ममता बनर्जी लड़ रही हैं अपना सबसे मुश्किल चुनाव, जानें क्यों चुनौतीपूर्ण है ‘मुकाबला’ – West Bengal Election 2026 mamata banerjee toughest fight sir impact ntcpmr


मुश्किल तो ममता बनर्जी के लिए 2011 में पश्चिम बंगाल से लेफ्ट शासन को सत्ता से बेदखल करना भी था. मुश्किल तो ममता बनर्जी के लिए 2021 का विधानसभा चुनाव भी था, जिसमें खुद भी हार का मुंह देखना पड़ा था – लेकिन, 2026 का पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव ममता बनर्जी के लिए कदम कदम पर और सबसे मुश्किल साबित हो रहा है.

चुनाव आयोग के SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण के खिलाफ ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट तक गईं, और केस की पैरवी भी की, लेकिन मालदा हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट की भी नाराजगी झेलनी पड़ी, और अब घटना की जांच का जिम्मा राष्ट्रीय जांच एजेंसी NIA को दे दिया गया है. चुनाव आयोग ने बंगाल का पूरा ही सरकारी अमला बदल डाला है, बचे सिर्फ वे ही अफसर हैं जिन पर चुनाव आयोग को किसी राजनीतिक प्रभाव में न आने का भरोसा है.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आज, 8 अप्रैल को भवानीपुर विधानसभा सीट से अपना नामांकन पत्र दाखिल करने जा रही हैं. भवानीपुर सीट पर बीजेपी के शुभेंदु अधिकारी भी चुनाव मैदान में हैं. पश्चिम बंगाल में दो फेज में वोटिंग होगी, पहले चरण में  23 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे और दूसरे चरण में 29 अप्रैल को.

मौजूदा चुनाव में जिस तरह से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री को कदम कदम पर चुनौतियां मिल रही हैं, 2026 का यह चुनाव ममता बनर्जी की लोकप्रियता के लिए जनमत संग्रह जैसा होने जा रहा है.

पश्चिम बंगाल में SIR का असर

SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण पर विवाद की शुरुआत बिहार से हुई. लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने बिहार में तेजस्वी यादव के साथ वोटर अधिकार यात्रा निकाली, और चुनाव आयोग के साथ साथ बीजेपी पर वोट चोरी का इल्जाम लगाया. पश्चिम बंगाल में एसआईआर की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही ममता बनर्जी ने ऐसी मुहिम छेड़ी जिसमें चुनाव आयोग और बीजेपी के खिलाफ तो हमलावर थीं ही, कांग्रेस को भी बंगाल में एंट्री देने से मना कर दिया. कांग्रेस बिहार की तरह कोई आंदोलन तो नहीं कर पाई, लेकिन सभी सीटों पर अकेले चुनाव जरूर लड़ रही है.

ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग के SIR के खिलाफ कोई कसर बाकी तो नहीं रखी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट जाने के बावजूद रोक नहीं लगाई जा सकी. पश्चिम बंगाल में SIR की पूरी प्रक्रिया हुई, और पहली बार वह डेटा भी सार्वजनिक किया गया है, जिसमें जिलेवार बताया गया है कि कितने नाम डिलीट हुए, और कितने जोड़े गए. विचाराधीन मामले इतनी भारी तादाद में थे कि निपटारा करना बड़ी प्रशासनिक चुनौती थी, और उसके लिए न्यायिक अधिकारियों की मदद लेनी पड़ी.

चुनाव आयोग के मुताबिक, ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ यानी डेटा में तकनीकी गड़बड़ियों के आधार पर 60 लाख से ज्यादा मतदाताओं को जांच के दायरे में रखा गया था, जिनमें से करीब 59.84 लाख मामले निपटाए जा चुके हैं. जांच के बाद करीब 32.68 लाख पात्र लोगों के नाम दोबारा जोड़े गए हैं, जबकि अपात्र पाए गए 27.16 लाख के नाम काट दिए गए हैं.

