होर्मुज में अमेरिका को कैसे चकमा दे रहे ईरानी जहाज? ‘देसी’ आइडिया के सामने US ब्लॉकेड बेअसर – Hormuz Strait Blockade US Navy Iranian Ships Oil Tanker Pass Donald Trump mnrd


होर्मुज स्ट्रेट पर अमेरिका का सख्त ब्लॉकेड लागू होने के बावजूद ईरान से जुड़े जहाजों का गुजरना इस बात का संकेत है कि समुद्री जंग अब सिर्फ ताकत की नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी और चालाकी की भी बन चुकी है. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस ब्लॉकेड के जरिए ईरान की तेल सप्लाई रोकने और उस पर आर्थिक दबाव बनाने की कोशिश की थी. इसके लिए 10 हजार से ज्यादा सैनिक, कई युद्धपोत और दर्जनों लड़ाकू विमान तैनात किए गए.

शुरुआत में अमेरिकी सेना ने दावा किया कि पहले 24 घंटों में कोई भी जहाज ब्लॉकेड तोड़कर नहीं निकल पाया और कई जहाजों को वापस भेज दिया गया. लेकिन इसके तुरंत बाद सामने आया कि कम से कम आठ जहाज, जिनमें कुछ ईरान से जुड़े टैंकर भी शामिल हैं, इस कड़ी निगरानी के बावजूद होर्मुज पार कर गए. यहीं से यह साफ होने लगा कि ईरान और उससे जुड़े नेटवर्क ने ब्लॉकेड से बचने के नए तरीके ढूंढ लिए हैं.

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इन तरीकों में सबसे अहम है “शैडो फ्लीट” का इस्तेमाल. यह ऐसे जहाजों का नेटवर्क होता है जो आधिकारिक तौर पर किसी एक देश से जुड़े नहीं होते, या जिनकी असली पहचान छिपाई जाती है. ये जहाज अक्सर अलग-अलग देशों के झंडे इस्तेमाल करते हैं और उनके ऑनरशिप का पता करना इतना मुश्किल होता है और उन्हें ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है.

ईरानी जहाज इन तरीकों से अमेरिकी ब्लॉकेड में लगा रहे सेंध

दूसरा बड़ा तरीका है AIS यानी ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम को बंद कर देना. आमतौर पर हर बड़े जहाज को यह सिस्टम चालू रखना होता है, जिससे उसकी लोकेशन, पहचान और रूट का पता चलता है. लेकिन ईरान से जुड़े जहाज जानबूझकर इसे बंद कर देते हैं और “डार्क” हो जाते हैं. इससे वे कुछ समय के लिए रडार और ट्रैकिंग सिस्टम से गायब हो जाते हैं.

इसके अलावा “स्पूफिंग” नाम की तकनीक का भी इस्तेमाल हो रहा है. इसमें जहाज अपनी लोकेशन और पहचान की गलत जानकारी भेजते हैं. यानी जहाज कहीं और होता है, लेकिन सिस्टम में उसकी लोकेशन कुछ और दिखाई देती है. कुछ मामलों में जहाज दूसरे जहाज की पहचान भी कॉपी कर लेते हैं, जिससे उन्हें पहचानना और मुश्किल हो जाता है.

सबसे दिलचस्प तरीका “जॉम्बी IDs” का है. इसमें जहाज अपने यूनिक पहचान नंबर को बदल देते हैं या फर्जी नंबर इस्तेमाल करते हैं. यह तरीका पहले रूस से जुड़े जहाजों द्वारा भी इस्तेमाल किया जा चुका है. इससे जहाज की डिजिटल पहचान पूरी तरह गड़बड़ा जाती है और निगरानी एजेंसियों के लिए उसे पकड़ना मुश्किल हो जाता है.

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जहाज की झंडे से भी होती है पहचान

इन सबके अलावा, जहाज फर्जी झंडे (फ्लैग) का भी सहारा लेते हैं. जैसे एक जहाज किसी एक देश में रजिस्टर्ड होता है, उसका मालिक किसी दूसरे देश में होता है और ऑपरेशन तीसरे देश से होता है. इस तरह की व्यवस्था से अंतरराष्ट्रीय नियमों का फायदा उठाकर निगरानी से बचा जाता है.

होर्मुज स्ट्रेट में चल रहा यह खेल दिखाता है कि सिर्फ सैन्य ताकत से समुद्री रास्तों को पूरी तरह नियंत्रित करना आसान नहीं है. ईरान और उससे जुड़े नेटवर्क ने साबित कर दिया है कि टेक्नोलॉजी, रणनीति और चालाकी के जरिए बड़े से बड़े ब्लॉकेड में भी सेंध लगाई जा सकती है. आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि अमेरिका इन नई चुनौतियों से कैसे निपटता है.

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