ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच युद्ध ने पूरी दुनिया के साथ भारत को भी अच्छा खासा प्रभावित किया है. पेट्रोल और एलपीजी गैस की सप्लाई में कमी से कई जगह हड़कंप की स्थिति है. इसी को लेकर उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले से सामने आई एक तस्वीर ने सरकारी योजनाओं और जमीनी हकीकत के बीच के फर्क को उजागर कर दिया है. यहां एक शख्स को अपने बीमार माता-पिता के लिए गैस सिलेंडर लेने के लिए करीब 9 घंटे तक लाइन में खड़ा रहना पड़ा.

मामला बैंकी ब्लॉक के टिंडोला बरेठी गांव के रहने वाले अरुण कुमार का है, जो पेशे से माली हैं और शाहजहांपुर में काम करते हैं. अरुण अपने परिवार के इकलौते कमाने वाले सदस्य हैं. उनके परिवार में दो स्कूली बेटियां भी हैं, जबकि माता-पिता गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं. उनकी मां को हाल ही में ब्रेन हैमरेज हुआ है और पिता कैंसर से पीड़ित हैं, जिसके चलते दोनों बिस्तर पर हैं.

अरुण ने बताया कि घर में गैस खत्म हो गई थी, जिससे खाना बनाना मुश्किल हो गया था. उन्होंने चार-पांच दिन पहले ही सिलेंडर बुक किया था, लेकिन समय पर डिलीवरी नहीं हो पाई. मजबूरी में उन्हें काम से छुट्टी लेकर गांव आना पड़ा.

उन्होंने बताया कि काम से छुट्टी लेकर 200 किलो मीटर दूर घर आने के बाद वह बुधवार तड़के करीब 3 बजे ही अपने घर से करीब 8 किलोमीटर पैदल चलकर गैस एजेंसी पहुंच गए और लाइन में लग गए. एजेंसी सुबह 10 बजे खुलती है, लेकिन उससे पहले ही वहां लंबी कतार लग चुकी थी. करीब 12 बजे उन्हें सिलेंडर मिल सका.

अरुण का कहना है कि बढ़ती कीमतों और गैस की अनियमित सप्लाई के कारण गरीब परिवारों के लिए रोजमर्रा का खाना बनाना भी चुनौती बन गया है. उन्होंने बताया कि वह महीने में एक बार ही घर आ पाते हैं और उसी दौरान परिवार के लिए जरूरी इंतजाम करते हैं.

एजेंसी के अनुसार मामले के सामने आने के बाद जिला प्रशासन ने भी संज्ञान लिया. जिला पूर्ति अधिकारी राकेश तिवारी ने बताया कि एजेंसी से जानकारी ली गई है और संबंधित उपभोक्ता को उसी दिन गैस सिलेंडर उपलब्ध करा दिया गया. साथ ही उसे एजेंसी का संपर्क नंबर भी दिया गया है, ताकि भविष्य में घर पर ही सिलेंडर की डिलीवरी सुनिश्चित की जा सके.

अरुण ने भी पुष्टि की कि उन्हें सिलेंडर मिल गया है और आगे के लिए व्यवस्था कर दी गई है. हालांकि, यह घटना यह जरूर दिखाती है कि जमीनी स्तर पर अब भी कई लोगों को बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है.

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