ईरान और अमेरिका के बीच जारी जंग पर फिलहाल विराम लग गया है. दोनों देश अगले 15 दिनों के लिए सशर्त सीजफायर पर सहमत हुए हैं. लेकिन इस युद्ध की पटकथा करीब 40 दिन पहले व्हाइट हाउस में हुई एक गुप्त बैठक में लिखी जा चुकी थी, जहां इजरायली खुफिया इनपुट और डोनाल्ड ट्रंप की जल्दबाजी ने इस जंग की नींव रखी.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अपनी टीम ही इस ईरान के साथ जंग के खिलाफ थी, लेकिन जल्दीबाजी में लिए गए इस फैसले ने मिडिल ईस्ट को जंग की आग में झोंक दिया. अब सवाल है कि क्या यह रणनीतिक चूक थी या सोचा-समझा जोखिम? दरअसल, 11 फरवरी की दोपहर इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू व्हाइट हाउस पहुंचे.
नेतन्याहू के पास सिर्फ एक प्रस्ताव नहीं था, बल्कि ईरान के खिलाफ बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई की पूरी रणनीति थी. इस गोपनीय ब्रीफिंग में ट्रंप के साथ उनके शीर्ष सहयोगी मौजूद थे. इनमें विदेश मंत्री मार्को रूबियो, रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ, CIA प्रमुख जॉन रैटक्लिफ के साथ सेना से जुड़े अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल थे.
नेतन्याहू की ब्रीफिंग ने बदली दिशा
करीब एक घंटे तक चली ब्रीफिंग में बेंजामिन नेतन्याहू ने दावा किया कि ईरान में सत्ता परिवर्तन का सही समय आ चुका है. उन्होंने तर्क दिया कि इजरायल कुछ ही हफ्तों में ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को तबाह कर सकता है, जिससे वहां की सरकार कमजोर पड़ जाएगी. उन्होंने कहा कि ईरान की ओर से जवाबी हमले की संभावना कम है.
ईरान पर ट्रंप की टीम में मतभेद
इस आत्मविश्वास भरे प्रस्तुतीकरण ने ट्रंप को बहुत प्रभावित किया. उन्होंने इसे बहुत बढ़िया करार दिया, जो इस बात का संकेत था कि वे सैन्य कार्रवाई के लिए तैयार हो चुके हैं. हालांकि, ट्रंप की अपनी टीम इस योजना को लेकर एकमत नहीं थी. अगले ही दिन हुई बैठक में अमेरिकी इंटेलिजेंस ने साफ कहा कि केवल दो लक्ष्य ही हासिल किए जा सकते हैं.
जंग को बताया बेतुका-बकवास
वो लक्ष्य ईरान के सुप्रीम लीडर को निशाना बनाना और उसके मिसाइल सिस्टम को कमजोर करना था. CIA प्रमुख ने सत्ता परिवर्तन की योजना को बेतुका बताया, जबकि मार्को रूबियो ने इसे सीधे तौर पर बकवास कह दिया. उपराष्ट्रपति जेडी वैंस ने भी चेतावनी दी कि यह युद्ध अमेरिका को लंबे समय तक फंसा सकता है. उन्होंने इसे तबाही करार दिया.
जल्दबाजी में लिया बड़ा फैसला
जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के चेयरमैन जनरल डैन केन ने भी इजराइल की योजना पर सवाल उठाते हुए कहा कि तेल अवीव अक्सर बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है. लेकिन इसके उलट अमेरिकी डिफेंस सेक्रेटरी पीट हेगसेथ ने सैन्य कार्रवाई का समर्थक किया. इन मतभेदों के बावजूद ट्रंप ने महज 15 दिनों के भीतर ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ को मंजूरी दे दी.
युद्ध का बोझ और हकीकत
ट्रंप की प्राथमिकता दो लक्ष्यों तक सीमित थी. पहला ईरान की सैन्य क्षमता को तोड़ना और दूसरा जल्दी से जीत हासिल करना. उनको उम्मीद थी कि ईरान जल्दी ही घुटने टेक देगा और युद्ध लंबा नहीं खिंचेगा. लेकिन यह आकलन जल्द ही गलत साबित हुआ. जैसे-जैसे युद्ध आगे बढ़ा, हालात अमेरिका और इजरायल के लिए चुनौतीपूर्ण होते गए.
जमीनी हकीकत से रूबरू ट्रंप
होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान की पकड़ मजबूत हुई, तेल की कीमतें बढ़ीं और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर दबाव दिखने लगा. शेयर बाजार गिरा और घरेलू स्तर पर राजनीतिक दबाव बढ़ गया. युद्ध के दौरान अमेरिकी सैनिकों की मौत और बढ़ते आर्थिक संकट ने ट्रंप प्रशासन को सोचने पर मजबूर कर दिया. इसी दौरान ट्रंप को जमीनी हकीकत से रूबरू कराया गया.
आखिर कैसे हुआ युद्धविराम
व्हाइट हाउस की चीफ ऑफ स्टाफ सूज़ी वाइल्स ने उनको ब्रीफिंग दी. जैसे ही युद्ध तीसरे हफ्ते में पहुंचा, ट्रंप ने बाहर निकलने का रास्ता तलाशना शुरू किया. 28 मार्च को बातचीत का प्रस्ताव रखा गया, जिसके बाद दोनों पक्षों के बीच दो हफ्ते का संघर्ष विराम संभव हो सका. इस तरह राजनीतिक महत्वाकांक्षा और जल्दबाज़ी ने एक बड़े युद्ध को जन्म दिया.
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