अमेरिका और ईरान के बीच चली लंबी और तनावपूर्ण जंग अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां बंदूकें कुछ समय के लिए खामोश जरूर हुई हैं, लेकिन असली लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई. इस्लामाबाद में हुई बातचीत भले ही किसी ठोस समझौते तक नहीं पहुंच सकी, लेकिन एक अस्थायी सीजफायर ने दोनों देशों को सोचने का मौका जरूर दिया है.
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अमेरिका इस जंग से “जीत” के साथ बाहर निकल सकता है? और उससे भी बड़ा सवाल ये है कि क्या राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ऐसा रास्ता निकाल पाएंगे, जिससे उनकी साख भी बची रहे और दुनिया को एक बड़े संकट से भी बचाया जा सके?
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यह सिर्फ एक युद्ध का सवाल नहीं है, बल्कि यह अमेरिका की राजनीति, अर्थव्यवस्था और वैश्विक नेतृत्व की परीक्षा भी है. अगर अमेरिकी जनता को यह लगा कि यह जंग बेकार थी, तो इसका असर सीधे चुनावों पर पड़ेगा. लेकिन अगर ट्रंप हालात को संभाल लेते हैं, तो यह उनके लिए बड़ी राजनीतिक जीत साबित हो सकती है.
ऐसे में सवाल उठता है कि ट्रंप के पास क्या विकल्प हैं? किन रास्तों पर चलकर वह इस जंग से बाहर निकल सकते हैं? आइए इसे 7 बड़े पॉइंट्स में समझते हैं.
1. होर्मुज स्ट्रेट को हर हाल में खुलवाना
इस पूरे संघर्ष का सबसे अहम सेंट्रल पॉइंट होर्मुज स्ट्रेट बन चुका है. यह वही समुद्री रास्ता है, जहां से दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल सप्लाई होता है. अगर यह बंद रहता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था हिल सकती है. अमेरिका के लिए सबसे पहली प्राथमिकता यही होनी चाहिए कि इस रास्ते को हर हाल में खुलवाया जाए. क्योंकि इसका सीधा असर तेल की कीमतों और आम लोगों की जिंदगी पर पड़ता है. अगर ट्रंप इस मोर्चे पर सफल होते हैं, तो वह घरेलू स्तर पर भी अपनी स्थिति मजबूत कर सकते हैं और अमेरिकियों को ये भरोसा दे सकते हैं कि ईरान असल में एक थ्रेट था.
2. ईरान के उथल-पुथल मचाने से भी ट्रंप का फायदा
जंग के दौरान ईरान की सैन्य ताकत को काफी नुकसान पहुंचा है, खासकर उसकी रिवोल्यूशनरी गार्ड फोर्स को. ऐसे में अमेरिका के पास मौका है कि वह सीधे युद्ध के बजाय अंदरूनी दबाव बढ़ाए. प्रदर्शनों को तेज करे और विरोधियों को समर्थन दे. यह दबाव आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर हो सकता है. हालांकि, इसमें एक संतुलन जरूरी है.
अगर अमेरिका ज्यादा तबाही मचाता है जैसे कि ईरान के बुनियादी ढांचों पर हमले करता है तो बात पटरी से उतर सकती है. ऐसा करने के लिए अमेरिका को ईरान की तेल रिफाइनरी और ब्रिज कनेक्टिविटी पर हमले बंद करना होगा, जिससे आम लोग प्रभावित होते हैं. अगर इन बुनियादी ढांचे पर हमले जारी रहते हैं तो इससे आम जनता सरकार के समर्थन में आ सकती है और यह दांव अमेरिका के लिए ही उलटा पड़ सकता है. मसलन, रणनीति ऐसी होनी चाहिए जो सत्ता पर दबाव बनाए, न कि जनता को प्रभावित करे.
3. अपने सहयोगियों के साथ रिश्ते सुधारना
इस जंग ने अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के बीच दूरी भी बढ़ा दी है. यूरोप और नाटो के कई देश इस युद्ध से खुश नहीं थे. ऐसे में ट्रंप के लिए जरूरी है कि वह अपने पारंपरिक सहयोगियों के साथ रिश्ते सुधारें. क्योंकि ईरान जैसे मुद्दों पर अकेले लड़ना मुश्किल है. अगर पश्चिमी देश एकजुट होते हैं, तो ईरान पर दबाव और प्रभावी तरीके से बनाया जा सकता है. मसलन, होर्मुज स्ट्रेट को खुलवाने के मामले को अमेरिका अपने सहयोगियों को एकजुट करने के लिए इस्तेमाल कर सकता है. इस बीच ब्रिटेन ने सहयोग करने की बात भी कही है.
