दिल्ली पुलिस को अपने खास अभियान ऑपरेशन CyHawk में एक और बड़ी कामयाबी मिली है. पुलिस ने फर्जी लोन ऐप के जरिए लोगों को ठगने वाले एक खतरनाक गिरोह का पर्दाफाश किया है. यह गिरोह लोगों को बिना गारंटी लोन देने का झांसा देता था और फिर उन्हें ब्लैकमेल करता था. जांच में सामने आया है कि इस गैंग के तार पाकिस्तान और बांग्लादेश से जुड़े हुए हैं. वर्चुअल नंबर के जरिए यह नेटवर्क काम कर रहा था, जिससे पुलिस के लिए इसे ट्रैक करना चुनौतीपूर्ण था. इस खुलासे ने साइबर अपराध के अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन को उजागर कर दिया है.

पूरे मामले की जांच तब शुरू हुई जब दिल्ली पुलिस को कपासहेड़ा स्थित बैंक ऑफ बड़ौदा का एक संदिग्ध बैंक अकाउंट मिला. यह अकाउंट म्यूल अकाउंट के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा था, जिसमें ठगी की रकम जमा होती थी. पुलिस ने जब इस अकाउंट की गतिविधियों की जांच की तो कई संदिग्ध लेनदेन सामने आए. इसके बाद साइबर सेल ने इस पूरे नेटवर्क को खंगालना शुरू किया. शुरुआती जांच में ही यह साफ हो गया कि यह एक संगठित गिरोह है, जो बड़े स्तर पर लोगों को निशाना बना रहा था.

जांच के दौरान पुलिस ने पहले चार आरोपियों को गिरफ्तार किया. इनसे पूछताछ में दो और आरोपियों के नाम सामने आए, जिन्हें बाद में पकड़ लिया गया. पुलिस ने इन आरोपियों के पास से कई मोबाइल फोन बरामद किए. इन मोबाइल फोन में ऐसे व्हाट्सऐप चैट मिले, जो इस पूरे साइबर ठगी नेटवर्क की परतें खोलते हैं. चैट में विदेशी नंबरों से बातचीत के सबूत भी मिले हैं, जो इस गिरोह के अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन को मजबूत करते हैं.

पुलिस की तकनीकी जांच में पता चला कि आरोपी पाकिस्तान और बांग्लादेश के वर्चुअल नंबरों के जरिए अपने हैंडलर्स से संपर्क में थे. ये विदेशी हैंडलर्स पूरे ऑपरेशन को कंट्रोल करते थे और भारत में बैठे आरोपियों को निर्देश देते थे. व्हाट्सऐप चैट में पैसे के लेनदेन, फर्जी ऐप्स के जरिए ठगी और ब्लैकमेलिंग के कई सबूत मिले हैं. इससे साफ है कि यह एक सुनियोजित साइबर क्राइम सिंडिकेट था, जो कई देशों में फैला हुआ है.

इस गिरोह का तरीका बेहद शातिर था. जैसे ही कोई व्यक्ति इन फर्जी लोन ऐप्स से लोन लेता था, उसका मोबाइल डेटा इन ऐप्स के बैकएंड तक पहुंच जाता था. लोन आमतौर पर साप्ताहिक आधार पर दिया जाता था और पहली किस्त तुरंत काट ली जाती थी. इसके बाद पीड़ित के फोन से कॉन्टैक्ट, फोटो और अन्य निजी जानकारी निकाल ली जाती थी. फिर आरोपी इन जानकारियों को पाकिस्तान और बांग्लादेश के नंबरों के जरिए शेयर करते थे और पीड़ित को ब्लैकमेल करना शुरू कर देते थे.

गिरोह के सदस्य पीड़ितों की फोटो को मॉर्फ कर उनके परिवार और दोस्तों को भेजने की धमकी देते थे. इस डर से कई लोग पैसे देने को मजबूर हो जाते थे. आरोपी म्यूल बैंक अकाउंट्स का भी इंतजाम करते थे, जिनमें ठगी की रकम जमा की जाती थी. ये लोग UPI ID और QR कोड शेयर करके पैसे मंगवाते थे. इस तरह यह पूरा नेटवर्क तेजी से ठगी की रकम इकट्ठा करता था और पीड़ितों को मानसिक रूप से प्रताड़ित करता था.

तकनीकी जांच में यह भी सामने आया कि ठगी की रकम को बाद में क्रिप्टोकरेंसी (USDT) में बदल दिया जाता था, ताकि मनी ट्रेल को छुपाया जा सके. पहले पैसे म्यूल अकाउंट में आते थे, फिर कैश निकाला जाता था और अंत में उसे क्रिप्टो में कन्वर्ट कर दिया जाता था. इस प्रोसेस से जांच एजेंसियों के लिए पैसे का पता लगाना मुश्किल हो जाता था. पुलिस अब इस मामले में विदेशी हैंडलर्स और अन्य सहयोगियों की तलाश कर रही है.

गिरफ्तार आरोपियों में करण कुमार (24) और शमी अहमद (27) शामिल हैं, जो कपासहेड़ा इलाके के रहने वाले हैं. दोनों रेपिडो ड्राइवर के तौर पर काम करते थे. करण को शमी के जरिए इस नेटवर्क की जानकारी मिली, जबकि शमी को अपने भाई की मोबाइल दुकान के जरिए राहुल नाम के शख्स से संपर्क मिला. राहुल ने उसे इस अवैध धंधे के बारे में बताया था. दोनों आरोपी कमीशन के बदले अपने बैंक अकाउंट साइबर ठगों को उपलब्ध कराते थे. पुलिस अब इस गिरोह से जुड़े बाकी लोगों की तलाश में जुटी हुई है.

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