पटना हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, 5 साल पुराने रिंकू हत्याकांड की जांच करेंगे IPS विकास वैभव – Patna High court hands over investigation of 5 year old death case to IPS officer Vikas Vaibhav lclnt

ByCrank10

April 11, 2026


पटना हाई कोर्ट ने बेगूसराय की रिंकू कुमारी संदिग्ध मौत मामले में बड़ा दखल देते हुए स्थानीय पुलिस की जांच पर गंभीर सवाल उठाए हैं. अदालत ने पुलिस की ‘आत्महत्या’ की थ्योरी को खारिज कर मामले की दोबारा जांच के आदेश दिए हैं. न्यायमूर्ति संदीप कुमार की एकल पीठ ने कहा कि निष्पक्ष और सही जांच, निष्पक्ष सुनवाई के मौलिक अधिकार का अहम हिस्सा है. अदालत ने शुरुआती जांच में गंभीर खामियां पाई और कहा कि जांच को गलत दिशा में ले जाया गया.

अदालत ने इस मामले की जांच वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी विकास वैभव को सौंपते हुए उनके नेतृत्व में विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने का निर्देश दिया है. कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह आदेश असामान्य है, क्योंकि पहली बार उच्च न्यायालय ने किसी विशेष अधिकारी पर सार्वजनिक रूप से भरोसा जताते हुए सीधे जांच सौंपी है.

क्या हैं परिवार के आरोप?
विकास वैभव ने कहा कि वह अदालत के भरोसे पर खरा उतरने की पूरी कोशिश करेंगे. वे ‘लेट्स इंस्पायर बिहार’ नामक सामाजिक पहल भी चलाते हैं, जिसके माध्यम से शिक्षा और जागरूकता को बढ़ावा दिया जाता है. यह मामला तेजस्विनी कुमारी की याचिका पर सामने आया, जिसमें आरोप लगाया गया कि पुलिस ने शुरुआत से ही मामले को कमजोर करने की कोशिश की. परिवार का दावा था कि यह पूर्व नियोजित हत्या है, जबकि पुलिस ने इसे आत्महत्या बताकर पर्याप्त साक्ष्य के बिना क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी.

याचिका में यह भी बताया गया कि रिंकू कुमारी ने जमीन सौदे के लिए दो पड़ोसियों को करीब 15 लाख रुपये अग्रिम दिए थे. पैसे लौटाने में टालमटोल के बाद पंचायत में 4 अप्रैल 2021 को भुगतान का वादा हुआ था. उसी दिन रिंकू स्कूल के लिए निकलीं, लेकिन बाद में परिसर में संदिग्ध हालत में उनका शव मिला.

शव की स्थिति ने भी आत्महत्या की थ्योरी पर सवाल खड़े किए. शरीर पर मिट्टी और धूल लगी थी और गले में फंदा संदिग्ध हालात में पाया गया. परिवार ने आरोप लगाया कि प्रभावशाली लोगों को बचाने के लिए पुलिस ने एफआईआर में उनके नाम शामिल नहीं किए.

करीब पांच साल से न्याय की लड़ाई लड़ रही तेजस्विनी कुमारी के लिए अदालत का यह आदेश नई उम्मीद लेकर आया है. अब निगाहें एसआईटी जांच पर टिकी हैं, जो पुराने साक्ष्यों की फिर से जांच करेगी, छूटे हुए कड़ियों को जोड़ेगी और यह पता लगाएगी कि क्या इस मामले में कोई आपराधिक साजिश थी.

अदालत ने यह भी संकेत दिए हैं कि पहले की जांच में शामिल अधिकारियों की भूमिका की भी समीक्षा हो सकती है. यह फैसला न सिर्फ एक पुराने मामले को नई दिशा देता है, बल्कि बिहार में पुलिस जांच की विश्वसनीयता पर भी बड़े सवाल खड़े करता है.

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