पाकिस्तान के कब्रिस्तानों में शवों को दफनाने की जगह नहीं मिल रही है. यह खबर सुन कोई भी चौंक सकता है. पाकिस्तानी मीडिया ने ही ऐसी रिपोर्ट की है कि वहां लोग कब्रिस्तान में पुराने कब्रों से शव को निकाल रहे हैं, फिर नए को दफना रहे हैं. हालांकि, इसमें एक ट्वीस्ट है. पाकिस्तान में ऐसा हो तो जरूर रहा है, लेकिन ये सब अल्पसंख्यकों के कब्रिस्तान में चल रहा है. पाकिस्तान में ईसाई समुदाय के भी काफी लोग रहते हैं और उनके कब्रिस्तान अलग हैं. वहां ईसाई समुदाय काफी काफी कम हैं फिर भी उनके कब्रिस्तान में जगह नहीं बची हुई है. आखिर इसकी वजह क्या है?

पाकिस्तान के द एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने दो दिन पहले एक रिपोर्ट की है, जिसके मुताबिक अल्पसंख्यकों के कब्रिस्तान में शवों को दफनाने की जगह नहीं है. कब्रिस्तानों में बढ़ती भीड़ और बढ़ते अतिक्रमण के कारण परिवारों को अपने मृतकों को दोबारा इस्तेमाल की गई कब्रों में दफनाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है.

माना जाता है कि मृत्यु के बाद कब्रिस्तान ही अंतिम विश्राम स्थल है, जहां निश्चितता आती है. वहीं पाकिनस्तान के ईसाई समुदाय के लिए, कब्र हासिल करना भी एक  कठिन परीक्षा बन गई है. यह न केवल गंभीर नैतिक चिंताओं को जन्म देती है, बल्कि देश में अल्पसंख्यक जीवन के मूल्य को लेकरप भी सवाल खड़े करती है.

पेशावर के एक कॉलेज लेक्चरार इमरान यूसुफ मसीह के अनुसार, परिवारों के पास कभी-कभी भीड़भाड़ वाले इलाकों में चुपचाप अपने मृतकों को दफनाने या पुरानी कब्रों को फिर से खोलने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता. उन्होंने कहा कि ऐसा इसलिए है क्योंकि कुछ कब्रिस्तानों के लिए जो जगह दी गई है उस पर भू माफियाओं ने कब्जा कर लिया है. अल्पसंख्यक समुदाय को कब्रिस्तान बनाने के लिए वैसे भी सीमित जगह मिली है जो और भी कम हो गई है. वहीं बचे हुए कब्रिस्तान पहले से भरे हुए हैं.

दूसरे कब्रों से  शव निकालने को मजबूर हैं लोग
पेशावर के ईसाई कब्रिस्तान 1947 से पहले के हैं. बचे हुए कुछ कब्रिस्तानों में गोरा कब्रिस्तान, वजीर बाग कब्रिस्तान, कोहाटी कब्रिस्तान और नौथिया कब्रिस्तान शामिल हैं. यूसुफ ने बताया कि ये ऐतिहासिक कब्रिस्तान औपनिवेशिक काल में स्थापित किए गए थे और इन्हें बहुत कम आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए बनाया गया था.

उन्होंने बताया कि कुछ मामलों में, पुरानी कब्रों से हड्डियां निकाल ली जाती हैं. ताकि उसी जगह पर नए शव दफनाए जा सकें. इससे स्थिति दर्दनाक और अपमानजनक हो जाती है. उन्होंने बताया कि इस प्रक्रिया से विवाद भी पैदा हो सकता है, क्योंकि यदि पहले से दफनाए गए लोगों के रिश्तेदारों को पता चलता है कि उनके प्रियजन के विश्राम स्थल को छेड़ा गया है, तो वे आपत्ति जता सकते हैं. इन जोखिमों के बावजूद, कई परिवारों को लगता है कि उनके पास कोई विकल्प नहीं है.

यूनिवर्सिटी टाउन इलाके में रहने वाले और सरकारी संस्था में काम करने वाले कर्मचारीजुल्फिकार मसीह बताते हैं कि हम विरोध प्रदर्शन करते-करते और सरकार से बार-बार कब्रिस्तान की मांग करते-करते थक चुके हैं. हम भी पाकिस्तानी हैं और इस देश के सभ्य नागरिक हैं. फिर भी हमें उस बुनियादी अधिकार को पाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है जो हमारा होना चाहिए.

जुल्फिकार ने बताया कि यह समस्या केवल ईसाई समुदाय तक ही सीमित नहीं है. हिंदू और सिख सहित अन्य अल्पसंख्यक धर्मों के सदस्यों को भी समर्पित श्मशानों की कमी के कारण इसी तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) सरकार खैबर पख्तूनख्वा (केपी) में कई बार सत्ता में आ चुकी है और अल्पसंख्यकों के लिए सुविधाओं के संबंध में घोषणाएं भी कर चुकी है, लेकिन ये वादे अभी तक पूरी तरह से लागू नहीं किए गए हैं.

पाकिस्तानों में अल्पसंख्यक समुदायों का क्या है हाल
देश की 2023 की डिजिटल जनगणना के अनुसार, धार्मिक अल्पसंख्यक राष्ट्रीय जनसंख्या का लगभग 3.3% हैं. सबसे अधिक अल्पसंख्यक पंजाब में रहते हैं, जिनकी संख्या लगभग 24.6 करोड़ है, इसके बाद सिंध में लगभग 547,000 अल्पसंख्यक हैं. खैबर पख्तूनख्वा में अल्पसंख्यक आबादी लगभग 134,900 है, जबकि इस्लामाबाद में लगभग 97,300 और बलूचिस्तान में लगभग 62,700 अल्पसंख्यक धर्मों के निवासी हैं.

हिंदू समुदाय के अधिकारों की वकालत करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता हारून सरबदयाल ने कहा कि प्रांतीय सरकार ने पहले अल्पसंख्यक कब्रिस्तानों के विकास के लिए लगभग 1.13 अरब पाकिस्तानी रुपये देने का वादा किया था. हालांकि, अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है.

सरबदयाल ने अल्पसंख्यक कब्रिस्तानों के लिए प्रस्तावित भूमि के स्थान को लेकर भी चिंता जताई.  उन्होंने कहा कि कुछ मामलों में, अधिकारियों ने पेशावर से काफी दूर जमीन की पेशकश की है, जिससे अल्पसंख्यक परिवारों के लिए अपने प्रियजनों की कब्रों पर जाना मुश्किल और संभावित रूप से असुरक्षित हो जाता है.

उन्होंने चेतावनी दी कि इस तरह की व्यवस्था उन समुदायों के लिए सुरक्षा जोखिम पैदा कर सकती है जो पहले से ही असुरक्षित महसूस करते हैं. उन्होंने प्रांतीय सरकार और औकाफ विभाग से तत्काल कार्रवाई करने और ईसाई, हिंदू और सिख सहित सभी अल्पसंख्यक समुदायों के लिए उचित दफन सुविधाएं सुनिश्चित करने का आग्रह किया. उन्होंने चेतावनी दी कि सार्थक कदम न उठाने पर अल्पसंख्यक समूह अपने अधिकारों की मांग के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर हो सकते हैं. सरबदयाल के अनुसार, मुख्य समस्याओं में से एक यह है कि खैबर पख्तूनख्वा सरकार में वर्तमान में कोई भी अल्पसंख्यक सदस्य मंत्री पद पर नहीं है, जिससे समुदायों को अपनी शिकायतें रखने के लिए सीधे तौर पर कोई मंच नहीं मिल पा रहा है.

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