पश्चिम बंगाल में SIR की प्रक्रिया तीन चरणों में हुई. दिसंबर, 2025 में तैयार किए गए पहले ड्राफ्ट में 58.2 लाख नाम हटाए गए थे. फिर फरवरी, 2026 में अंतिम सूची के प्रकाशन तक 5.46 लाख और नाम हटाए गए. और, अब न्यायिक अधिकारियों की जांच पड़ताल के बाद 27 लाख से ज्यादा नाम हटाने का फैसला लिया गया है – और इस तरह नाम हटाए जाने वाले लोगों की कुल संख्या 90 लाख के पार पहुंच गई है.

1. चुनाव आयोग की तरफ से जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में  SIR की प्रक्रिया पूरी होने के बाद 90.66 लाख नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं. यह आंकड़ा पश्चिम बंगाल के कुल वोटर का 11.85 फीसदी है.

2. ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ लिस्ट में शामिल लोगों के नाम में गलती थी, या माता-पिता के साथ उम्र में अंतर पर संदेह था. करीब 22 हजार लोगों के मामले में ई-सिग्नेचर न होने से उनके नाम अभी सूची में दर्ज नहीं किए गए हैं.

3. नॉर्थ 24 परगना में बांग्लादेश से आए हिंदू यानी मतुआ समुदाय के 17 फीसदी लोग हैं, जो आबादी का करीब 30 फीसदी हिस्सा हैं. नदिया जिले की कई सीटों पर भी मतुआ समुदाय का प्रभाव है, और वहां भी बड़ी संख्या में नाम कटे हैं.

4. पश्चिम बंगाल के 6 जिलों से ही 60 फीसदी हटे हैं, खास बात यह है कि वहां की 81 फीसदी विधानसभा सीटें सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के पास हैं. लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी के चलते कटे नामों का सबसे ज्यादा असर मुस्लिम बहुल आबादी वाले और सीमावर्ती जिलों में देखने को मिला है. लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी के कारण नंदीग्राम में 2,826 नाम कटे हैं, जिनमें 2700 यानी 95.5 फीसदी मुस्लिम समुदाय के हैं. 2021 में शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को 1,956 वोटों से हराया था.

5. SIR में पश्चिम बंगाल के सिर्फ 6 जिलों – मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर, नदिया, उत्तर 24 परगना और दक्षिण 24 परगना से करीब 60 फीसदी नाम हट गए हैं. उत्तर दिनाजपुर को छोड़ दें तो 5 जिलों की 115 विधानसभा सीटों में से 93 पर 2021 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी को जीत मिली थी, जबकि बीजेपी के हिस्से में 20 विधानसभा सीटें आई थीं.

चुनाव आयोग ने पूरे बंगाल के पुलिस-प्रशासन बदल डाला

चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले डीजीपी से लेकर थानों के प्रभारी तक बदल डाले हैं. चीफ सेक्रेट्री से लेकर बीडीओ और सहायक निर्वाचन अधिकारियों का ताबड़तोड़ तबादला किया गया है. अब तो महत्वपूर्ण जगहों पर कुल जमा गिनती के अफसर बचे होंगे, जिनका तबादला नहीं हुआ है.

अब तो बचे हुए अफसरों को काबिल होने के साथ साथ यह भी माना ही जा सकता है कि वे किसी भी तरह के राजनीतिक प्रभाव में नहीं आने वाले हैं. चुनाव आयोग से तबादले का आदेश न मिलना भी तो बचे हुए अफसरों के लिए ईमानदारी और निष्ठा के प्रति सर्टिफिकेट ही माना जाएगा.

मालदा हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट भी सख्त

सुप्रीम कोर्ट ने मालदा हिंसा मामले में पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव और डीजीपी को फटकार लगाई है.  सुप्रीम कोर्ट की यह फटकार अधिकारियों को मालदा में चुनाव अधिकारियों को बंधक बनाए जाने के दौरान कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का फोन न उठाने के लिए मिली है.

सुप्रीम कोर्ट ने यह मामला राष्ट्रीय जांच एजेंसी NIA को सौंप दिया है. मालदा हिंसा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों से कहा था, ‘यह आपकी और आपके प्रशासन की सरासर नाकामी है.’

