टाइप नहीं कर पाए तो बाबू से बने चपरासी… सरकारी नौकरी में टाइपिंग कितना जरूरी? – How important is typing in a government job Kanpur case demote three babu ngix


कानपुर से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने सरकारी कार्यालयों की कड़ाई और नियमों पर एक नई बहस छिड़ गई है. यहां तीन जूनियर क्लर्क (बाबू) का इसलिए डिमोशन कर दिया गया क्योंकि नियमों के मुताबिक वे एक मिनट में 25 शब्द टाइप नहीं कर सकें. उन्हें बाबू से चपरासी बना दिया गया है. यह घटना न सिर्फ कर्मचारियों के लिए चिंता का विषय बनी है, बल्कि आम जनता के बीच भी सरकारी सेवा में आवश्यक स्किल और नियमों को उजागर कर रही है.

सरकारी नौकरी में कब जरूरी होता है टाइपिंग टेस्ट?

बता दें कि क्लर्क, स्टेनोग्राफर और पीए जैसे पोस्ट में हमेशा ही टाइपिंग टेस्ट होते हैं. ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उम्मीदवार कार्यालय में डॉक्यूमेंट को कंप्यूटर पर तेजी से टाइप कर सकते हैं. कई भर्ती प्रक्रियाओं में लिखित परीक्षा के बाद टाइपिंग टेस्ट या स्किल परीक्षण होता है और इसे क्वालिफाइंग (पास/फेल) माना जाता है. UPPSC RO/ARO में 25 शब्द प्रति मिनट की हिंदी टाइपिंग स्पीड टेस्ट क्वालिफाइंग है और इसके बिना चयन नहीं होता है. इसका साफ मतलब है कि अगर किसी आधिकारिक नोटिफिकेशन में टाइपिंग जरूरी बताया गया है, तो उम्मीदवार को वो मानदंड पूरा करना होता है.

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क्या सभी सरकारी नौकरी में होती है जरूरत?

हालांकि, गौर करने वाली बात यह है कि सभी सरकारी नौकरी में टाइपिंग की जरूरत नहीं होती है. तकनीकी, इंजीनियरिंग, पुलिस, शिक्षण, प्रशासनिक लेखा‑जोखा जैसे नौकरियों में टाइपिंग टेस्ट जरूरी नहीं होता. क्लर्क, डेटा एंट्री ऑपरेटर, स्टेनोग्राफर, PA, RO/ARO जैसे पदों में टाइपिंग या कंप्यूटर टेस्ट लिया जाता है .

पहले मिला था सुधार का मौका

बता दें कि कानपुर केस में जब साल 2024 में पहली बार ये टेस्ट लिया गया था तो, तीनों कर्मचारी फेल हो गए थे लेकिन उन्हें सुधार का दूसरा मौका दिया गया था और जब 2025 में दोबारा इसका आयोजन किया गया तो, इस बार भी नतीजा पहले वाला ही था, जिसके बाद ये फैसला लिया गया.

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