एयरस्ट्राइक को मुश्किल से 8 घंटे ही हुए थे, हवा में बारूद की गंध महसूस की जा सकती थी, लेकिन ऐसी तबाही के बाद जहां कभी भीड़, हलचल और आवाजें होती थीं, वहां सन्नाटा पसरा था. डर ने इस जगह को खाली कर दिया था. पुल तक जाने वाली सड़कें सूनी थीं, आसपास के घर बंद पड़े थे, मानो जिंदगी ने खुद को रोक लिया हो और पीछे हट गई हो. मैंने एक दिन पहले वहां पहुंचने की कोशिश की थी, लेकिन देरी, अनिश्चितता और दोबारा हमले के खतरे ने मुझे रोक दिया. सोमवार सुबह मैं आखिरकार मौके पर पहुंचा, पूरी तरह अकेले.

खामोशी बेहद भारी थी. पुल अब पुल नहीं रहा था. वह एक टूटा हुआ ढांचा बन चुका था, लोहे की छड़ें टूटी हड्डियों की तरह बाहर निकली थीं, कंक्रीट के बड़े-बड़े टुकड़े नीचे नदी में बिखरे पड़े थे. वहां किसी इंसान की मौजूदगी न होने से यह तबाही और भी डरावनी लग रही थी,  जैसे सन्नाटे में उसकी आवाज सुनाई दे रही हो. मैंने चारों ओर देखा, न कोई राहत दल, न आम लोग, न कोई पत्रकार. सिर्फ टूटी संरचनाओं से टकराती हवा की आवाज. डर ने वो कर दिखाया था, जो धमाका भी नहीं कर सका, उसने सबको वहां से भगा दिया थात्र

उस पल मैं सिर्फ एक पत्रकार नहीं था, बल्कि इस तबाही के मंजर का एकमात्र चश्मदीद था. मैंने अपना माइक्रोफोन संभाला. एक छोटा सा, जाना-पहचाना सा काम, जिसने मुझे उस कठिन पल में संभाल लिया. भारत में बैठे लोग जल्द ही ये तस्वीरें देखेंगे, लेकिन वे उस खालीपन को महसूस नहीं कर पाएंगे, जो सीने पर बोझ बनकर याद दिलाता है कि सब कुछ कितना नाजुक है. मैंने रिपोर्टिंग शुरू की. मेरी आवाज सन्नाटे को चीरती हुई निकली, स्थिर, लेकिन भीतर कहीं गहराई लिए हुए. मैंने तबाही के पैमाने के बारे में बताया, इस पुल की अहमियत के बारे में बताया.

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कैसे यह दक्षिण लेबनान में लोगों को आपस में जोड़ता था, और इसके टूटने से किसानों का खेतों से, मरीजों का अस्पतालों से और परिवारों का एक-दूसरे से संपर्क टूट गया था. लेकिन इस पेशेवर अंदाज के पीछे एक अनकही सच्चाई थी: अगर कुछ फिर हुआ, तो वहां कोई नहीं था. न भागने के लिए, न मदद के लिए. वक्त जैसे थम गया था. हर दूर की आवाज ज़्यादा तेज लग रही थी. हर पल एक सवाल लेकर आता था, क्या यह सच में खत्म हो गया है?

फिर धीरे-धीरे सन्नाटा टूटने लगा. दूर से कुछ वाहन आते दिखे. स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय पत्रकार, जो यह सुनकर मौके पर पहुंच रहे थे कि कोई वहां पहले से मौजूद है. कैमरे, उपकरण, आवाजें. डर से जकड़ी जगह पर जिंदगी धीरे-धीरे  लौटने लगी. लेकिन तभी आसमान का मिजाज फिर बदल गया. हवाई जहाजों की आवाज ने सन्नाटे को चीर दिया. बातचीत थम गई. एक और हवाई हमला हुआ, सीधे हम पर नहीं, लेकिन इतना करीब कि साफ संदेश मिल जाए: यह खत्म नहीं हुआ है.

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दूर फिर धूल उठी. मैंने उस पल को महसूस किया, सिर्फ एक पत्रकार के तौर पर नहीं, बल्कि एक इंसान के रूप में, जो अनिश्चितता के बीच खड़ा था. ऐसा डर, जो असली था, सामने था और नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था. लेकिन जब यह सुनिश्चित हो गया कि सभी सुरक्षित हैं, तो मैंने वही किया, जिसके लिए वहां गया था. रिपोर्टिंग जारी रखी. बाद में हमारे दर्शकों ने संघर्ष क्षेत्र से रिपोर्ट देखी जिसमें तथ्य थे, उन्होंने टूटा हुआ पुल देखा, उसकी अहमियत समझी, उसका असर जाना.

लेकिन जो उन्होंने नहीं देखा—वह यह था कि सबसे पहले वहां पहुंचने का अनुभव कैसा था. उस सन्नाटे में अकेले खड़े होना कैसा था, जहां समय भी जैसे थम गया हो और फिर भी सच को दुनिया तक पहुंचाने का फैसला लेना. मेरे लिए वह सुबह सिर्फ सबसे पहले रिपोर्ट करने की नहीं थी, बल्कि उस वक्त की कहानी थी, जब मैं वहां अकेले था, जब तक दुनिया धीरे-धीरे वहां पहुंच नहीं गई.

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