राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार अमेरिका फर्स्ट की बात करते रहे. सुपर पावर को सुपर पावर बनाए रखने के लिए वहां हर कोशिश हो रही है. इस बीच एक नई बात हुई. ट्रंप प्रशासन अब एंटी-अमेरिकन सोच वाले लोगों को देश में एंट्री ही नहीं देगा. लेकिन क्या है एंटी-अमेरिकनिज्म, और क्या इसका मतलब यूएस के खिलाफ होना है? कैसे इमिग्रेशन सर्विस इसकी पड़ताल और पुष्टि करेगी?

क्या है एंटी-अमेरिकनिज्म

इसे समझने से पहले एक बार अमेरिकनिज्म को जान लेते हैं. यह अमेरिका से जुड़ी एक विचारधारा है, जो देशभक्ति से कहीं ऊपर है. इसके मुताबिक, यूएस सबसे अलग है, खास है और उसकी जीवनशैली, उसके नियम-कानून सबसे एडवांस और लोकतांत्रिक हैं. और ड्रीम अमेरिका ही वो ख्वाब है, जो हर काबिल शख्स की आंखों में होना चाहिए. ये सोच अमेरिकियों को नेशनल प्राइड से आगे ले जाते हुए खुद को ग्लोबल लीडर मानने पर जोर देती है.

19वीं सदी की शुरुआत में जब लाखों लोग यूरोप और एशिया से अमेरिका आने लगे तो जोर दिया गया कि वे अंग्रेजी सीखें और लोकल कल्चर अपनाएं. यहीं से शुरू हुआ एंटी-अमेरिकनिज्म.

इसका सीधा मतलब है, अमेरिका और उसके तौर-तरीकों के खिलाफ सोच. कोई भी चीज, जिससे अमेरिकी कल्चर की महक आती हो, उसे खारिज कर देना, या कुछ ऐसा करना, जिससे वो कल्चर या सोच ही खत्म हो जाए. मिसाल के तौर पर नॉर्थ कोरिया को लें तो वहां एंटी-अमेरिकन सोच मिलती है. वहां की लीडरशिप मानती है कि यूएस में जो भी है, वो गलत है, और खत्म करने लायक है.

इमिग्रेशन पर डोनाल्ड ट्रम्प (फोटो- पिक्सबाय)
डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका आने वालों का रास्ता लगातार मुश्किल बना रहे हैं. (Photo- Pixabay)

यह विरोध अलग-अलग तरीकों से सामने आया. मसलन, सोवियत यूनियन के दौर में कम्युनिस्ट देश अमेरिका को दुश्मन मानते. कुछ देश मानते कि अमेरिकी पॉप कल्चर बाकियों की संस्कृति को खराब कर रहा है. देशों के अंदरुनी मामलों में दखलंदाजी ने भी एंटी-अमेरिकन भावनाओं को उकसाया. जैसे, अमेरिका ने ईरान, सऊदी और इराक जैसी जगहों पर दखल दिया. तेल और युद्ध की राजनीति ने वहां लोगों को अमेरिका के खिलाफ उकसा दिया. कई देश मानने लगे कि अमेरिका अपने लालच के लिए जंग थोपता है.

एंटी-अमेरिकन होना वैसे देशद्रोही होना नहीं है, लेकिन ये इमोशन आइडियोलॉजी में न बदल जाए, इसके लिए ट्रंप सरकार एक्शन में आ चुकी है. वो ऐसे सारे लोगों के सोशल मीडिया अकाउंट खंगालेगी जो अमेरिका आना चाहते हैं, और अगर कथित एंटी-अमेरिकनिज्म की भनक भी लगे, तो आवेदन रिजेक्ट हो जाएगा.

वैसे ट्रंप की पॉलिसी में साफ-साफ नहीं बताया गया कि एंटी-अमेरिकनिज्म है क्या. लेकिन इतना जरूर कहा गया कि इसमें वे लोग शामिल हैं जो यहूदी-विरोधी आतंकवाद, यहूदी-विरोधी आतंकी संगठनों और यहूदी-विरोधी विचारधाराओं को सपोर्ट करते हैं. यानी अमेरिका अपने साथ-साथ इजरायल को भी बचाने पर जोर दे रहा है.

मास निर्वासन अमेरिका (फोटो- रायटर)
ट्रंप की नीतियों के हिसाब से लोगों को लगातार डिपोर्ट किया जा रहा है. (Photo- Reuters)

पॉलिसी में 1952 के इमिग्रेशन एंड नेशनलिटी एक्ट (INA) का भी हवाला दिया गया. इसके तहत कुछ लोगों को किसी भी हाल में यूएस की नागरिकता नहीं मिल सकती. जैसे कम्युनिस्ट सोच वाले लोग. या फिर ऐसे लोग, जो अमेरिकी सरकार का आएदिन विरोध करते हैं.

इसके अलावा भी कई लोग आने से पहले ही बाहर किए जा सकते हैं

– USCIS देखेगी कि कहीं आवेदक ने किसी टैरर ग्रुप को सपोर्ट तो नहीं किया.

– ऐसी सोच का समर्थन तो नहीं किया, जो अमेरिका के खिलाफ जाती हों.

– यहूदी विरोधी सोच तो नहीं है, या वैसी गतिविधि तो नहीं.

– क्रिमिनल रिकॉर्ड हो, या जिसका आवेदन कई बार रिजेक्ट हो चुका है.

क्यों हो रहा नई नीति का विरोध

एक्टिविस्ट मान रहे हैं कि किसी के सोशल मीडिया अकाउंट पर क्या लिखा या कहा गया, इस आधार पर उसे एंट्री देने से रोकना गलत है. दरअसल बाकी लोकतांत्रिक देशों की तरह यूएस का फर्स्ट अमेंडमेंट भी लोगों को अपनी बात खुलकर कहने-लिखने का मौका देता है. लेकिन यहां एक पेंच है. अमेरिकी संविधान की ये छूट सिर्फ उनके अपने नागरिकों के लिए है. गैर-नागरिकों यानी अप्रवासी या सिर्फ आवेदन कर रहे लोगों को इसकी उतनी छूट नहीं.

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