उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के मंत्री संजय निषाद के सामने डबल चुनौती खड़ी हो गई है. एक तरफ ओम प्रकाश राजभर की नजर निषाद पार्टी के प्रभाव वाली सीटों पर है तो दूसरी तरफ उनके वोटबैंक में सेंधमारी के लिए वीआईपी के प्रमुख मुकेश सहनी ने कमर कस ली है. मुकेश सहनी 11 अप्रैल को लखनऊ में निषाद समाज की रैली करके मिशन-2027 का आगाज करेंगे.
निषाद समदाय के आरक्षण की लड़ाई को सियासी रूप से धार देने के लिए मुकेश सहनी 11 अप्रैल को लखनऊ में एक बड़ी जनसभा करने जा रही है. इसे आगामी यूपी विधानसभा चुनाव के लिहाज से अहम माना जा रहा है.
2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर उत्तर प्रदेश का सियासी तपिश बढ़ गई है. सियासी दल अपने-अपने समीकरण और कॉम्बिनेशन बनाने में जुट गए हैं. ऐसे में संजय निषाद यूपी में मल्लाह समुदाय पर एकलौता दबदबा है, लेकिन मुकेश सहनी के उतरने से निषाद वोटों में बिखराव संभव है. इस तरह निषाद वोटों पर सियासी संग्राम छिड़ सकता है?
बिहार के बाद यूपी में सहनी की एंट्री
बिहार चुनाव में मुकेश सहनी पूरी तरह से फेल रहे हैं और अब यूपी में वाले विधानसभा चुनाव में उतरने की तैयारी शुरू कर दी है. इस कड़ी में सहनी 11 अप्रैल को लखनऊ में कार्यकर्ता सम्मेलन कर कर रहे हैं, जिसमें निषाद समुदायके आरक्षण की लड़ाई धार देने की रणनीति है. वीआईपी पार्टी के प्रवक्ता देव ज्योति ने कहा कि यूपी में निषाद समाद आरक्षण की लड़ाई का सौदा कर लिया गया है, जिसके लिए मुकेश सहनी को अब उतरना पड़ रहा है.
मुकेश सहनी की पार्टी का कहना है कि यूपी सरकार ने निषाद आरक्षण को पिछले चुनाव के दौरान अनुशंसा की थी, लेकिन उसके बाद उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया. 2022 के चुनाव से पहले निषाद समाज को सब्जबाग दिखलाए गए थे, लेकिन वोट लेने के बाद आरक्षण नहीं दिया गया. यूपी में निषाद समाज की लड़ाई लड़ने का दावा करने वाले सत्ता की मलाई खाने में जुटे हैं, उन्हें समाज के मुद्दों से कोई वास्ता नहीं रह गया है. इसीलिए अब मुकेश सहनी यूपी में निषाद समाज के आरक्षण की लड़ाई को लड़ने उतर रहे हैं.
यूपी की सियासत में निषाद वोटर्स
उत्तर प्रदेश में मल्लाह समुदाय की कई उपजातियां में बंटा हुआ है. इन्हें काची, बिंद, मल्लाह, कश्यप और निषाद समुदाय के नाम से जाना जाता है. निषाद वोटर्स काफी अहम है, जिनकी आबादी करीब 6 फीसदी है और अतिपिछड़ी जाति में आती है. मोटे तौर पर देखें तो निषादों में 150 से ज्यादा उप जातियां हैं और पूर्वी और मध्य उत्तर प्रदेश के 18 जिलों में इनकी अच्छी-खासी तादाद है.
निषाद समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले नेताओं का दावा है कि राज्य की 403 विधानसभा सीटों में से उनके समाज का 160 सीटों पर ठीक-ठाक प्रभाव है और इन सीटों पर 60 हजार से लेकर एक लाख तक वोट निषाद समाज का है. गोरखपुर, गाजीपुर, बलिया, संतकबीर नगर, मऊ, मिर्जापुर, भदोही, वाराणसी, इलाहाबाद ,फतेहपुर, सहारनपुर और हमीरपुर जिले में निषाद वोटरों की संख्या अधिक है.
