पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के लिए ट्रंप कार्ड है ‘M फैक्टर’. राजनैतिक विश्लेषणों में इस ‘M फैक्टर’ को मुसलमानों से जोड़कर देखा जाता है. लेकिन बंगाल में ममता के लिए ‘M फैक्टर’ का मतलब महिलाओं से भी है. सिर्फ पिछले बंगाल विधानसभा चुनावों का ही जायजा लें तो पता चलता है कि ममता के प्रति पुरुषों की तुलना में महिलाओं में ज्यादा निष्ठा है. 2021 में 50 फीसदी महिलाओं ने तृणमूल कांग्रेस को वोट दिया था, जबकि 37 फीसदी महिलाओं ने बीजेपी को. 46 फीसदी पुरुषों ने टीएमसी को वोट दिए, जबकि 40 फीसदी पुरुषों ने बीजेपी को वोट दिया.

बंगाल में ममता और महिलाओं के इस गठजोड़ को तोड़ना बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी. क्योंकि, देश के बाकी राज्यों में महिला प्रधान योजनाओं के जरिए बीजेपी ने महिला वोटरों को बखूबी अपने हक में कर लिया है. हाल ही में बिहार में महिला वोटर की बड़ी भूमिका देखने को मिली थी, और उससे पहले मध्य प्रदेश से महाराष्ट्र तक वैसी ही कहानी सुनने को मिली थी – 2020 के बिहार चुनाव के नतीजे आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महिलाओं को साइलेंट वोटर कह कर संबोधित किया था.

ममता बनर्जी का M-फैक्टर पहले से ही ‘मां, माटी और मानुष’ रहा है, अब तो इस सीरीज में ‘माछ’ भी जुड़ गया है – पश्चिम बंगाल के चुनाव में इस बार माछ-भात खाने सुविधा और थाली छीन लेने पर बहस होने लगी है. माछ-भात के मसले पर बीजेपी और टीएमसी कदम-कदम पर दो-दो हाथ कर रहे हैं.

बंगाल चुनाव के घोषणा पत्र में BJP ने खोला महिलाओं के लिए वादों का पिटारा

-अमित शाह ने शुक्रवार को बीजेपी का संकल्प पत्र जारी करते हुए बंगाल की महिलाओं को 3000 रुपए देने का वादा किया. ये ममता बनर्जी की लक्ष्मी भंडार योजना (Laxmir Bhandar scheme) की काट है, जिसमें महिलाओं को 1500 रुपए दिए जाते हैं. पिछले कुछ विधानसभा चुनाव नतीजों को देखें तो ऐसी योजनाएं ही हार-जीत तय कर रही हैं.

-सरकारी नौकरियों में महिआओं को 33% आरक्षण देने का वादा किया गया है. इतना ही नहीं, बेरोजगारों को अलग से 3000 रुपए देने की बात कही गई है.

-बंगाल में रेप और महिला सुरक्षा के मुद्दे को भुनाने के लिए बीजेपी ने एक अलग स्कवॉड बनाने की बात कही है. इसे पार्टी ‘भयमुक्त बंगाल’ बनाने के प्रोजेक्ट के रूप में पेश कर रही है. बीजेपी का वादा है कि हर मंडल में महिला थाना और महिला डेस्क बनाई जाएगी.

-गर्भवती महिलाओं को 21000 रुपए की आर्थिक मदद देने का वादा है. इसके अलावा बंगाल में 75 लाख लखपति दीदी बनाने का लक्ष्य है.

महिलाओं पर ममता की मेहरबानी

सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट मेनका गुरुस्वामी LGBTQ कम्युनिटी से संसद पहुंचने वाली पहली महिला बन गई हैं, तो उसका क्रेडिट ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस को ही जाता है. ऐसा करके ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में महिला हितों की सबसे बड़ी पैरोकार होने का दावा पेश किया है.

