पनामा का गोल्डन फ्रॉग यानी सुनहरा मेंढक बचाने की तैयारी चल रही है. ताकि उसकी प्रजाति खत्म होने से बचाई जा सके. पनामा एम्फीबियन रेस्क्यू एंड कंजर्वेशन प्रोजेक्ट के डायरेक्टर रोबर्टो इबानेज गाम्बोआ एम्फीबियन रिसर्च एंड कंजर्वेशन सेंटर में खूबसूरत सुनहरा मेंढक दिखा रहे हैं. इसका साइंटिफिक नाम एटेलोपस जेटेकी है.

यह पनामा का राष्ट्रीय प्रतीक माना जाता है लेकिन आज यह प्रजाति विलुप्त होने की कगार पर है. गाम्बोआ सेंटर इसी मेंढक और दूसरे लुप्तप्राय मेंढकों को बचाने के लिए दिन-रात काम कर रहा है. वैज्ञानिक रोबर्टो इबानेज इस प्रोजेक्ट को कई सालों से चला रहे हैं. अब कैद में पैदा हुए इन मेंढकों को जंगलों में वापस छोड़ने की तैयारी कर रहे हैं.

पनामियन गोल्डन फ्रॉग यानी सुनहरा मेंढक पनामा के मध्य पहाड़ी इलाकों की तेज बहने वाली नदियों में पाया जाता था. इसका शरीर चमकदार पीला होता है जो दूर से सोने जैसा दिखता है. यह मेंढक पनामा की संस्कृति और प्रकृति का प्रतीक है. लोग इसे खुशहाली का संकेत मानते थे.

यह भी पढ़ें: World Frog Day: इंसानों के लिए क्यों जरूरी हैं मेंढक? खत्म हुए तो न पानी बचेगा न फसल

पनामायन सुनहरा मेंढक

1980 के दशक में एक फंगल बीमारी चाइट्रिड फंगस पूरे क्षेत्र में फैल गई. इस बीमारी ने मेंढकों की त्वचा को नष्ट कर दिया और वे सांस नहीं ले पाए. 2009 के बाद जंगलों में इस मेंढक को देखना लगभग नामुमकिन हो गया. आज यह प्रजाति जंगल में विलुप्त मानी जाती है. केवल कैद में ही कुछ मेंढक बचे हैं जो गाम्बोआ सेंटर जैसे जगहों पर सुरक्षित हैं.

रोबर्टो इबानेज का संघर्ष और गाम्बोआ सेंटर

रोबर्टो इबानेज पनामा के जाने-माने मेंढक विशेषज्ञ हैं. वे स्मिथसोनियन ट्रॉपिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक हैं और पनामा एम्फीबियन रेस्क्यू प्रोजेक्ट के प्रमुख हैं. गाम्बोआ सेंटर पनामा सिटी के पास रेनफॉरेस्ट के किनारे स्थित है. यहां लुप्तप्राय मेंढक की 12 प्रजातियों को बचाया जा रहा है.

यह भी पढ़ें: हिमालय और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बीच है एक खास रिश्ता, दोनों के बनने की एक जैसी कहानी

सेंटर में करीब 1200 मेंढक हैं जिनमें से 1000 सुनहरे मेंढक हैं. वैज्ञानिक यहां इन मेंढकों को प्रजनन करवाते हैं. उनकी देखभाल करते हैं. बीमारी से बचाने की कोशिश करते हैं. रोबर्टो इबानेज कहते हैं कि हम सबसे खतरे वाले मेंढकों की देखभाल कर रहे हैं. अब नई शुरुआत कर रहे हैं, उन्हें जंगलों में वापस भेजने की.

पनामायन सुनहरा मेंढक

चाइट्रिड फंगस जैसी बीमारी के अलावा जंगलों की कटाई और प्रदूषण ने भी इन मेंढकों को नुकसान पहुंचाया. 2009 में आखिरी जंगली सुनहरा मेंढक देखा गया था. तब वैज्ञानिकों ने पहले ही खतरा भांप लिया था. स्मिथसोनियन, शेवेने माउंटेन जू, जू न्यू इंग्लैंड और दूसरे संगठनों ने मिलकर 2009 में पनामा एम्फीबियन रेस्क्यू प्रोजेक्ट शुरू किया.  गाम्बोआ सेंटर 2015 में खुला. यहां मेंढकों को प्रजनन करवाया जाता है ताकि उनकी संख्या बढ़े.

अब 2026 में पहली बार कैद में पैदा हुए सुनहरे मेंढकों को जंगलों में छोड़ा जा रहा है. वैज्ञानिक ट्रायल रिलीज कर रहे हैं ताकि पता चल सके कि वे जंगलों में कितना जीवित रह पाते हैं.

यह भी पढ़ें: अब सबसे बड़ा सवाल… सऊदी पहुंचे पाकिस्तान के 13 हजार सैनिक क्या ईरान से लड़ेंगे?

नई उम्मीद: जंगलों में वापसी

फरवरी 2026 में रोबर्टो इबानेज और उनकी टीम ने कैद में पैदा हुए सुनहरे मेंढकों को उनके पुराने निवास स्थान की नदियों में छोड़ा. यह पहला बड़ा कदम है. टीम में कई वैज्ञानिक शामिल हैं जो मेंढकों की निगरानी कर रहे हैं. 12 हफ्ते के ट्रायल के बाद कई मेंढकों को पूरी तरह आजाद कर दिया गया. इससे पता चलेगा कि फंगस से बचाव की रणनीति क्या हो सकती है. पनामा सरकार की संरक्षित क्षेत्र प्रणाली भी इस मुहिम में साथ दे रही है.

सुनहरा मेंढक सिर्फ एक प्रजाति नहीं है. यह पूरे ईकोसिस्टम का हिस्सा है. मेंढक कीड़े-मकोड़ों को नियंत्रित रखते हैं. पर्यावरण को संतुलित रखते हैं. अगर ये विलुप्त हो गए तो पूरा फूड साइकिल प्रभावित होगा.

—- समाप्त —-



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *