वेस्ट एशिया की जंग जारी है और हर ओर उथल-पुथल का दौर है. इस बीच दुनिया उसी मुहाने पर जा खड़ी हुई है, जहां ‘आस्था बनाम ‘सत्ता’ का टकराव जोर पकड़ रहा है. यानी अब लड़ाई किसी मुल्क से नहीं, किसी ट्रेड से नहीं और न ही किसी राजा या राजशाही से है. अब सीधी लड़ाई आपकी खुद की मान्यता और परंपरा से हो रही है. जहां आस्था आपको गलत बता रही है और आप गलती मानने को तैयार नहीं है.
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप यही कर रहे हैं. पोप लियो से उनका विवाद चर्चा में है. असल में पोप ने ट्रंप की वेनेजुएला और ईरान पर किए हमले को लेकर आलोचना की थी. लिहाजा ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा कि उन्हें ऐसा पोप नहीं चाहिए.
ट्रंप यही नहीं रुके. उन्होंने खुद की AI जेनरेटेड एक तस्वीर भी पोस्ट कर दी, जिसमें वह पोप और मसीह की तरह नजर आ रहे हैं. किसी रोगी के सिर पर हाथ रखकर उसे चंगा करने वाले मसीह.
ट्रंप और पोप के बीच के विवाद से ये सवाल उठ रहा है कि ईसाई पंथ के सर्वोच्च धर्मगुरु ‘पोप’ आखिर कितने ताकतवर हैं? यह सवाल नया भी नहीं है, बल्कि कई बार तंज-मजाक और कभी-कभी सीरियस तौर पर भी पूछा जाता रहा है. जैसे एक बार जोसेफ स्टालिन ने ही विस्टन चर्चिल से तंज में कहा था कि पोप के पास कितनी डिवीजन हैं? चर्चिल यूरोप में कैथोलिकों को नाजियों से बचाने में लगे थे.
ट्रंप ने कहा था कि वह अगला पोप बनना चाहेंगे. हालांकि उनके इस कारनामे को वही तवज्जो मिली जो एक बुरे मजाक को मिलनी चाहिए. दुनिया ने इसे न सिर्फ खारिज किया, बल्कि ट्रंप को भी ‘आड़े हाथों’ लिया.
आज के दौर में पोप के पास न कोई सेना है, न कोई बड़ी जमीन न ही आधुनिक दौर में कोई बड़ा राज्य. सदियों पुरानी पोप परंपरा का पालन करने वाली पोपशाही का आधुनिक राज्य वेटिकन सिटी जो सबसे छोटा संप्रभु देश है, जिसका अस्तित्व तो 100 साल पुराना भी नहीं है.

तो क्या पोप बिल्कुल ताकतवर नहीं है?
मौजूदा समय में पोपशाही किसी बीते दौर की बात सी लगती है. यह एक ऐसा धर्म आधारित राजतंत्र है, जो संयुक्त राष्ट्र का सदस्य नहीं है, लेकिन दुनिया के अधिकांश देशों के साथ इसके डिप्लोमेटिक रिलेशन हैं. ये रिलेशन वेटिकन सिटी या स्टेट के नाम पर नहीं है, बल्कि बल्कि Holy See के तौर पर हैं. दिलचस्प बात है कि ‘होली सी’ हमेशा रोम में ही नहीं रहा. कभी आविग्नन (फ्रांस), कभी पीसा (इटली) तो कभी अन्य जगहों पर भी इसका केंद्र रहा. 1870 से 1929 तक तो होली सी के पास कोई भूभाग भी नहीं था.
फिर भी यह बहुत ताकतवर संस्था रही. लगभग 1.4 अरब कैथोलिकों पर आध्यात्मिक प्रभाव के साथ ही पोप की नैतिक ताकत भी बहुत बड़ी है. पोप की ये नैतिक ताकत हाल के वर्षों में बढ़ी है, जबकि राजनीतिक ताकत घटी है.
एक समय था जब पोप सिर्फ नैतिक नहीं, बल्कि मिलिट्री और पॉलिटिकल पावर भी रखते थे. इतिहास बताता है कि पोप अर्बन द्वितीय, पोप यूजीन द्वितीय और पोप इनोसेंट तृतीय की एक आवाज पर यूरोप के राजा, सामंत और योद्धा पवित्र भूमि की ओर कूच कर जाते थे, जहां उनका सामना सालादीन जैसी ताकतों से होता था.
