इस्लामाबाद वार्ता विफल होने के पीछे परमाणु मुद्दा बड़ी वजह! US ने रखी थी 20 साल बैन की मांग – Islamabad talks US sought 20 year uranium ban from Iran mdsb ntc


अमेरिका ने इस्लामाबाद में ईरान के साथ हुई वार्ता के दौरान यूरेनियम संवर्धन पर करीब 20 साल की रोक लगाने का प्रस्ताव रखा. वॉशिंगटन ने इस अवधि के साथ कई अन्य कड़े प्रतिबंधों की भी मांग की, जिससे तेहरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को सीमित किया जा सके. ईरान ने इस मांग को खारिज करते हुए सिर्फ सिंगल डिजिट वाली समय-सीमा का ही विकल्प पेश किया.

यूरेनियम के मौजूदा भंडार को पूरी तरह खत्म करने और संवर्धन रोकने की शर्तों पर असहमति की वजह से यह बातचीत किसी नतीजे तक नहीं पहुंच सकी. अमेरिकी वार्ताकारों ने ईरान से सभी उच्च संवर्धित यूरेनियम को हटाने की मांग की, जबकि तेहरान ने इसके बजाय निगरानी में डाउन-ब्लेंडिंग प्रक्रिया का प्रस्ताव दिया.

पाकिस्तान, मिस्र और तुर्की की मध्यस्थता में हुई यह वार्ता 21 अप्रैल को सीजफायर खत्म होने से पहले तनाव कम करने के लिए एक बड़ी कोशिश थी.

जेडी वेंस के बयान से बिगड़ी बात

ईरानी वार्ताकारों को उम्मीद थी कि एक प्रारंभिक समझौता मुमकिन है, लेकिन अमेरिकी डेलिगेशन के अचानक इस्लामाबाद से जाने और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के बयानों ने उन्हें हैरान कर दिया. वेंस ने सार्वजनिक रूप से तेहरान को दोषी ठहराते हुए बातचीत खत्म होने का संकेत दिया. सूत्रों के मुताबिक, ईरानी पक्ष अमेरिकी प्रेस कॉन्फ्रेंस के इस रुख से काफी नाराज नजर आया, जिससे कूटनीतिक खाई और चौड़ी हो गई.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा है कि मतभेदों को दूर करने के लिए कोशिशें अभी भी जारी हैं. तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने सुझाव दिया है कि शुरुआती स्थितियां अक्सर कठोर होती हैं, लेकिन दोनों पक्ष सीजफायर के लिए तैयार दिख रहे हैं. वहीं, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को दावा किया कि ईरान के ‘सही लोगों’ ने अमेरिका से संपर्क किया है और तेहरान एक समझौता करना चाहता है.

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भविष्य की चुनौती…

एक तरफ जहां समझौते की कोशिशें चल रही हैं, वहीं दूसरी ओर अमेरिका दबाव बढ़ाने की कोशिशें कर रहा है. वॉशिंगटन ने ईरान से जुड़े जहाजों को निशाना बनाने वाली नाकेबंदी का ऐलान किया है. अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि बातचीत में अब भी कुछ बाकी है, लेकिन 21 अप्रैल की समय-सीमा नजदीक आने की वजह से दोनों पक्षों के पास साझा जमीन तलाशने के लिए बहुत कम वक्त बचा है.

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