पाकिस्तान-सऊदी रक्षा समझौते पर बड़ा खुलासा, ‘एकतरफा’ है डील, बदले में कोई गारंटी नहीं – pakistan saudi arab defense agreement one sided deal rises concerns ntc drmt


पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच दशकों पुराने रक्षा समझौते को लेकर चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं. एक लीक दस्तावेज में खुलासा हुआ है कि दोनों देशों के बीच सैन्य जिम्मेदारियां बराबर नहीं हैं. समझौते की शर्तों के मुताबिक, पाकिस्तान पर सऊदी अरब की रक्षा के लिए अपनी सेना भेजने की बाध्यता है, लेकिन सऊदी अरब की ओर से पाकिस्तान के लिए ऐसी कोई प्रतिबद्धता नहीं दिखती.

‘ड्रॉप साइट’ की रिपोर्ट में लीक दस्तावेजों से पता चलता है कि ये रक्षा समझौता ‘एकतरफा’ है. अगर सऊदी अरब अनुरोध करता है, तो पाकिस्तानसऊदी अरब की रक्षा के लिए अपनी सैन्य टुकड़ियां भेजने के लिए प्रतिबद्ध है.

हालांकि इस समझौते में साफ तौर पर ऐसा कुछ नहीं लिखा है जो सऊदी अरब को संकट के समय पाकिस्तान की रक्षा करने के लिए मजबूर करती हो.

अहम बात ये भी है कि पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच ये समझौता समय के साथ सख्त होता गया है. 1982 में दोनों देशों ने पहली बार एक गोपनीय समझौते पर हस्ताक्षर किए. 2005 में एक सैन्य सहयोग समझौता हुआ, जो प्रशिक्षण और उपकरणों तक सीमित था.

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फिर 2021-2024 में समझौते में संशोधन किया गया जिसके तहत पाकिस्तान की तरफ से प्रत्यक्ष सैन्य रक्षा की जिम्मेदारी को शामिल किया गया. 2025 (SMDA) में क्षेत्रीय तनाव के बीच इस सहयोग को और ज्यादा मजबूती दी गई.

दो नाव पर सवार पाकिस्तान

रिपोर्ट की मानें तो ईरान-अमेरिका और इजरायल जंग के बीच पाकिस्तान ने सऊदी अरब में अपने विमान और सैन्य उपकरण तैनात किए हैं. ये स्थिति पाकिस्तान के लिए काफी मुश्किल है, क्योंकि इस्लामाबाद एक तरफ सऊदी के लिए अपनी सैन्य प्रतिबद्धता निभा रहा है, तो दूसरी तरफ वो अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता करने की कोशिश भी कर रहा है.

पाकिस्तान के भीतर इस समझौते को लेकर काफी बहस छिड़ गई है. जनता के बीच चिंता है कि पाकिस्तान किसी विदेशी युद्ध में घसीटा जा सकता है. सवाल ये उठ रहा है कि क्या पाकिस्तान की जिम्मेदारी सिर्फ सऊदी अरब की सीमा की रक्षा करना है या उसे क्षेत्रीय युद्धों में भी शामिल होना पड़ेगा.

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समझौते या ‘कैश फॉर डिटरेंस’?

कहा जा रहा है कि इस समझौते से पाकिस्तान पर बहु-मोर्चों (भारत, अफगानिस्तान और ईरान) का दबाव बढ़ सकता है. ईरान के खिलाफ कोई बी एक्शन पाकिस्तान में भारी विरोध पैदा कर सकती है. कुछ लोग इस समझौते को ‘कैश फॉर डिटरेंस’ के तौर पर देख रहे हैं, जिससे पाकिस्तान को ज्यादा फायदा मिलने की उम्मीद कम ही नजर आ रही है.

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