अमेरिका-इजरायल और ईरान की 40 दिनों से चल रही जंग रुकवाने का क्रेडिट डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान को दिया है. ट्रंप ने कहा कि पाकिस्तानी पीएम शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ आसिम मुनीर के अनुरोध के बाद सीजफायर पर सहमति बनी है. इस बीच पाकिस्तानी पत्रकार हामिद मीर ने इस पूरे सीजफायर की प्रक्रिया में पाकिस्तान की भूमिका पर बात की है.
पाकिस्तानी पत्रकार हामिद मीर ने बुधवार को कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह के युद्धविराम की कोशिशों में पाकिस्तान की भूमिका एक प्रत्यक्ष मध्यस्थ की नहीं बल्कि एक सहायक की थी.
इंडिया टुडे को दिए इंटरव्यू में मीर ने कहा कि अमेरिका-ईरान तनाव कम करने में पाकिस्तान के योगदान को कई पक्षों ने स्वीकार किया, जिनमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी नेतृत्व भी शामिल हैं.
हालांकि, इस दौरान उन्होंने मध्यस्थता और सहायक की भूमिका के बीच के स्पष्ट अंतर को बताया. उन्होंने कहा कि इस युद्ध में दो-तीन पक्ष थे. एक तरफ अमेरिका और इजराइल थे, दूसरी तरफ ईरान था. फिर कुछ खाड़ी देश भी अमेरिका और इजयराल के साथ जुड़ गए क्योंकि ईरान जवाबी कार्रवाई में इन देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर हमला कर रहा था.
मीर ने कहा कि पाकिस्तान को कूटनीतिक सीमाओं की वजह से पूर्ण मध्यस्थ नहीं माना जा सकता. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के इजरायल के साथ कूटनीतिक संबंध नहीं हैं जबकि एक मध्यस्थ के पास सभी पक्षों तक पहुंच होनी चाहिए. पाकिस्तान की पहुंच सीमित थी. उसकी केवल अमेरिका और ईरान तक ही पहुंच थी. मेरा मानना है कि पाकिस्तान एक सहायक की भूमिका निभा रहा था. यह एक शांति पहल थी.
मीर के मुताबिक, 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमले के बाद पाकिस्तान ने तुंरत संपर्क साधना शुरू कर दिया था. उन्होंने कहा कि यह पहल वास्तव में एक मार्च को युद्ध शुरू होते ही शुरू हो गई थी. हमारे उपप्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने दोनों पक्षों से संपर्क किया. उन्होंने ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची को फोन किया और अमेरिकी प्रशासन से भी बात की. उन्होंने सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों से भी संपर्क किया.
मीर ने कहा कि शुरुआत में पाकिस्तान केवल ईरान और सऊदी अरब के बीच संवाद का एक माध्यम बनाने की कोशिश कर रहा था, क्योंकि पाकिस्तान का सऊदी अरब के साथ प्रत्यक्ष रक्षा सहयोग समझौता है.
उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने ईरान से कहा था कि कृपया सऊदी अरब पर हमला न करें, क्योंकि हमारा उनके साथ रक्षा सहयोग समझौता है इसलिए ऐसी स्थिति न पैदा करें जिसमें हमें ऐसे फैसले लेने पड़ें जो आपको पसंद न हों.
मीर ने कहा कि लेकिन जैसे-जैसे हालात बिगड़ते गए, पाकिस्तान की भूमिका भी बदलती गई. उन्होंने कहा कि धीरे-धीरे तुर्की भी इसमें शामिल हो गया और फिर पाकिस्तान को एक सहायक की भूमिका अपनानी पड़ी. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पाकिस्तान की भूमिका औपचारिक वार्ताकार की नहीं, बल्कि एक ब्रिज की थी.यह एक शांति पहल थी. इस तरह पाकिस्तान ने सीधे युद्धविराम की मध्यस्थता करने के बजाय अमेरिका और ईरान के बीच संवाद स्थापित करने में मदद की.
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