4. मैसेजिंग और नैरेटिव को सुधारना
जंग सिर्फ मैदान में नहीं लड़ी जाती, बल्कि जनता के बीच भी लड़ी जाती है. अभी अमेरिका के अंदर इस जंग को लेकर काफी मतभेद हैं. खुद ट्रंप के समर्थक इस जंग से नाखुश हैं. ट्रंप की आक्रामक बयानबाजी ने कई बार स्थिति को और उलझाया है. उनके कुछ बयान सहयोगियों को भी असहज कर चुके हैं. जैसे कि उन्होंने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों का खुलेआम मजाक उड़ाया. इनके अलावा जंग के बीच जब ब्रिटेन ने समर्थन देने से इनकार किया तो ट्रंप ने ब्रिटिश पीएम स्टार्मर को कायर तक कह दिया. इससे सहयोगी देशों ने ट्रंप की अपील को दरकिनार कर दिया और हालात और ज्यादा बिगड़ गए. मसलन, इस जंग के दौरान अमेरिका नैरिटिव के मोर्च पर विफल नजर आया है.
5. शांति का एक साफ रोडमैप दिखाना होगा
सिर्फ जंग जीतने की बात करना काफी नहीं है. लोगों को यह भी बताना होगा कि शांति कैसी दिखेगी. अमेरिका को ईरान और पूरे क्षेत्र के लिए एक विजन पेश करना होगा, जहां स्थिरता हो, आर्थिक विकास हो और लगातार संघर्ष न हो. अरब मुल्क, जो फिलहाल वेट एंड वॉच की स्थिति में है उन्हें यह भरोसा दिलाना होगा कि ईरान में सत्ता परिवर्तन से उनका ही फायदा है. अगर ट्रंप यह दिखाने में सफल होते हैं कि शांति से क्या फायदे होंगे, तो इससे बातचीत का रास्ता आसान हो सकता है. मसलन, अरब समेत दुनिया के मुल्कों को यह लगता है कि अमेरिका इजराइल के लिए लड़ रहा है और इससे सिर्फ और सिर्फ इजरायल का ही फायदा है.
6. साफ शर्तों के साथ शांति समझौता तैयार करना
किसी भी स्थायी समाधान के लिए स्पष्ट शर्तें जरूरी होती हैं. अमेरिका को यह तय करना होगा कि वह ईरान से क्या चाहता है. इसमें सबसे अहम मुद्दे हैं परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल क्षमता और क्षेत्रीय प्रॉक्सी हैं. यह आम बात है कि ईरान के प्रॉक्सी इजरायल के खिलाफ हैं, जिससे ईरान कभी समझौता नहीं करेगा.
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इनके अलावा परमाणु बम बनाने के आरोपों से ईरान पहले ही इनकार कर चुका है. अमेरिका चाहता है कि उसे यूरेनियम संवर्धन रोकना होगा, जिसको लेकर ईरान का पक्षा है कि वो सिर्फ नागरिक इस्तेमाल के लिए है. मिसाइल प्रोग्राम को लिमिट करना ईरान अपने सुसाइड मानता है. मसलन, जरूरी है कि शर्तें इतनी कठोर न हों कि ईरान उन्हें मानने से ही इनकार कर दे. एक संतुलित और व्यवहारिक समझौता ही आगे बढ़ सकता है.
7. इजरायल के साथ तालमेल बैठाना
इस पूरे संघर्ष में इजरायल की भूमिका भी बेहद अहम है. इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की रणनीति और अमेरिका की प्राथमिकताएं हमेशा एक जैसी नहीं रही हैं. ऐसे में ट्रंप के लिए जरूरी है कि वह इजरायल के साथ खुलकर बात करें और दोनों देशों के लक्ष्य एक जैसे हों. जैसे कि युद्धविराम को लेकर जिस तरह से कन्फ्यूजन पैदा हुआ और इजरायल ने उसे मानने से इनकार कर दिया. अगर दोनों अलग-अलग दिशा में चलते हैं, तो न सिर्फ जंग लंबी खिंचेगी बल्कि शांति की संभावना भी कमजोर हो जाएगी.
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