पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से ठीक पहले मतदाता सूची को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है. ताजा आंकड़ों की मानें तो राज्य की मतदाता सूची में अभी भी लगभग 30 लाख संदिग्ध नाम शामिल हैं. दावा किया जा रहा है कि ये सत्तारूढ़ दल के मतदाता सूची के SIR में बार-बार अड़चनें पैदा करने का नतीजा है.

पश्चिम बंगाल में नवंबर से ही SIR की प्रक्रिया चल रही है. शुरुआत में राज्य की लिस्ट में कुल 7 करोड़ 66 लाख मतदाता थे. आयोग के सूत्रों के मुताबिक, जांच के दौरान करीब डेढ़ करोड़ मतदाता रडार पर आए थे.

इस अभियान के बाद अब तक 63.07 लाख नाम हटाए जा चुके हैं. हटाए गए नामों में पांच श्रेणियों के लोग शामिल थे.

  1. अपने पते पर न रहने वाले
  2. मृत हो चुके (करीब 1.25 लाख)
  3. स्थाई तौर पर शिफ्ट हो चुके
  4. डुप्लिकेट नाम
  5. विदेशी घुसपैठिए

अड़चनों की वजह से 30 लाख ‘संदिग्ध’ वोटरों की एंट्री

रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 60 लाख लोगों ने नाम हटाने के खिलाफ अपील की थी. इनमें से 30 लाख मतदाता सिर्फ इसलिए सूची में शामिल हो गए क्योंकि निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO) स्तर पर समय पर नाम हटाने का आदेश नहीं आया और उनके खिलाफ कोई औपचारिक अपील दाखिल नहीं की गई.

SIR प्रक्रिया से जुड़े सूत्रों का कहना है कि ठोस सबूत न होने या अपील न होने की वजह से ये 30 लाख नाम शामिल हो गए हैं. हालांकि भविष्य में सबूतों के साथ इनके खिलाफ फिर से अपील की जा सकती है.

7 अप्रैल को फ्रीज हुई सूची: 27 लाख नाम अब भी लंबित

चुनाव आयोग के आंकड़ों के हिसाब से करीब 27 लाख अपीलों पर फैसला अभी भी लंबित है. हालांकि, इन मामलों में प्राधिकरण सबूतों के आधार पर फैसला लेता रहेगा, लेकिन 7 अप्रैल की रात को मतदाता सूची ‘फ्रीज’ होने के कारण ये लोग आगामी विधानसभा चुनाव में मतदान नहीं कर पाएंगे.

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प्रक्रिया में चुनौतियां

सूत्रों का कहना है कि दूसरे राज्यों के मुकाबले में पश्चिम बंगाल में SIR  की राह में शुरुआत से ही रोड़े अटकाए गए. कुल मतदाताओं में से सिर्फ 4 करोड़ मतदाताओं ने ही अपने गणना पत्र पर साइन करके वापस किए हैं. अब चुनाव की पारदर्शिता को लेकर राजनीतिक गलियारों में बहस तेज हो गई है. क्योंकि एक बड़ी संख्या में संदिग्ध नामों का सूची में बने रहना चुनावी परिणामों पर असर डाल सकता है.

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