कैनोसा किले की घटना, जब ठंड में घुटनों के बल बैठा रहा जर्मनी का राजा
पोप की ताकत की बात होती है तो साल 1077 की एक ऐतिहासिक कहानी याद आती है. असल में साल 1075 में पोप ग्रेगरी VII ने “डिक्टेटस पापे” (Dictatus Papae) जारी किया. इसमें साफ कहा गया कि बिशपों की नियुक्ति केवल चर्च करेगा, राजा या सम्राट नहीं.
तब जर्मनी और इटली के बड़े हिस्से पर हेनरी फोर्थ शासन कर रहा था. उसने पोप के इस आदेश को मानने से न सिर्फ इनकार किया, बल्कि अपने अधिकार से बिशपों की नियुक्ति जारी रखी और यहां तक कि पोप को पद से हटाने की कोशिश भी की.
इसके जवाब में 1076 में पोप ने अपना ‘ब्रह्मास्त्र’ चलाया. पोप ने हेनरी फोर्थ का बहिष्कार (Excommunication) कर दिया. हेनरी IV को चर्च से बाहर कर दिया गया. इसका मतलब यह था कि अब कोई भी ईसाई प्रजा उसके प्रति वफादार रहने के लिए बाध्य नहीं थी. जर्मनी के राजकुमारों ने तुरंत विद्रोह का संकेत दे दिया और साफ कहा कि अगर एक साल के भीतर पोप से माफी नहीं मिली, तो नया राजा चुन लिया जाएगा.
यहीं से सत्ता का समीकरण पलट गया. जो सम्राट कल तक आदेश देता था, वही अब अपनी गद्दी बचाने के लिए पोप के दरवाजे पर खड़ा था. जनवरी 1077 में वह आल्प्स की बर्फीली चोटियों को पार करता हुआ इटली पहुंचा और कैनोसा किले के बाहर तीन दिन तक ठंड में खड़ा रहा. आखिरकार तीन दिन पोप ने उसे भीतर बुलाया.
कहते हैं कि हेनरी फोर्थ घुटनों के बल बैठकर ही कैनोसा के किले में भीतर गया. हेनरी ने घुटनों के बल बैठकर माफी मांगी, और तब जाकर उसे क्षमा मिली. कैनोसा की यह घटना आज भी एक प्रतीक की तरह याद की जाती है, जब सत्ता को धार्मिक सत्ता के सामने झुकना पड़ा था. 
कैसे घटती गई पोप की राजनीतिक ताकत?
हालांकि पोप की भी शक्ति कोई शास्वत नहीं है. हेनरी फोर्थ ने कुछ सालों में ऐसी ताकत जुटाई कि उसने रोम पर हमला कर पोप को वहां से खदेड़ दिया. मध्यकालीन दौर पर नजर डालें तो कई पोप युद्ध और सत्ता के खेल में भीतर तक घुसे हुए थे.
उन्होंने संपत्तियां भी कमाईं और अपने परिजनों-चहेतों को सत्ता में भी बिठाया. नेपोटिज्म शब्द की जड़ें भी यहीं से मिलती-निकलती दिखती हैं, जब पोप और कार्डिनल अपने रिश्तेदारों को ऊंचे पद देते थे. इस परंपरा का विरोध और सुधार अलग कहानी है, क्योंकि नए आधुनिक सुधरे हुए युग का रास्ता इसी से निकला है.
पोप की राजनीतिक शक्ति का अंतिम प्रभाव 1493 में दिखा, जब पोप अलेक्जेंडर सिक्स ने दुनिया को स्पेन और पुर्तगाल के बीच बांट दिया. साल 1583 में पोप ग्रेगरी XIII ने वह कैलेंडर लागू किया, जिसे आज पूरी दुनिया मानती है.
इसके बाद से पोप की राजनीतिक शक्ति लगातार घटती गई, लेकिन नैतिक प्रभाव बढ़ता गया. आधुनिक दौर के अधिकांश पोप अपने पहले के पोप से अलग अधिक आध्यात्मिक और मानवतावादी रहे हैं. जो प्रेम, शांति और भाईचारे का संदेश देते हैं. 20वीं सदी के अंतिम दौर में पोपशाही की नैतिकता चरम पर रही.
जब इसकी नैतिक शक्ति ने न केवल समाज पर गहरा असर डाला, बल्कि बल्कि राजनीतिक दीवारों को भी कमजोर किया. इसलिए आज पोप नैतिक रूप से सबसे ताकतवर और सम्मानित पद माना जाता है. इसकी ताकत यही है कि दुनिया रोम की ओर श्रद्धा से देखती है और सज़दा करती है.
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