भाई, तुम्हारा वोट उस आदमी के वोट के बराबर क्यों गिना जाना चाहिए, जिसने दो बच्चे करने के बाद रुकने की जहमत तक नहीं उठाई?
इस देश के साथ एक बहुत बड़ी नाइंसाफी हो रही है. 1950 से अब तक. ये नजर इसलिए नहीं आई, क्योंकि हम सड़कें बनाते रहे, सॉफ्टवेयर कंपनियां खड़ी करते रहे. लेकिन अब जब हिंदी पट्टी को संसद में ज्यादा सीटें देने वाले प्रस्तावित परिसीमन बिल की बात आई है, तो आंखों के समाने से पर्दा हट गया है. खौफनाक हकीकत साफ दिखाई दे रही है.
एक व्यक्ति. एक वोट.
चेन्नई का एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर. जो टैक्स टाइम पर भरता है. चार भाषाएं बोलता है, और जिम्मेदारी से ठीक 1.7 बच्चे पैदा करके रुक जाता है- उसे एक वोट. वहीं गोरखपुर का वो शख्स, जिसने आठ बच्चे पैदा किए, और हर बच्चा आगे चलकर आठ-आठ और पैदा करेगा — उसे भी एक वोट. बिल्कुल बराबर. ये कैसे? कोई सिरफिरा ही इसे समान मानेगा.
ये हमारे देश की नींव रखने वाले कर्णधारों की देन है. साफ है, उन्होंने इस बारे में सोचा-समझा नहीं था.
इस हफ्ते साऊथ की एक बड़े पार्टी के नेता ने पूछा, ‘अगर आबादी ही राजनीति तय करती है, तो जनसंख्या नियंत्रण का इनसेंटिव किसलिए है?’
इस सवाल पर तालियां बनती हैं- वाह सर! ब्रावो!
वे बिल्कुल सही कह रहे हैं. और उन्हें और आगे जाना चाहिए. क्योंकि एक बार तर्क की डोर खींचना शुरू कर दो, तो वो कहां-कहां ले जाता है, देखकर मजा आ जाता है.
सिर्फ आबादी तक ही क्यों रुकें? जो आदमी साल में 12 लाख कमाता है, उसका वोट उस आदमी के बराबर क्यों हो, जो सिर्फ 1.2 लाख कमाता है? पहला आदमी ज्यादा टैक्स देता है, बेहतर सामान खरीदता है, बड़ी गाड़ी चलाता है जिससे जीडीपी बढ़ती है, और साफ है कि उसने बेहतर फैसले लिए हैं. फिर भी देश दोनों को वोटिंग बूथ पर अपमानजनक बराबरी देता है. यानी, सवाल वही है कि फिर कामयाब होने का इनसेंटिव कहां मिला?
और पढ़ाई! साक्षर का वोट निरक्षर के बराबर क्यों? अगर हम अच्छे व्यवहार को ईनाम दे रहे हैं, तो पढ़ना अच्छा व्यवहार है ना. जो स्कूल गया, एग्जाम पास किया, शायद पोस्ट-ग्रेजुएट भी किया, और वो एंट्रेंस एग्जाम क्लियर की जिसे कम-मेरिट वाले नहीं कर पाए. उसकी राय उस शख्स के बराबर क्यों, जिसने दसवीं भी नहीं पास की?
ये तो शिक्षा का खुला अपमान है.
मंत्रियों की गलत शिक्षा
आखिर पढ़ने का इनसेंटिव क्या मिला, यदि लोकतंत्र पढ़े-लिखे को भी उतना ही बुरा ट्रीट करेगा जितना अनपढ़ को? और ये तर्क तो राज्यों के भीतर भी लागू होता है. ऐसा क्यों हो कि टेक्सटाइल एक्सपोर्ट और उद्यमिता का इंजन कोयंबटूर अपने राज्य के उन जिलों के विकास को फंड करे जिन्होंने वैसी पहल नहीं की? तिरुवल्लूर क्यों उठाए तिरुवन्नामलाई का खर्च? ये तो कम्युनिज्म है. तिरुवल्लूर ने कभी नहीं कहा कि वो उन जिलों के साथ फिस्कल ट्रांसफर स्कीम में बांध दिया जाए जिन्होंने निवेश आकर्षित नहीं किया. तिरुवल्लूर की भी फीलिंग्स हैं. तिरुवल्लूर का भी जीडीपी है.
दरअसल, इस सिद्धांत को उसके आखिरी नतीजे तक ले चलें- सबसे प्रगतिशील वार्ड, सबसे प्रगतिशील तहसील, सबसे प्रगतिशील जिला अपना प्रतिनिधि अलग से चुने. आस-पास के पिछड़े इलाके वालों के वोट को मिलाए बिना. आखिर वो तो बाकियों का बोझ उठा रहे हैं. उनकी आवाज ज्यादा सुनी जानी चाहिए. ये कोई एलीट नहीं, इनसेंटिव डिजाइन है.
बेंगलुरु कब तक बेलगावी को सब्सिडी देता रहेगा? चिकमगलूर के खूबसूरत कॉफी एस्टेट को बंजर कलबुरगी के बराबर क्यों माना जाए?
