इन दिनों  सूअर का स्पर्म चर्चा में है. इसको लेकर ऐसी बात हो रही है कि इससे एक दुर्लभ और लाइलाज बीमारी का इलाज खोजा गया. यह एक कारगर दवा बनाने में इस्तेमाल हो सकता है. ऐसे में जानते हैं कि आखिर इसका इस्तेमाल किस तरह की दुर्लभ बीमारी के इलाज में किया जा सकता है.

कैंसर के इलाज को लेकर इन दिनों अंधाधुंध तरीके अपनाए जा रहे हैं और नित नए-नए शोध हो रहे हैं.  इसी कड़ी में आंखों के कैंसर का एक अजीबोगरीब इलाज मिलने का शोधकर्ताओं ने दावा किया है. अब सूअर के स्पर्म से इस बीमारी को ठीक किया जा सकेगा.

रेटिनोब्लास्टोमा (आरबी) आंखों के कैंसर का एक खतरनाक रूप है.  यह अक्सर शिशुओं और छोटे बच्चों को प्रभावित करता है.  इसका इलाज करना मुश्किल होता है.  अब एक नए मैथड के जरिए इसके पूर्ण इलाज का दावा किया जा रहा है.

शोधकर्ताओं ने सूअर के एक विशेष अंग से इस दुर्लभ बीमारी का इलाज खोजा है.   आंखों के कैंसर के इलाज का यह एक इफेक्टिव और सुरक्षित तरीका प्रदान कर सकता है. आरबी के इलाज के पारंपरिक तरीके, जैसे कि इंजेक्शन, कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी, अक्सर दर्दनाक होते हैं. इससे दृष्टि हानि और अन्य गंभीर दुष्प्रभाव पैदा हो सकते हैं.

न्यूयॉर्क पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, साइंस एडवांसेज में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि सुअर के सीमेन यानी स्पर्म में मौजूद कोशिकाओं छोड़े गए छोटे वेसिकल, जिन्हें एक्सोसोम के रूप में जाना जाता है, विशिष्ट प्रोटीन की सहायता से जैविक बाधाओं को पार कर सकते हैं, जिससे वे आशाजनक दवा का कैरियर बन जाते हैं.

इस मैथड का टेस्ट करने के लिए, शोध दल ने स्पर्म से प्राप्त एक्सोसोम (एसईवी) को फोलिक एसिड और सीएमजी नैनोजाइम प्रणाली (प्राकृतिक एंजाइम की कॉपी करने वाले तत्व ) के साथ मिलाकर एक आई ड्रॉप बनाया. फोलिक एसिड ट्यूमर कोशिकाओं को टारगेट करता है, जिससे यह प्रणाली स्वस्थ टिश्यू को नुकसान पहुंचाए बिना उन्हें स्वयं नष्ट करने के लिए एक्टिव कर सकता है.

इस बीच, एसईवी अस्थायी रूप से आंख की सुरक्षात्मक परतों को खोल देते हैं, ताकि उपचार के अन्य घटकों को अंदर ले जाया जा सके. ये बूंदें दो मार्गों से आंख में प्रवेश करने में सक्षम थीं – कॉर्निया (सबसे बाहरी परत) और कंजंक्टिवा, या पलक और आंख के बीच की पतली, ट्रांसपेरेंट मेंब्रेन.

अभी चूहों पर इसे टेस्ट किया गया है और शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि आगे मानव परीक्षण शुरू होने से पहले भी इस पर कुछ जरूरी शोध किए जाएंगे. तभी इसका एक सोल्यूशन के तौर पर दवाई के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.

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