मिडिल ईस्ट में चलते थे भारत के नोट! क्यों कुवैत, कतर के पास नहीं थी अपनी करेंसी? – indian rupee in gulf countries history why qatar bahrain oman uae kuwait used indian currency tstsd


खाड़ी और मिडिल ईस्ट के देश कभी ब्रिटिश इंडिया का हिस्सा हुआ करते थे. इन्हें भारत का ट्रूशियल स्टेट कहा जाता था. एक तरह से एक तरह से भारत इन देशों का प्रशासनिक हेडक्वार्टर था. ब्रिटिश राज के भारत और पाकिस्तान में विभाजित होने और स्वतंत्रता प्राप्त करने से कुछ महीने पहले, दुबई से लेकर कुवैत तक के खाड़ी राज्य 1 अप्रैल 1947 को भारत से अलग हो गए. फिर भी भारत का प्रभाव कई सालों तक इन देशों में कई मामलों में दिखाई देता रहा.

भारत से अलग होने के बाद भी कई सालों तक यहां भारतीय रुपया चलता था. 1947 से  1966 तक ओमान, यूएई, कतर, बहरीन और कुवैत में भारतीय रुपया चलता था. जबकि, ये देश भारत से अलग हो चुके थे और ब्रिटिश राज के अधीन भी नहीं थे. इनमें से कई देश 1966 तक पूरी तरह से संप्रभु हो चुके थे. तब इन देशों में दीनार और रियाल नहीं चलते थे. इन देशों की आधिकारिक मुद्रा भारतीय रुपया ही थी.

अंग्रेजों से आजादी के बावजूद भी इन देशों ने भारतीय करेंसी को ही चलन में बनाए रखा. क्योंकि, अंग्रेजों के राज में इन देशों में भारतीय रुपये ही चला करते थे. इसलिए जब ये खाड़ी देश भारत से अलग हो गए और अंग्रेजों ने इन्हें आजादी दे दी, फिर भी भारतीय रुपया का इन देशों में रुतबा बना रहा. इन देशों के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ही रुपया छापते थे.

भारतीय रिजर्व बैंक इन देशों के लिए गुलाबी रंग के खास नोट छापते थे. ये जेड वन सीरिज के नाम से छपते थे. सऊदी अरब का अपना टकसाल थे, फिर भी भारतीय रुपये की वैल्यू और रुतबा इतना ज्यादा था कि इसकी पूछ ज्यादा था. तब हज पर जाने वाले लोगों के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ही एचए सीरीज की खास नोट छापता था. इसे तब हज रुपया कहा जाता था.

फिर 1960 के दशक में चीन के साथ युद्ध, फिर पाकिस्तान के साथ युद्ध और आकाल जैसे हालात पैदा होने से भारतीय अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गई और खाड़ी देशों ने जीडीपी गिरने के डर से अपनी करंसी शुरू कर दी और ऐसे 1966 में रुपये की जगह दीनार और रियाल ने ले ली.

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अरब और खाड़ी देशों में 1947 के बाद भी दो दशक तक भारतीय रुपये का रुतबा बने रहने के पीछे कई कारण थे.  ऐसा इसलिए था, क्योंकि एक समय 30 अरब रियासतों पर  ‘ब्रिटिश रेजिडेंट’ शासन करते थे और भारत के साथ-साथ इन देशों की अर्थव्यवस्था का तानाबाना ऐसा बन गया था कि अचानक से रुपया का दामन छोड़ना आसान नहीं था. उस वक्त परिवहन का सबसे आसान साधन ‘ब्रिटिश इंडिया लाइन’ (शिपिंग कंपनी) थी और इन देशों में इसी का बोलबाला था और ऐसी कंपनियां भारतीय रुपये को ही भाव देती थी.

बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जब 1956 की सर्दियों में, द टाइम्स के संवाददाता डेविड होल्डन बहरीन द्वीप पहुंचे, तब भी यह ब्रिटेन के अधीन था, लेकिन भारत से अलग हो चुका था. फिर भी वो खाड़ी क्षेत्र में  जहां भी गए – दुबईअबू धाबी, बहरीन और ओमान, उन्हें भारत की छाप साफ दिखाई दी. तब भी वहां भारतीय रुपये चलते थे.

दुबई और अबू धाबी जैसे शहर ब्रिटिश इंडिया के ट्रूशियल स्टेट कहलाते थे. लंबे समय तक इन पर दिल्ली से शासन हुआ और बॉम्बे प्रेसिडेंसी के ब्रिटिश प्रशासक समुद्री मार्ग से शारजाह, अबू धाबी और आसपास के इलाकों में होने वाले कारोबार की निगरानी की जाती रही. इन देशों में भारतीय रुपया चलने के साथ ही पासपोर्ट भी भारत से ही जारी होते थे. खाड़ी क्षेत्र के विद्वान पॉल रिच के शब्दों में, दुबई, शारजाह, अबू धाबी, यमन और अदन जो अब खाड़ी देशों के इलाके हैं, भारतीय साम्राज्य का अंतिम गढ़ था और सालों तक इसकी झलक दिखाई देती रही.

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