क्या सच में CSAT से भेदभाव होता है? फिर से चर्चा में UPSC का ये एग्जाम, समझ‍िए व‍िरोध की वजहें – upsc civil service csat exam debate diversity ngix

ByCrank10

April 7, 2026


देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षाओं में से एक सिविल सेवा परीक्षा (CSE) के पैटर्न को लेकर एक बार फिर से बहस छिड़ गई है. भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राज्यसभा सांसद और पूर्व डीजीपी बृज लाल ने संसद में सिविल सेवा योग्यता परीक्षा  (CSAT) को रास्ते की सबसे बड़ी बाधा बताते हुए इसे खत्म करने या इसमें सुधार की मांग उठाई है. उन्होंने कहा कि इस पेपर के कारण चयनित उम्मीदवारों के बीच असंतुलन दिखता है, जहां बड़ी संख्या में इंजीनियरिंग और साइंस के छात्र सफल होते हैं, जबकि आर्ट्स और ह्यूमैनिटीज के अभ्यर्थियों को कठिनाई का सामना करना पड़ता है. लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर CSAT को खत्म करने के पीछे क्या वजह है और इसमें कौन से पेपर शामिल होते हैं?

क्या है CSAT?

संघ लोक सेवा आयोग हर साल सिविल सेवा परीक्षा आयोजित करता है, जिसके जरिए IAS, IPS समेत कई ग्रुप ‘A’ सेवाओं में भर्ती की जाती है. यह परीक्षा तीन चरणों में बांटी गई है-

प्रारंभिक परीक्षा (प्रीलिम्स)
मुख्य परीक्षा (मेन्स)
इंटरव्यू (पर्सनालिटी टेस्ट)

हालांकि, साल 2011 से लागू नए पैटर्न के तहत प्रारंभिक परीक्षा (प्रीलिम्स) में दो पेपर होते हैं-

पहला पेपर GS Paper-I होता है जिसमें जनरल नॉलेज और करेंट अफेयर्स से सवाल पूछे जाते हैं. दूसरा पेपर GS Paper-II (CSAT) का होता है. इसमें भाषा समझ, लॉजिकल रीजनिंग और बेसिक गणित शामिल होता है. CSAT एक क्वालिफाइंग पेपर है, जिसमें उम्मीदवार को कम से कम 33% (66 अंक) लाने जरूरी होता है. CSAT को साल 2011 में लागू किया गया था जब मनमोहन सिंह की सरकार थी और उद्देश्य था कि परीक्षा केवल रटने की क्षमता पर नहीं, बल्कि  एनालिटिकल एबिलिटी पर आधारित हो.

क्यों बढ़ रहा है विवाद?

हालांकि, अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर क्यों इसे लेकर विवाद दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है. उम्मीदवारों का कहना है कि इसका स्तर समय के साथ कठिन होता गया है. इसमें गणित और लॉजिकल सवाल ज्यादा होते हैं. इससे इंजीनियरिंग और साइंस बैकग्राउंड वाले उम्मीदवारों को फायदा मिलता है और हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के उम्मीदवारों को नुकसान होता है.

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आंकड़े भी करते हैं दावे

केंद्र सरकार में मंत्री जितेंद्र सिंह की ओर से दिए गए आंकड़े बताते हैं कि 2017 से 2021 के बीच हर साल सैकड़ों उम्मीदवार साइंस/इंजीनियरिंग बैकग्राउंड से चयनित हुए जबकि ह्यूमैनिटीज बैकग्राउंड के उम्मीदवारों की संख्या काफी कम रही. इसके अलावा साल  2011 में 800 उम्मीदवारों ने अंग्रेजी माध्यम से परीक्षा दी  जबकि केवल 89 हिंदी माध्यम से परीक्षा दी थी. साल 2013 में हिंदी माध्यम के उम्मीदवार लगभग 17% थे जो बाद में घटकर 2–4% तक पहुंच गया था.

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