आर जी कर के पीड़ित और प्रदर्शनकारी भी चुनाव मैदान में

पश्चिम बंगाल चुनाव में बीजेपी और सीपीएम ने आर जी कर रेप-मर्डर केस की पीड़िता की मां और घटना के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले चेहरों को चुनाव मैदान में उतार दिया है. लोकसभा चुनाव, 2024 में बीजेपी ने संदेशखाली के मामले को चुनावी मुद्दा बनाने के लिए ऐसा ही तरीका अपनाया था. जैसे 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने रेप पीड़िता की मां को उन्नाव से कांग्रेस का टिकट दिया था.

पश्चिम बंगाल चुनाव में रत्ना देबनाथ पानीहाटी विधानसभा सीट से बीजेपी की उम्मीदवार हैं. रत्ना देबनाथ का मुकाबला ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के तीर्थंकर घोष और सीपीएम के कलातन दासगुप्ता से है. कलातन दासगुप्ता भी आर जी कर रेप-मर्डर केस के विरोध प्रदर्शनों का प्रमुख चेहरा रहे हैं. कलातन दासगुप्ता के साथ साथ बिकाश रंजन भट्टाचार्य जादवपुर से, दिप्शिता धर नॉर्थ दमदम से और मीनाक्षी मुखर्जी उत्तरपारा विधानसभा सीट से सीपीएम के टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं.

बीजेपी ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में रत्ना देबनाथ को ममता बनर्जी के शासन में बढ़े महिला अपराधों के चेहरे के तौर पर पेश किया है. ऐसे ही 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने संदेशखाली की घटना की आवाज के तौर पर रेखा पात्रा को बशीरहाट से उम्मीदवार बनाया था. रेखा पात्रा को 4.7 लाख वोट मिले थे, लेकिन 3 लाख से ज्यादा वोटों से वो तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार से हार गई थीं.

ममता बनर्जी के लिए चुनाव जनमत संग्रह जैसा

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक चुनावी रैली में चुनाव आयोग के ताजा आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि SIR की प्रक्रिया पूरी होने के बाद राज्य में लगभग 91 लाख मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए जाने को गहरी साजिश करार दिया है. ममता बनर्जी का आरोप है कि SIR में खास समुदायों को निशाना बनाया गया है, उनको लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित करने की कोशिश की जा रही है.

ममता बनर्जी ने कहा कि TMC उन सभी लोगों के साथ चट्टान की तरह खड़ी रहेगी, जिनके नाम SIR में हटाए गए हैं. ममता बनर्जी का आरोप है कि SIR के नाम पर मतुआ, राजबंशी और अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों को जान-बूझकर निशाना बनाया गया, और उनके नाम वोटर लिस्ट से काट दिए गए.

लगे हाथ, ममता बनर्जी का यह भी दावा है कि टीएमसी की सक्रियता और सुप्रीम कोर्ट में उनके हस्तक्षेप के कारण ही लाखों लोगों का वोट सुरक्षित रह पाया है. ममता बनर्जी का कहना है कि 60 लाख मामलों में से करीब 32 लाख नाम उनकी लड़ाई की बदौलत ही वोटर लिस्ट में शामिल किए गए हैं. इसे न्याय की जीत बताते हुए ममता बनर्जी ने लोगों से अपील की है कि वे अपने मताधिकार के प्रति सजग रहें, और किसी भी तरह के डर या बहकावे में न आएं.

भले ही नंदीग्राम की तरह भवानीपुर चुनाव में भी हार का मुंह देखना पड़े, लेकिन इतना सब होने के बाद भी तृणमूल कांग्रेस फिर से पश्चिम बंगाल का चुनाव जीत जाती है, तो ममता बनर्जी को देश में सबसे लोकप्रिय नेता समझा जाएगा – क्योंकि, यह चुनाव, वास्तव में, ममता बनर्जी के लिए किसी जनमत संग्रह जैसा ही है.

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