ऑपरेशन मेघदूत को 42 साल पूरे हुए, सियाचिन पर दुनिया का सबसे लंबा सैन्य मिशन – Operation Meghdoot 42 years World Longest Military Mission Siachen


भारतीय सेना का ऑपरेशन मेघदूत 42 साल पूरे कर चुका है. 13 अप्रैल 1984 को शुरू हुआ यह अभियान आज भी दुनिया का सबसे लंबा सैन्य मिशन माना जाता है. सियाचिन ग्लेशियर पर भारतीय जवान लगातार डटे हुए हैं. यह जगह दुनिया की सबसे ऊंची और सबसे कठिन लड़ाई की जगह है.

पाकिस्तान को रोकने के लिए भारतीय सेना ने यहां कब्जा किया था. आज 13 अप्रैल को सियाचिन दिवस मनाया जाता है ताकि उन बहादुर सैनिकों को सलाम किया जा सके जो इस बर्फीले मैदान में देश की रक्षा कर रहे हैं. सियाचिन ग्लेशियर 14,000 से 22,000 फीट की ऊंचाई पर है. यहां हर तरफ बर्फ ही बर्फ है.

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यह एक ग्लेशियर है यानी मोटी बर्फ की चादर जो लगातार सरकती रहती है. एक जगह से दूसरी जगह जाना बेहद खतरनाक है क्योंकि बीच में छिपे दरारें दिखाई नहीं देतीं. इनमें गिरने से कई दुर्घटनाएं हो चुकी हैं. तापमान -40 डिग्री तक पहुंच जाता है. इतनी ठंड में भी भारतीय सैनिक ड्यूटी देते रहते हैं. यहां पहुंचना ही मुश्किल है. रहना और भी मुश्किल. आम आदमी तो यहां कुछ दिन भी नहीं टिक सकता.

ऑपरेशन मेघदूत सियाचिन ग्लेशियर

ऑपरेशन मेघदूत की शुरुआत और भारतीय वायुसेना की भूमिका

13 अप्रैल 1984 को भारतीय सेना और भारतीय वायुसेना ने मिलकर ऑपरेशन मेघदूत शुरू किया. वायुसेना के हेलीकॉप्टरों ने सैनिकों को ग्लेशियर की चोटियों पर उतारा. वास्तव में वायुसेना 1978 से ही यहां चेतक हेलीकॉप्टर उड़ा रही थी. 1984 तक पाकिस्तान अपनी नक्शों में सियाचिन पर कब्जा दिखा रहा था.

विदेशी पर्वतारोहियों को भेज रहा था. भारत को खुफिया जानकारी मिली कि पाकिस्तान यहां सैन्य कार्रवाई करने वाला है. इसलिए भारतीय सेना ने ऊंची चोटियों पर कब्जा कर लिया. पाकिस्तानी सेना जब तक पहुंची तब तक भारतीय जवान रणनीतिक रूप से मजबूत जगहों पर थे.

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पिछले 42 साल में भारतीय सेना ने यहां 1158 से ज्यादा जवान खो दिए हैं. ज्यादातर मौत ठंड, बर्फीले तूफान और दरारों में गिरने से हुई. हर इन्फैंट्री सैनिक की सेवा में कम से कम एक बार सियाचिन में तैनाती जरूरी है. यहां 90 दिन तक रहना पड़ता है. परिवार से दूर, बिना बुनियादी सुविधाओं के जवान दुश्मन पर नजर रखते हैं. सेना की कड़ी ट्रेनिंग और सैनिकों का हौसला उन्हें दुश्मन के सामने अटल रखता है.

ऑपरेशन मेघदूत सियाचिन ग्लेशियर

वायुसेना की बढ़ती भूमिका

शुरू में सिर्फ ट्रांसपोर्ट विमान और हेलीकॉप्टर थे. बाद में हंटर विमानों ने 1984 में लेह से उड़ान भरी. कुछ सालों में 700 से ज्यादा सॉर्टी हो चुकी थीं. अब राफेल, सु-30 एमकेआई, चिनूक, अपाचे, एएलएच, एलसीएच प्रचंड, मिग-29, मिराज-2000, सी-17, सी-130जे, आईएल-76 और एएन-32 जैसे सभी विमान सियाचिन की मदद करते हैं. 2009 में चीता हेलीकॉप्टर शामिल हुए जो ऊंचाई पर ज्यादा लोड ले जा सकते हैं. 2013 में सी-130जे सुपर हरक्यूलिस ने दौलत बेग ओल्डी पर लैंडिंग कर रिकॉर्ड बनाया.

पिछले छह साल में सेना ने सियाचिन को और मजबूत बनाया है. पूरे ग्लेशियर पर ट्रैक बनाए गए हैं. ऑल टेरेन व्हीकल (एटीवी) और डीआरडीओ के एटीवी ब्रिज आए हैं जिससे आवाजाही आसान हुई. ड्रोन और भारी हेलीकॉप्टर से सप्लाई पहुंचाना आसान हो गया. खास कपड़े, माउंटेनियरिंग किट और बेहतर राशन दिए जा रहे हैं.

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हर सैनिक के पास पॉकेट वेदर ट्रैकर है जो तूफान की चेतावनी देता है. अब फॉरवर्ड पोस्ट पर ताजा सब्जी और राशन पहुंचता है. मोबाइल और इंटरनेट कनेक्टिविटी बढ़ गई है. वीएसएटी तकनीक से रीयल टाइम कम्युनिकेशन हो रहा है. टेलीमेडिसिन के जरिए इसरो ने बेहतरीन मेडिकल सुविधा उपलब्ध कराई है.

हर साल 13 अप्रैल को सियाचिन दिवस मनाया जाता है. यह दिन उन सैनिकों की बहादुरी को याद करने का दिन है जो दुनिया के सबसे कठिन युद्ध क्षेत्र में 42 साल से डटे हुए हैं. ऑपरेशन मेघदूत सिर्फ एक सैन्य अभियान नहीं बल्कि भारतीय सेना और वायुसेना की जज्बे की मिसाल है. ठंड, बर्फ और दुश्मन के बावजूद जवान देश की सीमा की रक्षा कर रहे हैं. रक्षा बजट बढ़ाने और नई तकनीक लाने से सेना और भी तैयार है.

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