जितना ज्यादा सोचते जाते हैं, हमारे गणतंत्र की सबसे बड़ी बुनियादी गलती के बारे में राय स्पष्ट होती जाती है. ‘सर्वसाधारण को मताधिकार’ दरअसल ‘सर्वसाधारण को पीड़ा’ है. और एक लापरवाह प्रयोग. ब्रिटिश, अपनी समझदारी में, वोटिंग के लिए प्रॉपर्टी क्वालिफिकेशन रखते थे. अगर वे गलत थे, तो फिर वे विकसित देश कैसे बने और हम अभी भी सिर्फ विश्वगुरु बनने की कोशिश में हैं? उन्होंने हमें क्रिकेट, रेलवे और दो सदनों वाली संसद दी. शायद प्रॉपर्टी क्वालिफिकेशन भी रख लेना चाहिए था. सबको बराबरी देने का ऐसा जोश था कि हमने सब कुछ व्यर्थ कर दिया.
परिसीमन की ये एक्सरसाइज एक घोर अन्याय है, जिसमें वास्तविक राज्यों में रहने वाले वास्तविक इंसानों को गिनकर उनके वास्तविक नंबर के हिसाब से प्रतिनिधित्व देने का प्रस्ताव है. साऊथ, जिसने अपनी आबादी को काबू में रखा, वो कम सीटें लेकर ‘सज़ा’ पाएगा. जबकि उत्तर, जो पैदावार में नहीं रुका, उसे ज्यादा सीटें मिलेंगी. ये बात और है कि अनुपात तो फिर भी वही रहेगा. यानी उत्तर को नंबर के हिसाब से खास तवज्जो नहीं मिल रही है. जो पहले भी नहीं थी. लेकिन लॉजिक को नजरअंदाज मत करिए. वो बिल्कुल सटीक है- हमने संयम बरता, और अब वही संयम हमारा प्रभाव कम करके सजा बनने जा रहा है. ये ठीक वैसा है जैसे टैक्स समय पर भरने की सजा मिले. या रिश्वत न लेने की सजा. लोकतंत्र में अच्छा व्यवहार अपनी सजा खुद ले आता है. फैमिली प्लानिंग के साथ भी अब यही हो रहा है.
वो सही बात गलत है
कई बार मन करता है कि परिसीमन के विरोध की बजाय लोकतंत्र से ही लड़ना चाहिए. यूनिवर्सल वोटिंग राइट शुरू से ही गलत था.
बेशक, कोई नेता ये नहीं बोलेगा. वे इसे फेडरलिज्म की भाषा में, वित्तीय विकेंद्रीकरण की भाषा में, राज्यों के अधिकारों की भाषा में, संवैधानिक मर्यादा की भाषा में सजाकर पेश करेंगे. ये सारे लॉजिक ठीक भी हैं और कुछ सही भी. दक्षिण को आबादी पैटर्न के कारण परिसीमन से जो शिकायत है, वो जायज है. टैक्स के पैसे को खर्च करने का फॉर्मूला उन राज्यों के साथ अन्याय करता है जिन्होंने तेजी से विकास किया. ये सारे असल नीतिगत मुद्दे हैं, जिन पर गंभीर बहस होनी चाहिए.
लेकिन इतना मजा नहीं आता जितना लॉजिक को उसके असली अंत तक ले जाने में आता है. क्योंकि जब कोई नेता खड़ा होकर कहता है कि ‘हम अच्छे नागरिक थे, हमें इसकी सज़ा नहीं मिलनी चाहिए’, तो असल में वो ये कह रहा है कि लोकतंत्र कोई सौदा है. वोट सद्गुण का इनाम है. प्रतिनिधित्व प्राइज है परफॉर्मेंस का.
वो ऐसा नहीं है. कभी था ही नहीं. ‘सर्वसाधारण को पीड़ा’ की सबसे चिढ़ाने वाली और सबसे शानदार खूबी यही है कि उसे फर्क नहीं पड़ता है तुम कितना कमाते हो, कितने बच्चे पैदा किए या नहीं किए, न ये कि तुम्हारे राज्य का GSDP 8% बढ़ रहा है या 4%. गणतंत्र का हर नागरिक, चाहे वह उदयनिधि स्टालिन हो या आकाश अंबानी, सबको एक वोट. हर राज्य अपनी आबादी के अनुपात में अपने प्रतिनिधि चुनकर भेजता है. ये लोकतंत्र की खामी नहीं है. यही लोकतंत्र है.
परिसीमन फॉर्मूला निष्पक्ष है या नहीं, जनगणना का डेटा सही है या नहीं, वित्तीय ट्रांसफर को फिर से कैसे बैलेंस किया जाए — ये गंभीर सवाल हैं और इनके गंभीर जवाब चाहिए. इनसे लड़िये. पूरी ताकत से लडिये. लेकिन ये लड़ाई ‘भीड़ भरे उत्तर बनाम समृद्ध दक्षिण’ वाली शिकायत के सहारे न हो.
क्योंकि उस शिकायत की एक मंजिल है. समाधान के बाद जो वहां पहुंचता है, उसे नजारा बहुत पसंद नहीं आता.
(लिखने वाले के अपने विचार हैं, और तकनीकी तौर पर, वे ठीक उसी तर्क का तार्किक निष्कर्ष भी हैं जिसका वे मजाक उड़ा रहे हैं.)
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