मिडिल ईस्ट में जंग के बीच रुपया में तेजी से गिरावट हावी हुई है. शुक्रवार को डॉलर की तुलना में रुपया 94 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया. चार साल में एक दिन के दौरान रुपये ने सबसे बड़ी गिरावट देखी. रुपया 108 पैसे गिरकर 93.71 पर आ गया, और पहली बार 93 लेवल को पार कर गया.
भारतीय करेंसी के लिए मार्च महीना बेहद परेशानी भरा रहा है, जिसमें भारतीय करेंसी ने महीने की शुरुआत से अबतक 266 पैसे या करीब 2 फीसदी वैल्यू चुकी है, जो हाल के इतिहास में इसकी सबसे बड़ी गिरावट अवधि भी है. अब एक्सपर्ट्स रुपये को लेकर चिंता जाहिर कर रहे हैं और कुछ 100 मार्क तक पहुंचने की आशंका जता रहे हैं.
रुपये की गिरावट पर RBI क्या कर रहा?
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) अराजक गिरावट को रोकने के लिए एक्टिव है और इसमें हस्तक्षेप कर रहा है. केंद्रीय बैंक ने सरकारी बैंकों के माध्यम से डॉलर बेचने के साथ-साथ विदेशी बाजारों में फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट और नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड (NDF) का बड़े पैमाने पर उपयोग किया है. अनुमान है कि करेंसी को सपोर्ट देने के लिए RBI ने मार्च में 15 अरब डॉलर से ज्यादा की बिक्री की है. हालांकि, केंद्रीय बैंक की रणनीति व्यापक मैक्रोइकॉनॉमिक स्थिरता को बनाए रखने के लिए फोकस दिखाई देता है.
इन पांच कारणों से आई रुपये में गिरावट
- विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FII/FPI) ने मार्च महीने में ही भारतीय शेयरों से 8.5 अबर डॉलर (करीब 80,000 करोड़ रुपये) से ज्यादा की निकासी करके डॉलर की ताकत बढ़ा दी है.
- मिडिल ईस्ट में चल रहे संघर्ष के कारण भारतीय कच्चे तेल की कीमत 156 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है, जो अब तक का रिकॉर्ड स्तर है.भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 88% से अधिक आयात करता है, इसलिए इससे राष्ट्रीय आयात बिल में सीधा इजाफा होता है और रुपये पर दबाव दिखाई दिया है.
- ईरान और इजराइल-अमेरिका के बीच पश्चिम एशिया में बढ़ते संकट ने वैश्विक बाजारों को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिससे निवेशक अमेरिकी डॉलर जैसे सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर बढ़ रहे हैं.
- जंग के बीच ऊर्जा की लगातार उच्च लागत और कमजोर व्यापार आंकड़ों के कारण चालू खाता घाटे में भारी वृद्धि का डर पैदा हो गया है, जिससे रुपया में कमजोरी देखी जा रही है.
- भारतीय रिज़र्व बैंक ने विकास प्राथमिकताओं के लिए भंडार को सुरक्षित रखने के लिए बहुत ज्यादा हस्तक्षेप नहीं कर रहा है, जिससे बाज़ार की ताकतों ने रुपये को नीचे धकेलने में मदद की.
क्या होगा असर?
रुपये में गिरावट का देश पर कई निगेटिव इम्पैक्ट होते हैं. आम आदमी के लिए, ईंधन की बढ़ती कीमतों और आयातित इलेक्ट्रॉनिक सामानों की कीमतों में इजाफा हो सकता है. साथ ही महंगाई का खतरा बढ़ जाता है. इंडस्ट्री के लिए कच्चे माल के आयात पर ज्यादा निर्भर मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लाभ मार्जिन में कमी आएगी. जिन कंपनियों के पास विदेशी करेंसी देनदारियों का कोई हेजिंग नहीं है, उनकी बैलेंस शीट पर सीधा असर पड़ेगा.
भारतीय अर्थव्यवस्था के नजरिए से देखें तो बढ़ते व्यापार घाटे और बढ़ती महंगाई के दबाव से RBI द्वारा ब्याज दर में कटौती में देरी होने की संभावना है, जिससे इकोनॉमिक ग्रोथ कम हो सकती है.
100 मार्क पर पहुंचेगा रुपया
शॉर्ट टर्म के हिसाब से रुपया बेहद निराशाजनक प्रदर्शन कर रहा है. करेंसी विशेषज्ञों का अनुमान है कि जब तक पश्चिम एशिया संघर्ष जारी रहेगा और कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ती रहेंगी, रुपये में भारी गिरावट बनी रहेगी. अगर भू-राजनीतिक तनाव में तुरंत कमी नहीं आती है, तो घरेलू मुद्रा डॉलर के मुकाबले 94 से 95 के स्तर तक गिर सकती है. आशंका है कि यह 100 तक भी जा सकती है.
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