ग्रीस की एक 58 वर्षीय महिला एक आइलैंड पर खुले में काम करती थी. एक दिन अचानक उसके चेहरे के बीच में दर्द शुरू हुआ. दर्द धीरे-धीरे बढ़ता गया. दो-तीन हफ्ते बाद उसे तेज खांसी भी होने लगी. फिर एक दिन जब वह छींकी तो उसकी नाक से कीड़े निकलने लगे. डर के मारे महिला डॉक्टर के पास पहुंची. डॉक्टरों ने जांच की तो पता चला कि उसके नाक में भेड़ की मक्खी के लार्वा घुस गए थे.

ईएनटी स्पेशलिस्ट ने सर्जरी करके महिला के नाक के साइनस से 10 लार्वा और एक प्यूपा निकाला. ये कीड़े हिल-डुल रहे थे. लार्वा पीले और भूरे रंग के थे – एक 15 मिलीमीटर लंबा और दूसरा 20 मिलीमीटर लंबा. प्यूपा काला और सिकुड़ा हुआ था.

डॉक्टरों ने इनकी डीएनए जांच की और पाया कि ये ओएस्ट्रस ओविस नाम की भेड़ की मक्खी (sheep bot fly) के लार्वा थे. यह मक्खी आमतौर पर भेड़ और बकरियों की नाक और साइनस में रहती है. महिला के काम करने का इलाका भेड़ चरने वाले खेत के बिल्कुल बगल में था.

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बीमारी का नाम और इलाज

डॉक्टरों ने अपनी रिपोर्ट में इसे ओ. ओविस नेजल मायासिस विद प्यूपेशन नाम दिया. मायासिस मतलब पैरासाइट मक्खी के कीड़े इंसान के शरीर में घुस जाना. इलाज में सर्जरी से सारे कीड़े निकाल लिए गए. नाक की सूजन कम करने वाली दवाएं दी गईं. दोनों इलाज के बाद महिला पूरी तरह ठीक हो गई.

भेड़ की मक्खी इंसानों को बहुत कम प्रभावित करती है. पहले के मामलों में यह मक्खी आंखों में लार्वा डालती थी, नाक में नहीं. नाक, मुंह या कान में लार्वा डालने के मामले बहुत दुर्लभ हैं. पहले वैज्ञानिक सोचते थे कि इंसान में यह कीड़ा सिर्फ पहला स्टेज (L1) तक ही रह सकता है.

भेड़ औरत की नाक में उड़ती है

इस महिला में लार्वा L3 स्टेज तक पहुंच गए और एक तो प्यूपा में बदल गया था. डॉक्टरों के मुताबिक किसी भी स्तनधारी जानवर के शरीर के अंदर ओ. ओविस लार्वा का प्यूपेशन बॉयोलॉजिकली पॉसिबल नहीं है. यानी लार्वा का प्यूबा बनना. फिर भी इस महिला में यह हो गया.

वैज्ञानिक कारण क्या था?

महिला की नाक की हड्डी बहुत झुकी हुई थी. साथ ही एक साथ बहुत सारे लार्वा घुस गए थे. डॉक्टरों का अनुमान है कि इस वजह से कीड़े नाक से बाहर नहीं निकल पाए. वे अंदर ही अंदर बढ़ते रहे, L3 स्टेज तक पहुंचे. एक प्यूपा में बदल गया. भेड़-बकरियों में भी कभी-कभी L3 लार्वा फंस जाते हैं, लेकिन वे सूख जाते हैं या पिघल जाते हैं.

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इंसान के साइनस में प्यूपेशन होना बिल्कुल नया और हैरान करने वाला है. डॉक्टरों ने लिखा कि कुछ अज्ञात शारीरिक या बॉयोलॉजिकल कारणों ने इसे संभव बनाया. या फिर यह मक्खी का विकास हो रहा है जो इंसान में अपना पूरा जीवन चक्र पूरा कर सके.

वयस्क मादा मक्खी भेड़-बकरियों की नाक के आसपास लार्वा डाल देती है. लार्वा नाक और साइनस में घुसकर महीनों तक बढ़ते हैं. फिर वे नाक से बाहर निकलकर जमीन में घुस जाते हैं. प्यूपा बनाते हैं. वयस्क मक्खी बनकर बाहर आते हैं. इंसानों में यह सामान्य नहीं होता, लेकिन इस महिला के मामले में पूरा चक्र नाक के अंदर ही हुआ.

डॉक्टरों ने कहा कि एंडेमिक इलाकों में डॉक्टरों को इंसानों में भेड़ की मक्खी के संक्रमण की संभावना का ध्यान रखना चाहिए. अभी और केस और डेटा की जरूरत है ताकि यह समझा जा सके कि ऐसा क्यों हुआ.

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