अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को ईरान को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा था कि आज रात एक पूरी सभ्यता को खत्म कर दिया जाएगा. यह चेतावनी ऐसे समय पर सामने आई थी, जब ईरान ने अमेरिका के साथ सीजफायर वार्ता को ठुकरा दिया था. इतना ही नहीं ट्रंप की ओर से ईरान को दी गई डेडलाइन भी खत्म होने जा रही थी. हालांकि, कुछ ही घंटों के भीतर दुनिया को पता चल गया कि अमेरिका और ईरान के बीच असल में दो हफ्ते का सीजफायर हुआ है.
लेकिन इससे पहले तक ट्रंप लगातार ईरान को चेतावनी देते रहे हैं. उन्होंने रविवार को बेहद आपत्तिजनक भाषा में पोस्ट कर ईरान को धमकी दी थी कि अगर होर्मुज को दोबारा नहीं खोला गया, तो अमेरिका, ईरान के बिजली स्टेशन, रेलवे लाइन और ब्रिज पर हमला करेगा. पूरी सभ्यता खत्म करने देने वाली धमकी को लेकर तो सोशल मीडिया पर न्यूक्लियर अटैक की अटकलें लगनी शुरू हो गई थी.
इस तरह के बयानों ने ट्रंप की मानसिक स्थिति को लेकर भी बहस छेड़ दी है. हालांकि, उनकी मानसिक स्थिति पर पहले भी चर्चा होती रही है, लेकिन इस बार आपत्तिजनक भाषा में दी गई धमकियों ने इस बहस को और तेज कर दिया. लेकिन क्या यह संभव है कि ट्रंप का यह व्यवहार एक नाटक हो, एक सोची-समझी स्ट्रैटेजी?
ईरान को ट्रंप की इन धमकियों के बीच एक इंटरनेशनल एक्सपर्ट और Waikato University के प्रोफेसर अल गिलेस्पी ने कहा कि ट्रंप शायद मैडमैन थ्योरी (Madman Theory) का इस्तेमाल कर रहे हों, ताकि ईरान के साथ जंग को खत्म किया जा सके.
रेडियो न्यूजीलैंड से बात करते हुए गिलेस्पी ने कहा कि इस तरह की गतिविधियां तकनीकी रूप से युद्ध अपराध की श्रेणी में आ सकते हैं, लेकिन इसके पीछे एक गहरी रणनीति भी हो सकती है.
क्या है मैडमैन थ्योरी?
इस थ्योरी को सबसे पहले अमेरिकी अर्थशास्त्रियों डेनियल एल्सबर्ग और थॉमस स्केलिंग ने अपनी किताब द स्ट्रैटेजी ऑफ कन्फ्लिक्ट में पेश किया था. यह थ्योरी वियतनाम युद्ध के दौरान बहुत पॉपुलर हुई थी. उस समय अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने बार-बार अपने सहयोगियों से कहा था कि मैं इसे मैडमैन थ्योरी कहता हूं. मैं वियतनाम के लोगों को यह यकीन दिलाना चाहता हूं कि मैं अब उस प्वॉइंट पर पहुंच चुका हूं जहां मैं युद्ध रोकने के लिए कुछ भी कर सकता हूं. वह वियतनाम के लोगों को बेवकूफ बनाकर ये भी यकीन दिलाना चाहते थे कि न्यूक्लियर बम का बटन उनके हाथ में हैं और वो किसी भी वक्त इसे दबा सकते हैं.
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिद्धांत अक्सर सफल नहीं होता और इसके नतीजे अनिश्चित होते हैं.
क्या ईरान मामले में मैडमैन थ्योरी ने काम किया?
संभव है कि इस बार यह रणनीति कुछ हद तक काम कर गई हो. दुनियाभर में यह आशंका फैल गई थी कि ट्रंप परमाणु विकल्प का इस्तेमाल कर सकते हैं. स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई कि व्हाइट हाउस को स्पष्ट करना पड़ा कि परमाणु हथियार विकल्प में नहीं हैं. इसके बाद अचानक दो सप्ताह का युद्धविराम सामने आया.
हालांकि, जूली नॉर्मन ने इस बात पर जोर दिया कि ट्रंप के फैसलों को लेकर हमेशा अनिश्चितता बनी रहती है. उनके अनुसार, यह समझना बहुत मुश्किल है कि हर दिन क्या होने वाला है, और यही ट्रंप की कार्यशैली रही है.
प्रोफेसर गिलेस्पी ने भी चिंता जताई कि ट्रंप शायद केवल दिखावा नहीं कर रहे हों, बल्कि वास्तव में ऐसा करने के लिए तैयार भी हो सकते हैं.
गिलेस्पी का मानना है कि अगर ट्रंप वास्तव में इस थ्योरी का उपयोग कर रहे हैं, तो वे इसे गलत प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ इस्तेमाल कर रहे हैं. 1979 की ईरान क्रांति के बाद ईरान ने इस्लामी कानून को अपने शासन का आधार बना लिया. गिलेस्पी के अनुसार, धार्मिक या अधिनायकवादी शासन अक्सर इस तरह की धमकियों से प्रभावित नहीं होते, क्योंकि वे जनता पर पड़ने वाले प्रभाव को प्राथमिकता नहीं देते. उन्होंने यह भी कहा कि ईरान ट्रंप की तीखी बयानबाजी से डरने के बजाय और अधिक आक्रामक हो सकता है.
ट्रंप ने ईरान के साथ इस जंग में लगातार अप्रत्याशित कदम उठाए. वह कभी धमकी देते, कभी डेडलाइन को बढ़ा देते. यह स्पष्ट नहीं है कि वे वास्तव में मैडमैन थ्योरी का उपयोग कर रहे हैं या नहीं. लेकिन अगर उन्होंने ऐसा किया, तो दो सप्ताह का युद्धविराम शायद इस रणनीति से मिलने वाली अधिकतम उपलब्धि हो सकती है. सच यह है कि मैडमैन थ्योरी तभी काम करती है जब दोनों पक्ष तर्कसंगत हों और ईरान के मामले में यह शर्त पूरी होती नहीं दिखती.
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