पाकिस्तान-अफगानिस्तान का पॉल्यूशन कैसे हिमालय के लिए बन रहा मुसीबत, ब्लैक कार्बन से पिघल रहे ग्लोशियर – Black Carbon Pollution from pakistan afghanisatan Himalayan Glaciers Melting


हिमालय की बर्फीली चोटियां और ग्लेशियर दुनिया के सबसे बड़े ताजे पानी के भंडार हैं, जो भारत, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश और चीन जैसे देशों को नदियों के रूप में पानी देते हैं. लेकिन अब यह क्षेत्र गंभीर संकट की ओर जा रहा है. पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आने वाला ब्लैक कार्बन (काला कार्बन या सूट) हिमालय के ग्लेशियरों को तेजी से पिघला रहा है.

ब्लैक कार्बन एक छोटा कण है जो पूरी तरह से नहीं जलता यानी अधूरा जलने से बनता है – जैसे डीजल वाहनों, ईंट भट्टों, बायोमास (लकड़ी-कूड़ा) जलाने और औद्योगिक धुएं से. यह हवा में उड़कर हिमालय पहुंचता है. बर्फ पर जमा हो जाता है. इससे बर्फ का रंग काला पड़ जाता है, जो सूरज की किरणों को ज्यादा सोख लेता है. बर्फ तेजी से पिघलने लगती है.

ब्लैक कार्बन क्या है और यह हिमालय तक कैसे पहुंचता है?

ब्लैक कार्बन एक शॉर्ट-लिव्ड क्लाइमेट पॉल्यूटेंट है. यह कार्बन डाइऑक्साइड की तरह लंबे समय तक हवा में नहीं रहता, लेकिन इसका गर्म करने का प्रभाव बहुत तेज और खतरनाक है. पाकिस्तान और अफगानिस्तान में ईंट भट्टों, पुरानी डीजल गाड़ियों, घरों में लकड़ी-कोयला जलाने और खुले में कचरा जलाने से बहुत ज्यादा ब्लैक कार्बन निकलता है. प्री-मानसून मौसम में हवा की दिशा इसे इंडो-गंगा मैदान से होते हुए हिमालय की ओर ले जाती है.

ब्लैक कार्बन प्रदूषण, हिमालय के ग्लेशियर पिघल रहे हैं

विश्व बैंक की रिपोर्ट “Glaciers of the Himalayas: Climate Change, Black Carbon and Regional Resilience” के अनुसार, ब्लैक कार्बन जमा होने से हिमालय, हिंदूकुश और काराकोरम के ग्लेशियरों का पिघलना तेज हो रहा है. यह ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव को और बढ़ा देता है. हिमालय के कुछ हिस्सों में ब्लैक कार्बन बर्फ की सतह को 2 से 10 प्रतिशत तक कम चमकदार बना देता है, जिससे सूरज की गर्मी ज्यादा सोखी जाती है. इससे बर्फ के पिघलने का रेट बढ़ जाता है.

नैनीतालः हिमालय की बर्फ की सतह का तापमान बढ़ रहा है

उत्तराखंड के नैनीताल से किए गए एक हालिया अध्ययन में साफ दिखा है कि 2020 से 2023 के बीच हिमालय की बर्फ की सतह का औसत तापमान -7.13 डिग्री सेल्सियस रहा, जबकि 2000-2009 के बीच यह -11.27 डिग्री सेल्सियस था. यानी पिछले 23 सालों में बर्फ की सतह का तापमान करीब 4 डिग्री बढ़ गया है.

इस स्टडी में ब्लैक कार्बन को मुख्य वजह बताया गया है, क्योंकि जहां ब्लैक कार्बन ज्यादा जमा होता है, वहां बर्फ की गहराई कम होती जा रही है. तापमान ज्यादा बढ़ रहा है. यह प्रदूषण पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आने वाले वायु प्रदूषण से सीधे जुड़ा है. हिमालय में ब्लैक कार्बन की मात्रा बढ़ने से ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है. लंबे समय में पानी की कमी हो सकती है.

ब्लैक कार्बन प्रदूषण, हिमालय के ग्लेशियर पिघल रहे हैं

वैज्ञानिक अध्ययन क्या कहते हैं?

ICIMOD (अंतरराष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र) की रिपोर्ट (2025): ब्लैक कार्बन ग्लेशियर पिघलने और मानसून को बिगाड़ने का मुख्य कारण है. यह दक्षिण एशिया में बाढ़ बढ़ा रहा है. कृषि को नुकसान पहुंचा रहा है.

विश्व बैंक रिपोर्ट (2021): ब्लैक कार्बन हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने में 50 प्रतिशत से ज्यादा रोल प्ले कर रहा है. अगर दक्षिण एशिया में ब्लैक कार्बन कम करने की मौजूदा नीतियों को पूरी तरह लागू किया जाए तो जमा होने वाले ब्लैक कार्बन में 23 प्रतिशत कमी आ सकती है. नई नीतियों से और 50 प्रतिशत तक की कमी संभव है.

Yala Glacier स्टडी (नेपाल2021): सेंट्रल हिमालय में प्री-मॉनसून मौसम में ब्लैक कार्बन ग्लेशियर के कुल पिघलने में करीब 39 प्रतिशत योगदान देता है. बर्फ पर जमा ब्लैक कार्बन से चमक 0.8 से 3.8 प्रतिशत तक कम हो जाती है.

लॉरेंस बर्कले राष्ट्रीय प्रयोगशाला अध्ययन (2010): पाकिस्तान-अफगानिस्तान और भारत से आने वाला ब्लैक कार्बन हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने में 30 प्रतिशत या उससे ज्यादा योगदान देता है. कुल बर्फ और बर्फ के कवर में बदलाव का 90 प्रतिशत एरोसॉल से होता है. इसमें ब्लैक कार्बन मुख्य है.

पाकिस्तान के कराकोरम और हिंदूकुश क्षेत्र में भी ब्लैक कार्बन नापे गए. जहां हवा में 2.35 से 4.38 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक ब्लैक कार्बन पाया गया. इससे बर्फ की चमक कम हो रही है. ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहे हैं.

ब्लैक कार्बन प्रदूषण, हिमालय के ग्लेशियर पिघल रहे हैं

हिमालय के पर्यावरण और लोगों पर प्रभाव

ब्लैक कार्बन से ग्लेशियर पिघलने से कई समस्याएं पैदा हो रही हैं. छोटे ग्लेशियर तेजी से गायब हो रहे हैं, जिससे नदियों में पहले ज्यादा पानी आता है. बाढ़ का खतरा है. बाद में पानी कम हो जाता है. गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी नदियां करोड़ों लोगों की लाइफलाइन हैं.

इसके अलावा, हिमालय में जैव विविधता प्रभावित हो रही है. पौधे और जानवरों के लिए तापमान बढ़ना मुश्किल हो रहा है. मॉनसून का पैटर्न भी बिगड़ रहा है, जिससे कृषि प्रभावित होती है. पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आने वाला प्रदूषण न सिर्फ हिमालय बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है.

एक्सपर्टस का कहना है कि ब्लैक कार्बन कम करने के लिए पाकिस्तान, अफगानिस्तान, भारत और नेपाल को मिलकर काम करना होगा. ईंट भट्टों को आधुनिक बनाना, डीजल वाहनों को कम करना, साफ ईंधन (एलपीजी, बिजली) को बढ़ावा देना और खुले में जलाने पर रोक लगाना जरूरी है. अगर ये कदम उठाए जाएं तो ग्लेशियरों का पिघलना कम कर सकते हैं.

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