बचपन में जब भी आप शिमला, मसूरी या किसी हिल स्टेशन पर घूमने जाते थे और चलते-चलते पैर थक जाते थे, तो आपने भी कभी न कभी जिद जरूर की होगी ‘मम्मी मुझे घोड़े पर बैठना है.’ या ‘मुझे खच्चर की सवारी करनी है.’ उस वक्त ये सवारी किसी एडवेंचर से कम नहीं लगती थी. ये तो हुई बचपन की बात, लेकिन बड़े होने के बाद भी ये मजा कम नहीं होता. आज भी बहुत कम लोग होंगे जिन्हें पहाड़ों की वादियों में घोड़े की पीठ पर बैठकर घूमना या रेगिस्तान में ऊंट की सवारी करना पसंद न हो.
क्या आप भी उन्हीं में हैं? अगर हैं तो जरा अपने मजे को पीछे छोड़कर सोचें कि क्या हो अगर आपका वजन न केवल इस मजे पर बल्कि आपकी पूरी छुट्टी पर ब्रेक लगा दे? अगर आपको सिर्फ इसलिए सवारी करने से रोक दिया जाए क्योंकि आप उस जानवर के लिए ज्यादा भारी हैं? सुनने में ये बहुत अजीब लग सकता है या आप ये भी सोच सकते हैं कि क्या बकवास की जा रही है, लेकिन दुनिया की कई टूरिस्ट प्लेसेज पर यही हकीकत बनती जा रही है. वहां नियम बनाए जा रहे हैं कि जानवरों पर एक तय सीमा से ज्यादा वजन नहीं डाला जा सकता. यानी अगर आपका वजन उस लिमिट से ऊपर है, तो सवारी करना गैरकानूनी तक हो सकता है.
अब सवाल सिर्फ आपके मजे का नहीं रह गया है. सवाल ये है कि जिस सवारी को आप एंजॉय करते आए हैं, क्या वो जानवरों के लिए दर्द बन चुकी है? ऐसे में कहना गलत नहीं होगा कि आपका बढ़ता वजन आपकी छुट्टियों का न केवल मजा कम कर सकता है, बल्कि आपकी छुट्टियों को गैरकानूनी भी बना सकता है.
विदेशों में बदल रहे हैं नियम
घोड़ों और गधों पर सवारी करने का ट्रेंड केवल भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी कई दशकों से रहा है. ऐसे में कहना गलत नहीं होगा कि लोगों का मजा पिछले कई दशकों से जानवरों के लिए सजा बन रहा है. नतीजतन दुनिया के कई देश अब जानवरों की सुरक्षा को लेकर सख्त हो गए हैं और नए नियम लागू कर रहे हैं.
ग्रीस के सैंटोरनी में 2018 से इसको लेकर साफ नियम है कि 100 किलो से ज्यादा वजन वाले लोग गधों की सवारी नहीं कर सकते. इसके साथ ही एक और अहम नियम है कि कोई भी जानवर अपने शरीर के वजन का सिर्फ 20% तक ही बोझ उठा सकता है, ताकि उसे चोट ना लगे या परेशानी न हो. स्पेन के मिजास में ‘डंकी टैक्सी’ के लिए भी सवारी और वजन की लिमिट तय कर दी गई है. यहां ये भी ध्यान रखा जाता है कि जानवरों को बीच-बीच में आराम दिया जाए.साथ ही, गधों पर 80 किलो से ज्यादा वजन का कोई भी आदमी नहीं बैठ सकता.
वहीं मिस्र के गीजा पिरामिड्स पर जानवरों के साथ हो रहे अत्याचार के एक-दो नहीं बल्कि कई मामले सामने आए. इसके बाद अब वहां ऊंट, घोड़े और गधों की सवारी पर बैन लगा दिया गया है. जॉर्डन के पेट्रा में भी जानवरों की सवारी के नियमों में बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां धीरे-धीरे जानवरों की जगह इलेक्ट्रिक गाड़ियों का इस्तेमाल शुरू किया जा रहा है, ताकि उन पर निर्भरता कम हो सके और उन्हें राहत मिले.
क्या कहती है साइंस?
अब सवाल ये है कि जब पिछले कई दशकों से लोग गधे-घोड़ों पर बैठकर हिल स्टेशन घूम रहे हैं, तो आखिर अब अचानक उनके लिए इतनी भावनाएं क्यों जाग गई हैं? तो इसका जवाब है कि ये बदलाव सिर्फ भावनाओं के कारण नहीं किए जा रहे, बल्कि इसके पीछे पक्के वैज्ञानिक कारण हैं.
