Navroz 2026: संघर्षों में भी कायम रहा नवरोज, जानें- 3000 साल पुराने पारसी नववर्ष का इतिहास – Navroz 2026 struggle of parsi community nowruz celebration between iran israel america war tvisu


नौरोज़ 2026: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और पूरी दुनिया में अस्थिरता के बीच नवरोज का त्योहार मनाया जा रहा है. नवरोज पारसी समुदाय का नववर्ष है. पारसियों का इतिहास करीब 3000 साल पुराना बताया जाता है. इस संस्कृति के लोगों ने बीते हजारों साल में कई मुश्किल घड़ियों का सामना किया है. इस धर्म को रोकने, खत्म करने की बहुत साजिशें हुईं, लेकिन नवरोज आज भी बरकरार है. तेहरान जहां मौजूदा हालात बहुत खराब हैं, कांपते हाथों के साथ लोग ‘हफ्त सिन’ सजा रहे हैं. यह नवरोज पर सजाई जाने वाली एक पारंपरिक टेबल है. मुंबई में पारसी अपने मंदिर अगियारी में खास प्रार्थनाएं कर रहे हैं. लंदन, लॉस एंजेलिस और टोरंटो में रहने वाले ईरानी गुलाब जल की बोतलें खोल रहे हैं और मिट्टी के बर्तनों में सब्जेह उगा रहे हैं, जो उनकी परंपराओं के एक हिस्सा है.

नवरोज क्या है?
नवरोज का अर्थ है ‘नया दिन’. सूर्य जब खगोलीय विषुवत रेखा को पार करता है और दिन-रात बराबर हो जाते हैं, तब नवरोज मनाया जाता है. यह कोई चंद्र कैलेंडर या धार्मिक आदेश से तय होने वाला त्योहार नहीं है. बल्कि इसका आगमन पृथ्वी की गति से निर्धारित होता है. ‘हफ्त-सीन’ इसका सबसे प्रमुख हिस्सा है. यह सात खास चीजों से सजी एक पारंपरिक थाल या मेज होती है. इसमें सब्जेह, समनू, सन्जद, सीर, सेब, सुमाक और सिरका जैसी कुछ पारपंरिक चीजों को रखा जाता है. ये सभी चीजें सुख-समृद्धि, प्रेम-सौहार्द और अच्छाई की जीत का प्रतीक मानी जाती हैं. कुछ लोग इनके साथ एक शीशा, मोमबत्तियां, रंगीन अंडे और सुनहरी मछली भी रखते हैं.

कैसे शुरू हुआ नवरोज?
नवरोज का इतिहास प्राचीन धर्म जोरास्ट्रियनिज्म से जुड़ा है, जिसके संस्थापक जरथुस्त्र माने जाते हैं. यह धर्म बौद्ध और यहूदियों से भी पुराना माना जाता है. कहते हैं कि फारस के राजा जमशेद ने पारसी कैलेंडर की स्थापना की थी. 637 ईस्वी में अरबों ने फारस पर कब्जा कर लिया था. इस्लाम धर्म का प्रसार तेजी से बढ़ने लगा और जोरास्ट्रियन लोग अल्पसंख्यक होते चले गए. कुछ लोग धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किए गए. तो कुछ भारत आ गए. और फिर पारसी समुदाय बना. इन्होंने गुजरात में शरण ली और नवरोज को जिंदा रखा. आज दुनिया में जोरास्ट्रियन लोगों की संख्या बहुत कम है.

इजरायल-अमेरिका के संयुक्त हमले में मारे गए ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह खामेनेई ने भी 1979 में इस धर्म और इसके पर्व नवरोज को निशाना बनाया था. उन्होंने इसे मूर्तिपूजा परंपरा कहकर इस्लाम के खिलाफ बताया. हालांकि लोगों ने अपनी परंपरा का त्याग नहीं किया. उन्होंने घरों में छिपकर त्योहार मनाना जारी रखा और आखिरकार सरकार को पीछे हटना पड़ा. ईरान के इन मूल निवासियों ने कठिनाइयों में भी अपनी परंपरा का त्याग नहीं किया. नवरोज आज भी पूरे उत्साह के साथ मनाया जा रहा है.

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