संसद में महिला आरक्षण बिल पर वोटिंग होने वाली थी. यह मेरे लिए कोई मामूली दिन नहीं था, बल्कि एक ऐसा ऐतिहासिक पल था जो हम महिलाओं की राजनीति में हिस्सेदारी तय करने वाला था. मैं संसद की विजिटर्स गैलरी में बैठी थी. वहां से नीचे सदन में होने वाली एक-एक गतिविधि मुझे साफ दिख रही थी. टीवी पर तो हम अक्सर सिर्फ भाषण सुनते हैं, लेकिन वहां ऊपर बैठकर जो मैंने देखा, वह रणनीति और आंकड़ों की एक पूरी दास्तान थी.
शाम के 5:50 बजे जब मैं गैलरी में पहुंची, तो सदन धीरे-धीरे सांसदों से भर रहा था. गृह मंत्री अमित शाह सफेद कुर्ते में अपनी सीट पर बैठे थे. उनके आसपास निर्मला सीतारमण, जेपी नड्डा और शिवराज सिंह चौहान जैसे बड़े नेता मौजूद थे. ठीक 5:51 बजे विपक्ष की तरफ भी हलचल हुई और प्रियंका गांधी वाड्रा बहुत ही खामोशी से अपनी सीट पर आकर बैठ गईं. वहां गैलरी में चर्चा चल रही थी कि अमित शाह पिछले दो घंटों से अपनी टीम के साथ इस भाषण की तैयारी में जुटे थे.
शाम 6:03 बजे मैंने देखा कि प्रियंका गांधी अपनी सीट से उठीं और केसी वेणुगोपाल के पास जाकर उनसे कुछ बात की. उन्हें देखकर लग रहा था कि वे अपनी आखिरी रणनीति तय कर रही हैं. दूसरी तरफ अखिलेश यादव आए और अयोध्या के सांसद अवधेश प्रसाद के बगल में बैठ गए. अब सदन लगभग पूरा भर चुका था और सबकी नजरें सामने थीं.
जब अमित शाह ने बोलना शुरू किया
जैसे ही घड़ी में 6:08 बजे, अमित शाह भाषण देने के लिए खड़े हुए. उन्होंने शुरुआत में ही बहुत आक्रामक रुख अपनाया और विपक्ष पर सीधा हमला करते हुए उन्हें ‘महिला विरोधी’ कह दिया. यह सुनते ही विपक्षी सांसद अपनी जगहों पर खड़े हो गए और जोर-जोर से विरोध करने लगे. लेकिन इस शोर-शराबे के बीच एक बात जिसने मेरा ध्यान खींचा, वह था विपक्ष का तालमेल. ऐसा लग रहा था जैसे वे सब किसी अदृश्य धागे से बंधे हों. वे विरोध तो कर रहे थे, लेकिन बहुत ही सधे हुए और अनुशासित तरीके से जवाब दे रहे थे.
भाषण के दौरान ही 6:16 बजे एक और दिलचस्प बात हुई. मैंने देखा कि कांग्रेस नेता मणिकम टैगोर हाथ में एक नोटबुक और पेन लेकर हर बेंच पर जाने लगे. वे बहुत गौर से एक-एक सांसद का चेहरा देख रहे थे और अपनी डायरी में कुछ लिख रहे थे. वे असल में सांसदों की गिनती कर रहे थे ताकि वोटिंग के समय कोई कमी न रह जाए. एक तरफ अमित शाह का तीखा भाषण जारी था और दूसरी तरफ सांसदों की यह गिनती चल रही थी. प्रियंका गांधी इस दौरान एकदम शांत बैठी रहीं, उनके चेहरे पर कोई खास भाव नहीं था.
OBC कार्ड और तीखी बहस
शाम 6:30 बजे तक अमित शाह ने अपनी बातों को नए मोड़ पर ले जाना शुरू किया. उन्होंने कहा कि सरकार के लिए लक्षद्वीप से लेकर दक्षिण भारत तक सब बराबर है. इस पर विपक्ष के नेताओं ने परिसीमन और सीटों के बंटवारे पर सफाई मांगी. उन्होंने मांग की कि दक्षिण के राज्यों को कोई नुकसान नहीं होना चाहिए और 2026 के डेटा के आधार पर सीटें बढ़ाई जाएं.
6:45 बजे अखिलेश यादव बोलने के लिए खड़े हुए. उन्होंने बहुत सीधे शब्दों में सरकार की नीयत पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि पुराने कड़वे अनुभवों को देखते हुए सरकार के वादों पर भरोसा करना थोड़ा मुश्किल होता है. इसके कुछ देर बाद, 6:51 बजे शाह ने ओबीसी राजनीति का मुद्दा छेड़ दिया. उन्होंने कांग्रेस को ओबीसी विरोधी बताते हुए नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के दौर के उदाहरण दिए. उन्होंने पीएम मोदी को ओबीसी प्रधानमंत्री के तौर पर पेश किया और कहा कि बीजेपी ने ही पिछड़ों को असली हक दिया है.
राहुल गांधी की एंट्री और आखिरी प्रहार
शाम 6:58 बजे राहुल गांधी सदन के भीतर आए और वेणुगोपाल के बगल में बैठ गए. उन्हें तुरंत अब तक हुई बातों की जानकारी दी गई. इस दौरान मणिकम टैगोर अब भी सांसदों की गिनती में लगे हुए थे. विपक्षी बेंचों पर लगातार इशारों में चर्चा चल रही थी. शाम 7:15 बजे अमित शाह ने सीधे राहुल गांधी पर निशाना साधा और उनके पुराने बयानों का जिक्र करते हुए कहा कि इससे संसद की गरिमा कम होती है. ठीक 7:18 बजे जैसे ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सदन के अंदर आए, अमित शाह ने अपना भाषण पूरा किया.
विजिटर्स गैलरी में बैठकर वह एक घंटा देखना मेरे लिए ऐसा था जैसे कोई बड़ी शतरंज की बिसात बिछी हो. एक तरफ सरकार के तीखे वार थे, तो दूसरी तरफ विपक्ष का वह तालमेल जो काबिले गौर था. वह शाम सिर्फ एक बिल के बारे में नहीं थी, बल्कि अपनी-अपनी सियासी जमीन मजबूत करने की एक बड़ी जंग थी जिसकी गवाह मैं खुद बनी. गैलरी से देखने पर वह एक घंटा सिर्फ भाषणों का नहीं, बल्कि जबरदस्त तैयारी और दिमाग की जंग का था. एक तरफ बीजेपी का आत्मविश्वास था और दूसरी तरफ विपक्ष का वह सधा हुआ तालमेल, जो शायद पहले कभी नहीं दिखा.
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