नेपाल के नए प्रधानमंत्री बालेन शाह (बालेन्द्र शाह) ने शपथ ग्रहण करते ही एक विवादास्पद फैसला लिया है. उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में राजनीतिक दलों से जुड़े छात्र संगठनों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है. स्कूलों और विश्वविद्यालयों में 60 दिनों के अंदर सभी पार्टी-आबद्ध छात्र यूनियनों की गतिविधियां बंद कर दी जाएंगी. उनकी जगह निर्वाचित ‘स्टूडेंट काउंसिल’ या ‘स्टूडेंट वॉइस’ जैसी संस्थाएं बनाई जाएंगी.

ये फैसला महज एक प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि नेपाल की राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है. लेकिन लोगों को ये बात पच नहीं रही है. क्योंकि बालेन शाह का उदय 2025 के जेन-जी आंदोलन से हुआ था. भ्रष्टाचार, सोशल मीडिया प्रतिबंध और युवा बेरोजगारी के खिलाफ सड़कों पर उतरे लाखों युवाओं ने पारंपरिक पार्टियों को खदेड़ दिया.

रैपर-से-राजनेता बालेन ने इसी युवा गुस्से को वोट में बदलकर काठमांडू के मेयर बनने के बाद अब प्रधानमंत्री पद संभाला. उनकी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) ने 2026 के चुनाव में भारी बहुमत हासिल किया. युवा वोट बालेन की सबसे बड़ी ताकत था. अब वही बालेन छात्र राजनीति पर ताला लगाने जा रहे हैं.

बालेन और उनकी सरकार का तर्क साफ है. छात्र संगठन अब शिक्षा के केंद्र नहीं, राजनीतिक अखाड़े बन चुके हैं. कांग्रेस, UML और माओवादी से जुड़े छात्र यूनियन अक्सर कैंपस में हिंसा, तोड़-फोड़ और वसूली में लिप्त रहते हैं. परीक्षाओं में देरी, शिक्षकों पर हमले और कैंपस में पार्टी झंडे फहराने जैसी घटनाएं आम हो गई थीं.

बालेन का कहना है कि शिक्षा को राजनीति के चंगुल से मुक्त करना जरूरी है. भारत में भी यूपी जैसे राज्य की बात करें तो बहुत कुछ ऐसे ही तर्कों का सहारा लेकर राज्य सरकारों ने दशकों से विश्वविद्यालयों को छात्र राजनीति से वंचित रखा है.

छात्र राजनीति लोकतंत्र की नर्सरी मानी जाती है. भारत हो या नेपाल दोनों ही देशों के टॉप राजनीतिज्ञ  छात्र राजनीति  से आए हुए लोग हैं. दरअसल छात्र राजनीति से ही युवा नेतृत्व तैयार होता है. अगर इसे पूरी तरह बंद कर दिया जाए, तो राजनीति और भी बूढ़ी और अलग-थलग हो जाएगी. छात्र संगठनों में सुधार की जरूरत है न कि पूरी तरह खत्म करने की.

देश में अगर राजनीतिक दलों के जरिए लोकतंत्र पल्लवित और पुष्पित हो रहा है तो उसे छात्र संघों से दूर करना सिवाय राजनीति के और कुछ नहीं कहा जा सकता. ये बात नेपाल के लिए भी उतना ही फिट है जितना भारत में कुछ राज्यों के लिए है. नेपाल निर्वाचित स्टूडेंट काउंसिल का विचार अच्छा है, लेकिन इसे लागू करने में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखना मुश्किल होगा. वरना ऐसा लगेगा कि ये काउंसिल बालेन शाह के लोगों के लिए ही बने हैं.

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बालेन शाह जेन-जी के प्रतीक हैं. उनकी छवि साफ-सुथरी, भ्रष्टाचार-विरोधी और युवा-केंद्रित रही है. लेकिन सत्ता की पहली परीक्षा में उन्होंने वही युवा ताकत, जिसने उन्हें सत्ता सौंपी, उसे सीमित करने की कोशिश की है. यह फैसला लोकतांत्रिक है या नहीं, यह समय बताएगा. लेकिन एक बात तय है कि युवाओं ने बालेन को इसलिए चुना था कि वो पुरानी राजनीति को बदलें, न कि युवा राजनीति को ही खत्म कर दें.

अगर बालेन सफल हुए, तो नेपाल का शिक्षा तंत्र स्वस्थ और राजनीति-मुक्त हो सकता है. लेकिन अगर ये कदम युवाओं की आवाज को दबाने का साधन बना, तो जेन-जी का गुस्सा फिर सड़कों पर उतर सकता है.

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