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भी 291 उम्मीदवारों में से 52 महिलाओं को टिकट देकर ममता बनर्जी ने एक और दांव खेला है. यह ठीक है कि 33 फीसदी या 50 फीसदी तो नहीं है, लेकिन 18 फीसदी तो है ही. 2029 के लोकसभा चुनाव से महिला आरक्षण लागू किए जाने की कोशिश है, जिसके लिए 16 अप्रैल से बजट सत्र के एक्सटेंशन के रूप में संसद का विशेष सत्र बुलाया गया है.

2021 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की 215 में से 33 महिला विधायक चुनकर आई थीं, जबकि बीजेपी के 77 विधायकों में से 6 महिलाएं थीं. मौजूदा लोकसभा में भी टीएमसी के 29 सांसदों में से 11 महिलाएं हैं.

बंगाल में तृणमूल सरकार की कल्याणकारी योजनाएं

एक रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल महिला स्वामित्व वाले MSME के मामले में देश में पहले स्थान पर है. देश के कुल महिला स्वामित्व वाले MSME में बंगाल की हिस्सेदारी 23.42 फीसदी है. MSME की संख्या के मामले में भी पश्चिम बंगाल सूची में सबसे ऊपर बना हुआ है.

2016 के चुनाव में महिलाओं के मिले समर्थन के बाद ममता बनर्जी की सरकार ने महिलाओं के लिए कन्याश्री और रूपश्री जैसी कल्याणकारी योजनाएं शुरू की थी. इन योजनाओं के तहत लड़कियों को शिक्षा और शादी के लिए राज्य सरकार आर्थिक सहायता देती है.

1. ममता बनर्जी को जिन सरकारी योजनाओं से ज्यादा चुनावी फायदा मिलता है उनमें लक्ष्मी भंडार सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है. 2026 के बजट में पश्चिम बंगाल सरकार ने महिलाओं को दी जाने वाली आर्थिक सहायता राशि में इजाफा किया है. लक्षमी भंडार योजना के तहत महिलाओं को मिलने वाली आर्थिक मदद में 500 रुपये हर महीने की बढ़ोतरी की गई है. 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले ममता बनर्जी ने पांच सौ रुपये बढ़ाए थे, और अब विधानसभा चुनाव से ठीक पहले इसमें और पांच सौ रुपये और जोड़ दिए गए हैं. सरकार ने घोषणा की है कि सामान्य वर्ग की सभी पात्र महिलाओं को अब हर महीने 1500 रुपये मिलेंगे.

2. रूपश्री योजना के तहत विवाह के समय 22.02 लाख महिलाओं को 25,000 रुपये की आर्थिक मदद दी गई है. तृणमूल  सरकार का दावा है कि रूपश्री योजना से आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की महिलाओं की नई जिंदगी को  सम्मानजनक शुरुआत मिली है.

3. कन्याश्री योजना ने छात्राओं की शिक्षा में काफी मददगार साबित हुई है. करीब 1 करोड़ छात्राओं को पढ़ाई जारी रखने के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की गई है, जिस पर 16,554 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए गए हैं.

4. पश्चिम बंगाल सरकार ‘मुक्तिर आलो योजना’ के तहत सामाजिक रूप से वंचित और पीड़ित महिलाओं को व्यावसायिक प्रशिक्षण देती है. 2025 में इस स्कीम पर 1.47 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं, जिसकी बदौलत हजारों महिलाओं का कौशल विकास और आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिला है.

बीजेपी भी महिला वोट बैंक को अपने पाले में मिलाने में जुटी है

ममता बनर्जी और पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस सरकार का दावा अपनी जगह है, और बीजेपी अपनी रणनीति पर काम कर रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय मंत्री अमित शाह बंगाल में परिवर्तन का नारा देते हुए 4 मई को पश्चिम बंगाल से ममता बनर्जी की विधाई का दावा कर रहे हैं. 4 मई को वोटों की गिनती के बाद विधानसभा चुनाव के नतीजे आने हैं.

2026 के बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जहां मेनका गुरुस्वामी को राज्यसभा भेज कर महिला सशक्तिकरण के प्रति नए सिरे से अपना इरादा जाहिर किया है, बीजेपी ने आर जी कर रेप-मर्डर केस पीड़ित की मांग को उम्मीदवार बनाकर तृणमूल कांग्रेस के शासन में महिला सुरक्षा की स्थिति पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है.

