वाराणसी की एमपी-एमएलए कोर्ट के न्यायाधीश यजुवेंद्र विक्रम सिंह ने टकसाल शूटआउट मामले में विधायक अभय सिंह, संदीप सिंह उर्फ पप्पू और संजय रघुवंशी को बरी कर दिया. यह घटना 4 अक्टूबर 2002 की शाम 6 बजे वाराणसी के कैंट क्षेत्र में हुई थी. तब जौनपुर के निर्दलीय विधायक धनंजय सिंह ने अभय सिंह के खिलाफ अंधाधुंध फायरिंग की एफआईआर दर्ज कराई थी. इस हमले में धनंजय सिंह के साथी संतोष सिंह बाबा की आंख निकल गई थी. पुलिस ने छह लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी, लेकिन 24 साल चली कानूनी लड़ाई के बाद कोर्ट ने विवेचना में गंभीर खामियां पाईं.
गाड़ी के एक ‘H’ अक्षर ने बिगाड़ा खेल
केस की सबसे रोचक कड़ी धनंजय सिंह की सफारी गाड़ी का नंबर रहा. धनंजय सिंह ने गाड़ी का नंबर MH 04 B 5817 बताया, जो जांच में महाराष्ट्र की एक जेसीबी के नाम पर निकला. बाद में दलील दी गई कि वे जल्दबाजी में ‘H’ अक्षर लिखना भूल गए थे और सही नंबर MH 04 BH 5817 था. हालांकि, धनंजय सिंह इस गाड़ी के स्वामित्व से जुड़े पुख्ता कागज पेश नहीं कर सके. कोर्ट ने इसे वादी की लापरवाही माना.
पुलिस की बड़ी चूक: नहीं जब्त हुई ‘केस प्रॉपर्टी’
अदालत ने पुलिस की कार्यशैली पर कड़े सवाल उठाए. जिस सफारी गाड़ी पर ताबड़तोड़ फायरिंग हुई, उसे पुलिस ने कभी अपने कब्जे में लिया ही नहीं. गाड़ी का न तो कोई फॉरेंसिक मुआयना हुआ और न ही बैलिस्टिक जांच की गई. पुलिस ने घटनास्थल से कांच के टुकड़े तक बरामद नहीं किए, जबकि दावा था कि गोलियां शीशे पार कर गई थीं. इस लापरवाही का सीधा लाभ बचाव पक्ष को मिला.
पत्थर की आंख और मेडिकल रिपोर्ट पर सवाल
गवाह संतोष सिंह ने कोर्ट में अपनी पत्थर की आंख निकाल कर गवाही दी कि गोली लगने से उनकी असली आंख निकल गई थी. लेकिन वे इस चोट से संबंधित कोई भी मेडिकल रिपोर्ट पेश नहीं कर सके. साथ ही, पुलिस और गवाह के बयानों में तारीखों का बड़ा अंतर मिला. संतोष के अनुसार वे 5 अक्टूबर को मुंबई चले गए थे, जबकि जांच अधिकारी ने 6 अक्टूबर को उनका बयान वाराणसी में दर्ज करने का दावा किया था.
आरोपियों का ‘एलिबाई’ और कोर्ट का फैसला
अभय सिंह के वकीलों ने तर्क दिया कि घटना के समय वे करीब 200 किलोमीटर दूर फैजाबाद के एक अस्पताल में भर्ती थे. कोर्ट ने पाया कि एफआईआर और मेडिकल मेमो की टाइमिंग में विरोधाभास था. धनंजय सिंह के चोटों की गहराई और सरकारी मोबाइल नंबर के इस्तेमाल पर भी कोर्ट ने संदेह जताया. इन तमाम तकनीकी खामियों और विरोधाभासों के आधार पर 79 पन्नों के आदेश के साथ सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया.
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