एक पति-पत्नी के बीच 10 साल से चल रही कानूनी लड़ाई को सुप्रीम कोर्ट ने ‘महाभारत की लड़ाई’ कहा और इसे पूरी तरह खत्म कर दिया. कोर्ट ने शादी को भी रद्द कर दिया और पति को 5 करोड़ रुपये देने का आदेश दिया.
इस मामले में एक पति और पत्नी हैं जो काफी समय से अलग रह रहे थे. पति खुद एक वकील हैं यानी कानून की अच्छी जानकारी रखते है. दोनों के बीच झगड़ा इतना बढ़ा कि पिछले 10 सालों में यह मामला अदालतों तक पहुंच गया और वहां भी शांत नहीं हुआ.
10 साल में क्या हुआ?
दोनों के बीच जो लड़ाई शुरू हुई वो कोर्ट में पहुंची. लेकिन यहां पति ने अपनी वकालत की जानकारी का इस्तेमाल करते हुए पत्नी के खिलाफ, उसके परिवार के खिलाफ और यहां तक कि पत्नी के वकीलों के खिलाफ भी 80 से ज्यादा केस दर्ज करवाए.
इसका मतलब है कि हर तरफ से पत्नी को कानूनी तरीके से परेशान किया जाता रहा. सुप्रीम कोर्ट ने इसे ‘बदले की भावना से की गई कार्रवाई’ कहा.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की. कोर्ट ने कहा कि यह शादी असल में बहुत पहले ही खत्म हो चुकी है, बस कागजों पर बाकी थी.
कोर्ट ने यह भी कहा कि पति का रवैया पूरी तरह गलत था, वह जानबूझकर मामले को उलझाता रहा और पत्नी को हर तरफ से घेरने की कोशिश करता रहा. कोर्ट ने इस पूरी 10 साल की लड़ाई को ‘महाभारत जैसी लड़ाई’ कहा.
आर्टिकल 142 क्या है और इसका इस्तेमाल क्यों हुआ?
सुप्रीम कोर्ट के पास एक खास ताकत होती है जिसे आर्टिकल 142 कहते हैं. इसके तहत सुप्रीम कोर्ट किसी भी मामले में पूरा इंसाफ करने के लिए कोई भी जरूरी फैसला ले सकता है, चाहे आम कानून में वो सीधे तौर पर लिखा हो या न हो. इस मामले में कोर्ट ने इसी ताकत का इस्तेमाल करते हुए शादी को रद्द कर दिया और सभी केस एक साथ बंद कर दिए.
पैसे का क्या फैसला हुआ?
कोर्ट ने सोचा कि अगर शादी खत्म होती है तो पत्नी और बच्चों का क्या होगा. इसलिए कोर्ट ने पति को आदेश दिया कि वह 5 करोड़ रुपये पत्नी को दे. यह रकम एक बार में दी जा सकती है या फिर चार बराबर किस्तों में. इसके लिए पति को एक साल का समय दिया गया है.
यह पैसा पत्नी और बच्चों के गुजारे, उनकी परवरिश और कोर्ट में लड़ाई के खर्च के लिए है. कोर्ट ने कहा कि यही पूरा और आखिरी हिसाब होगा, यानी इसके बाद और कोई मांग नहीं की जा सकती.
बच्चों का क्या होगा?
दोनों के दो बेटे हैं. कोर्ट ने फैसला किया कि दोनों बेटे पूरी तरह मां यानी पत्नी के साथ रहेंगे. लेकिन पिता को मिलने का अधिकार दिया गया है, यानी वो तय समय पर बच्चों से मिल सकते हैं.
यह भी पढ़ें: पवन खेड़ा की अग्रिम जमानत पर फैसला टला, तेलंगाना हाईकोर्ट ने पत्नी के पते पर उठाए सवाल
सभी केस का क्या हुआ?
कोर्ट ने एक बड़ा फैसला यह भी किया कि दोनों पक्षों के बीच जो भी सिविल केस, क्रिमिनल केस या अन्य मामले चल रहे थे, वो सभी खत्म कर दिए गए. पत्नी के रिश्तेदारों और उसके वकीलों के खिलाफ दर्ज FIR और शिकायतें भी रद्द कर दी गईं. यानी इस एक फैसले से 10 साल की पूरी लड़ाई पर विराम लग गया.
—- समाप्त —-