संजय निषाद के लिए सहनी का खतरा
निषाद समाज अपने मजबूत वोट बैंक से बड़े राजनीतिक दलों का खेल कई सीटों पर बिगाड़ने की ताकत रखते हैं. यही कारण रहा है कि निषाद समाज के वोटबैंक पर सभी राजनीतिक पार्टियों की सदैव नजर रही है. यूपी संजय निषाद को मल्लाह समुदाय का नेता और चेहरा माना जाता है. निषाद समाज के आरक्षण की मांग को उठाकर ही संजय निषाद राजनीति में आए हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद भी मल्लाह समाज को अलग से आरक्षण नहीं दिला सके और न ही उन्हें अनुसूचित जाति का दर्जा.
संजय निषाद यूपी में सबसे बड़े मल्लाह नेता माने जाते हैं, जिसके चलते बीजेपी ने उनके साथ गठबंधन कर रखा है. चार साल से मंत्री रहने के बाद भी संजय निषाद मल्लाह समाज के आरक्षण के वादे को जमीन पर नहीं उतार सके है, जिसके चलते मल्लाह समाज का उनसे मोहभंग हुआ है. इसके चलते ही 2024 में संजय निषाद के बेटे प्रवीण निषाद को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा है.
सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने मल्लाह समुदाय की आईकॉन माने जाने वाली फूलन देवी की बहन रुक्मिणी देवी को पार्टी महिला सभा की प्रदेश अध्यक्ष नियुक्ति किया है. इस तरह पार्टी की महिला भागीदारी बढ़ाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है.अखिलेश यादव ने पिछले दिनों उन्हें एक स्कॉर्पियो गाड़ी भी उपलब्ध कराई थी ताकि क्षेत्र में दौरा कर सकें. इस तरह सपा ने मल्लाह वोटों के साधने की कवायद में तो मुकेश सहनी के उतरने से संजय निषाद के लिए सियासी चुनौती बढ़ सकती है?
राजभर से निषाद को सीट का खतरा
योगी सरकार में मंत्री और सुभासपा के प्रमुख ओम प्रकाश राजभर ने गाजीपुर की जहूराबाद विधानसभा सीट छोड़कर आजमगढ़ की अतरौलिया सीट से चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है, जहां से पिछले चुनाव में निषाद पार्टी लड़ी थी. इसके अलावा ओम प्रकाश राजभर ने निषाद पार्टी की जीती हुई जौनपुर की शाहगंज सीट पर भी अपना दावा ठोक दिया है. राजभर जिस तरह से एक के बाद एक निषाद पार्टी के प्रभाव वाली सीटों पर अपना दावा ठोक रहे हैं, उससे संजय निषाद के लिए सीट का खतरा मंडराने लगा है.
अतरौलिया सीट से 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के साथ रहते हुए निषाद पार्टी ने अपना प्रत्याशी उतारा था. सपा के संग्राम यादव विधायक चुने गए थे जबकि दूसरे नंबर पर निषाद पार्टी के प्रशांत सिंह रहे, जिन्हें 74255 वोट मिले थे. राजभर सिर्फ इसी ही सीट पर नहीं बल्कि जौनपुर की शाहगंज विधानसभा सीट पर अपना दावा ठोक रहे हैं जबकि 2022 में इस सीट से निषाद पार्टी के रमेश सिंह विधायक चुने गए थे. इस तरह निषाद पार्टी की सीटों पर राजभर की नजर लगी हुई है.
राजभर बनाम निषाद की जंग
ओम प्रकाश राजभर के द्वारा एक के बाद एक सीट पर दावेदारी जताने के बाद एनडीए के भीतर सियासी संग्राम छिड़ सकता है. निषाद पार्टी के प्रमुख संजय निषाद ने राजभर के बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है.उन्होंने कहा कि गठबंधन में रहकर इस तरह की घोषणाएं करना सही नहीं है और राजभर को अपनी मर्यादा में रहना चाहिए. संजय निषाद ने यह भी साफ किया कि उनसे इस बारे में कोई बातचीत नहीं हुई है. ऐसे में उन्हें सीटों की दावेदारी नहीं करनी चाहिए.
वहीं, राजभर का कहना है कि उन्होंने निषाद से बात कर ली. इस तरह दोनों नेताओं के बयानों में यह टकराव साफ दिखाता है कि एनडीए के भीतर सीट शेयरिंग को लेकर स्थिति सहज नहीं है. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह विवाद आने वाले चुनाव से पहले और भी बढ़ सकता है, क्योंकि पूर्वांचल में सीटों का बंटवारा सभी दलों के लिए बेहद अहम है. ऐसे में सीट शेयरिंग को लेकर जिस तरह से अभी से संग्राम छिड़ गया है, उससे साधने आसान नहीं होगा?
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