अक्सर जब हम खाने खा रहे होते हैं तब एक वक्त ऐसा आता है जब दिमाग कहता है कि बस पेट भर गया है. लंबे समय से वैज्ञानिकों का मानना ​​था कि भूख और तृप्ति (पेट भरना) को केवल न्यूरॉन्स यानी मस्तिष्क को संकेत देने वाली कोशिकाएं ही कंट्रोल करती हैं. लेकिन हाल ही में मैरीलैंड यूनिवर्सिटी (यूएमडी) और चिली के कॉन्सेप्सियन यूनिवर्सिटी की रिसर्च ने इस धारणा को बदल दिया है. दरअसल, वैज्ञानिकों ने दिमाग के हाइपोथैलेमस हिस्से में एक ऐसे चेन रिएक्शन (Chain Reaction) की खोज की है जो भूख और तृप्ति के बीच का कनेक्शन बताया है. यानी कि आपका पेट भर गया है, इसका सिग्नत न्यूरॉन्स नहीं बल्कि कोई और ही दिमाग तक पहुंचाता है.

शरीर का कंट्रोल रूम है इसका जिम्मेदार

वैज्ञानिकों के मुताबिक, दिमाग का हाइपोथैलेमस हिस्सा शरीर की भूख और प्यास को कंट्रोल करता है. स्टडी में सामने आया है कि जब कोई खाना खाता है तो खून में ग्लूकोज लेवल बढ़ना शुरू होता है और उसे दिमाग की टैनीसाइट्स (Tanycytes) कोशिकाएं पहचान लेती हैं. ये कोशिकाएं लैक्टेट नाम का केमिकल रिलीज करती हैं और बस इसी से चेन रिएक्शन शुरू होता है और हमारे दिमाग तक सिग्नल पहुंचता है कि पेट भर गया है.

अब तक माना जाता था कि एस्ट्रोसाइट्स केवल न्यूरॉन्स को सपोर्ट देने वाली कोशिकाएं हैं. लेकिन रिसर्च कहती है कि ये कोशिकाएं ही असली मैसेंजर हैं. यानी कि जब टैनीसाइट्स से लैक्टेट निकलता है तो एस्ट्रोसाइट्स एक्टिव हो जाते हैं और ग्लूटामेट नाम का सिग्नल भेजते हैं.

यह सिग्नल सीधे उन न्यूरॉन्स के पास जाता है जो भूख को दबाते हैं. यानी इससे भूख बढ़ाने वाले न्यूरॉन्स शांत हो जाते हैं और दूसरी तरफ पेट भर जाने वाले सिग्नल तेज हो जाते हैं.

मोटापे के इलाज में मिलेगी बड़ी मदद

यह खोज सिर्फ जानकारी देने तक ही सीमित नहीं रहेगी. वैज्ञानिकों का मानना है कि इस कम्युनिकेशन चेन को समझकर भविष्य में मोटापे और खाने से जुड़ी बीमारियों का सटीक इलाज ढूंढा जा सकता है. अगर इस सिग्नल को दवाओं के जरिए कंट्रोल कर सकें तो बिना किसी कड़े परहेज के शरीर को यह अहसास कराया जा सकेगा कि उसे और कैलोरी की जरूरत नहीं है. और इंसान कम खाएगा जिससे उसका वजन कम हो सकता है.

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