वैज्ञानिकों के अनुसार, जानवरों पर जरूरत से ज्यादा वजन डालना उनके शरीर के लिए बहुत ज्यादा नुकसानदायक होता है. रिसर्च बताती है कि घोड़े को उसके शरीर के वजन का 20% से ज्यादा बोझ नहीं उठाना चाहिए. इसी तरह गधों पर हुई एक स्टडी में पाया गया कि करीब 160 किलो वजन वाला गधा अपनी पीठ पर लगभग 50 किलो तक ही वजन आराम से उठा सकता है. वहीं ऊंट भी एक सीमा तक ही वजन लेकर लंबी दूरी तय कर सकते हैं.
अगर इनसे ज्यादा वजन उन पर डाला जाए, तो जानवरों की रीढ़, जोड़ों और मांसपेशियों पर बहुत दबाव पड़ता है. इससे उन्हें दर्द, चोट और लंबे समय तक रहने वाली बीमारियां हो सकती हैं. ऐसे में ये नियम सिर्फ नियम नहीं हैं, बल्कि जानवरों की सेहत को लेकर उठाया जाने वाला जरूरी कदम है.
क्या भारत में भी हैं कानून?
जानवरों से जुड़े कानून सिर्फ विदेशों में ही नहीं बल्कि भारत में भी हैं. लेकिन माजरा ये है कि उनका सख्ती से पालन नहीं किया जाता है. भारत में जानवरों की सुरक्षा के लिए कानून तो बने हुए हैं, लेकिन ज्यादातर मामलों में ये सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह जाते हैं.
प्रिवेशन ऑफ क्रूएल्टी टू एनिमल्स एक्ट, 1960 और ड्रॉट एंड पैक एनिमल्स रूल्स, 1965 (Prevention of Cruelty to Animals Act, 1960 और Draught and Pack Animals Rules, 1965) के तहत ये तय किया गया है कि गधा अधिकतम 50 किलो, टट्टू (पोनी) 70 किलो और ऊंट 250 किलो तक ही वजन उठा सकते हैं. इसके साथ ही जानवरों के लगातार काम करने के घंटों पर भी रोक लगाई गई है.
अगस्त 2025 में तीर्थ यात्राओं के दौरान इस्तेमाल होने वाले जानवरों के लिए नई गाइडलाइंस भी जारी की गई थीं. इन गाइडलाइंस के मुताबिक, गधे पर करीब 25 किलो, टट्टू पर लगभग 50 किलो और घोड़े व खच्चर पर 80 से 90 किलो तक वजन का भार डालना ही सही माना गया है. साथ ही रात में जानवरों से काम करवाने पर रोक लगाई गई है, बीमार या गर्भवती जानवरों का इस्तेमाल न करने के लिए बोला गया है, और उनके नियमित हेल्थ चेकअप व आराम को जरूरी बताया गया.
कागजों से परे है जमीनी हकीकत
ये तो हुई कागजी नियमों की बात, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है. शिमला और मसूरी जैसे हिल स्टेशनों पर घोड़े की सवारी हो या राजस्थान में ऊंट सफारी अक्सर इन नियमों का पालन नहीं किया जाता है. न तो वजन की जानकारी दी जाती है, न ही ठीक से जांच होती है, और न ही लोग इस पर सवाल उठाते हैं. नतीजा ये है कि कानून होने के बावजूद जानवरों के साथ होने वाली तकलीफें जारी रहती हैं, क्योंकि इसे धीरे-धीरे नॉर्मल मान लिया गया है.
क्या भविष्य में बंद हो जाएंगी ये सवारियां?
अगर आपके मन में यही सवाल है तो इसका जवाब हां है. कई जगहों पर इसकी शुरुआत हो चुकी है. जैसे पेट्रा में जानवरों की जगह इलेक्ट्रिक गाड़ियां लाई जा रही हैं. विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले समय में जानवरों की सवारी कम हो सकती है या पूरी तरह खत्म भी हो सकती है.
ऐसे में अगर आपका वजन 80 किलों से ज्यादा है और आप छुट्टियों पर घोड़े या खच्चर की सवारी करने का मन बना रहे हैं तो सतर्क हो जाएं. इतना ही नहीं, ये आपकी छुट्टियों को गैरकानूनी भी बना सकता है.
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