झारखंड से भी हो गया पीछे

ByCrank10

August 22, 2025


Itr: भारत में जब मध्यम वर्ग और करदाताओं की स्थिति पर चर्चा होती है, तो आम धारणा यही होती है कि गुजरात और महाराष्ट्र जैसे औद्योगिक राज्य सबसे आगे होंगे. लेकिन आकलन वर्ष 2024-25 के आयकर रिटर्न के विश्लेषण ने बिल्कुल अलग तस्वीर पेश की है. इन आंकड़ों में यह बताया गया है कि मध्यम वर्ग की असली आय और कर योगदान का पैटर्न हमारी सोच से कहीं अलग है. टैक्स देने के मामले में अमीर गुजरात अब टॉप 10 राज्यों की सूची में नहीं रहा. स्थिति यह हो गई है कि इस मामले में वह झारखंड से भी पीछे हो गया है.

झारखंड ने गुजरात को पछाड़ा

अंग्रेजी के अखबर टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, एक चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया कि झारखंड जैसे अपेक्षाकृत छोटे और बीमारू माने जाने वाले राज्य में 20% करदाताओं ने सालाना 12 लाख रुपये से 50 लाख रुपये के बीच की आय घोषित की है. वहीं दूसरी ओर, गुजरात, जिसे अक्सर समृद्धि और व्यापार का गढ़ कहा जाता है, उसमें यह संख्या मात्र 7% रही. यही नहीं, गुजरात उन टॉप 10 राज्यों की सूची में भी शामिल नहीं हो सका, जहां 25 लाख से 50 लाख रुपये सालाना आय वाले करदाताओं की संख्या सबसे अधिक है. इस श्रेणी में महाराष्ट्र सबसे आगे निकला.

मध्यम वर्ग की आय 7.5 लाख रुपये से कम

विश्लेषण में यह भी सामने आया कि भारत के करदाताओं का सबसे बड़ा हिस्सा उस वर्ग से आता है, जिसकी वार्षिक आय 2.5 लाख रुपये से 7.5 लाख रुपये के बीच है. देश के आधे से अधिक मध्यम वर्गीय लोग इसी श्रेणी में आते हैं. लेकिन इस आय वर्ग से ऊपर उठने वालों की संख्या बेहद कम है. केवल 2.5% करदाता ऐसे हैं, जिनकी आय 25 लाख रुपये सालाना से अधिक है. यह स्पष्ट करता है कि भारत में उच्च-मध्यम आय वर्ग का दायरा बेहद सीमित है और ऊपर चढ़ने की सीढ़ी कठिन है.

महाराष्ट्र टॉप पर, कर्नाटक और तमिलनाडु दूसरे-तीसरे स्थान पर

महाराष्ट्र ने सबसे अधिक योगदान करते हुए लगभग 1.4 लाख करदाताओं ने 25 लाख से 50 लाख रुपये के बीच वार्षिक आय घोषित की. इस मामले में कर्नाटक दूसरे और तमिलनाडु तीसरे स्थान पर रहे. खासतौर पर कर्नाटक ने अपनी मजबूती साबित की, जहां 20% से अधिक करदाता ‘लखपति’ श्रेणी में आते हैं. यानी, सालाना 12 से 50 लाख रुपये तक कमाते हैं. इसके विपरीत गुजरात इस सूची में निचले स्तर पर रहा. हैरानी की बात यह है कि बिहार जैसे राज्य ने भी इस श्रेणी में गुजरात से बेहतर हिस्सेदारी दर्ज की.

दिल्ली में सबसे ज़्यादा करदाता अनुपात

अगर केवल करदाताओं के अनुपात की बात करें, तो दिल्ली पूरे देश में सबसे आगे रही. यहां लगभग 3% आबादी ने आयकर रिटर्न दाखिल किया. दूसरी ओर, महाराष्ट्र ने सबसे ज़्यादा यानी 46 लाख से अधिक कर रिटर्न दाखिल किए. उत्तर प्रदेश भारत का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है. वहां करदाताओं का अनुपात केवल 1.5% रहा. हालांकि, संख्या के मामले में यूपी दूसरे स्थान पर है, लेकिन अनुपात बताता है कि बड़ी आबादी कर दायरे से बाहर है.

गुजरात की स्थिति पर सवाल

गुजरात लंबे समय से भारत की आर्थिक शक्ति और व्यापार केंद्र के रूप में जाना जाता रहा है. लेकिन यहां उच्च आय वर्ग के करदाताओं की संख्या अपेक्षाकृत कम है. यह संकेत हो सकता है कि राज्य का बड़ा हिस्सा अभी भी छोटे और मध्यम स्तर के व्यवसायों पर आधारित है, जिनकी घोषित आय सीमित दायरे में आती है. या फिर यह भी संभावना है कि उच्च आय अर्जित करने वाले लोग पूरी पारदर्शिता से अपनी आय रिपोर्ट नहीं कर रहे. किसी भी स्थिति में, गुजरात का इस सूची में पिछड़ना ध्यान खींचता है.

भारत का असमान मध्यम वर्ग

इन आंकड़ों से भारत के मध्यम वर्ग की असमानता साफ झलकती है. झारखंड और कर्नाटक जैसे राज्य, जिन्हें पारंपरिक रूप से अमीर राज्य नहीं माना जाता, अब उच्च आय वर्ग में अपनी मज़बूत हिस्सेदारी दिखा रहे हैं. वहीं, गुजरात जैसा औद्योगिक महाशक्ति राज्य इस स्तर पर पिछड़ गया है. साथ ही यह भी स्पष्ट है कि अधिकांश मध्यम वर्गीय भारतीय आज भी 7.5 लाख रुपये वार्षिक आय से ऊपर नहीं पहुंच पाते. इसका मतलब यह है कि भारत में ऊपर उठने की राह बेहद संकरी और कठिन है. आर्थिक प्रगति का फायदा अभी भी सीमित वर्ग तक सिमटा हुआ है, जबकि व्यापक स्तर पर मध्यम वर्ग की आय सीमित बनी हुई है.

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झारखंड में उभार

भारत के आयकर रिटर्न से जुड़े ये ताज़ा आंकड़े देश के आर्थिक ढांचे की गहरी सच्चाई सामने लाते हैं. एक ओर महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्य उच्च आय वर्ग के करदाताओं की संख्या में आगे हैं. वहीं, गुजरात और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य इस मामले में पिछड़ते दिखाई देते हैं. झारखंड जैसे राज्यों का उभार इस तथ्य की ओर इशारा करता है कि भारत की आर्थिक तस्वीर बदल रही है और नई जगहों पर आय वृद्धि हो रही है. लेकिन, सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यही है कि भारत का विशाल मध्यम वर्ग अभी भी सीमित आय वाले दायरे में ही फंसा हुआ है.

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