बीजेपी ममता बनर्ज को पश्चिम बंगाल में कानून-व्यवस्था और महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे पर कठघरे में खड़ा कर रही है. पश्चिम बंगाल में कभी न खत्म होने वाली चुनावी हिंसा के बहाने बीजेपी को यह मौका भी मिल रहा है. चुनाव आयोग ने भी चुनावी हिंसा रोकने के नाम पर ही पश्चिम बंगाल में पूरे पुलिस-प्रशासन का तबादला भी किया है.

संदेशखाली में महिलाओं के साथ कथित रेप और यौन उत्पीड़न का मामला, कोलकाता के आर. जी. कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में एक जूनियर डॉक्टर के साथ रेप और हत्या का मामला, और कोलकाता के ही एक लॉ कालेज में एक छात्रा के साथ गैंग रेप घटना – ये सब ऐसे मुद्दे हैं जिनके बहाने बीजेपी को ममता बनर्जी को सीधे टार्गेट करने का मौका मिल जाता है.

जैसे 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने संदेशखाली का मुद्दा उठाने के लिए रेखा पात्रा को बशीरहाट से उम्मीदवार बनाया था, मौजूदा विधानसभा चुनाव में रत्ना देबनाथ को पानीहाटी विधानसभा क्षेत्र से टिकट दिया है. रत्ना देबनाथ, आर जी कर मेडिकल कॉलेज की पीड़ित छात्रा की मां हैं, जिन्होंने चुनावों से कुछ दिन पहले ही अपनी पहचान सार्वजनिक की थी.

पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी का आरोप है कि एक महिला के राज में भी बंगाल की महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं. शुभेंदु अधिकारी अपनी दलील मजबूत बनाने के लिए संदेशखाली और आर जी कर मेडिकल कॉलेज की घटनाओं का उदाहरण देते हैं.

पश्चिम बंगाल में महिला वोटर

1. पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट के SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, पुरुषों की तुलना में महिला वोटर की संख्या में काफी गिरावट दर्ज की गई है, फिर भी महिला वोटर का दबदबा कायम है, और फिर से निर्णायक भूमिका निभाने के लिए तैयार देखी जा रही है.

2. पश्चिम बंगाल में महिला वोटर की संख्या करीब 3.44 करोड़ है, जबकि पुरुष वोटर 3.60 करोड़ हैं. पश्चिम बंगाल के के 7.04 करोड़ वोटर में आधी आबादी की तादाद आधे से कुछ ही कम है. वोट देने के मामले में नंबर निश्चित तौर पर मायने रखते हैं, लेकिन वोट दिलाने में कैसा प्रभाव रहता है, ज्यादा मायने रखता है.

3. जेंडर रेश्यो की बात करें तो फिलहाल 964 महिलाएं प्रति 1000 पुरुष हैं, जबकि 2025 में 1000 पुरुषों के मुकाबले महिलाओं संख्या 969 थी.

4. चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, 2006 के बंगाल विधानसभा चुनाव में 80.75 फीसदी महिलाओं ने वोट डाले थे, और 5 साल बाद आंकड़ा बढ़कर 84.45 फीसदी तक पहुंच गया. 2016 में यह आंकड़ा 94.42 फीसदी दर्ज किया गया था.  2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान 81.75 फीसदी महिलाओं ने वोट डाले थे, जो पुरुषों के 81.37 फीसदी के मुकाबले थोड़ा ज्यादा थे.

5. पश्चिम बंगाल में राज्य की कम से कम दो दर्जन विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां पुरुषों के मुकाबले महिला मतदाताओं का नंबर ज्यादा होने के कारण उनका पूरा दबदबा है. 2021 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनाव में ममता बनर्जी के लिए मजबूत सपोर्ट बेस यही बना था, जिसकी बदौलत टीएमसी ने बीजेपी को बेहद चुनौतीपूर्ण मुकाबले शिकस्त दी थी.

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