सोशल मीड‍िया से लेकर हर गली-नुक्कड़ आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के झालमुड़ी की दुकान में जाने की चर्चा हो रही है. ये वीड‍ियो देखकर जितना गुडी-गुडी महसूस हो रहा है, असल में ये धंधा उतना ही चुनौती से भरा है. इसका असली सच तपती दोपहर में सड़क किनारे लइया-चना, मूंगफली, नमकीन, प्याज के छोटे-छोटे पैकेट रखकर दुकान चला रहे किसी शख्स से पूछकर देख‍िए. aajtak.in ने नोएडा में झालमुड़ी (भेलपूरी) की दुकान चला रहे प्रह्लाद से बात करके जाना कि क्या ये काम वाकई फायदेमंद है?

नोएडा सेक्टर-126 के रहने वाले प्रहलाद जी ने इस काम की बारीकियों को बताया कि कैसे कम पूंजी में यह काम शुरू तो हो जाता है, लेकिन महंगाई के इस दौर में 5 लोगों के परिवार का गुजारा करना बहुत मुश्क‍िल है.

बता दें कि हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पश्चिम बंगाल दौरे के दौरान एक वीड‍ियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई, जिसमें पीएम बंगाल के प्रसिद्ध स्ट्रीट फूड’झालमुड़ी’ का आनंद लेते नजर आए. इस एक तस्वीर ने देशभर में झालमुड़ी को चर्चा का विषय बना दिया है. लोग अब इस काम के फायदे और भविष्य को लेकर सवाल पूछ रहे हैं. लेकिन क्या वाकई यह काम उतना ही चटपटा है जितना इसका स्वाद?

प्रहलाद पिछले 18 सालों से इस हुनर के जरिए अपना घर चला रहे हैं. वो बताते हैं कि मूल रूप से उनका घर मध्य प्रदेश में है. साल 2008 में अपने दोस्तों के साथ काम की तलाश में नोएडा आए थे. तब से लेकर आज तक उन्होंने भेलपूरी को ही अपना रोजगार बनाया हुआ है. प्रहलाद बताते हैं कि इस काम को शुरू करना बहुत मुश्किल नहीं है. महज 10 से 15 हजार रुपये की पूंजी के साथ कोई भी व्यक्ति इस काम को शुरू कर सकता है. इसमें शारीरिक मेहनत तो है, लेकिन बहुत बड़ी मशीनरी या सेटअप की जरूरत नहीं होती. एक व्यक्ति भी इस काम को आसानी से कर सकता है.

15 से 20 हजार की है कमाई

जब हमने प्रहलाद जी से उनकी कमाई के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि वह हर महीने लगभग 15 से 20 हजार रुपये कमा लेते हैं. सुनने में यह रकम ठीक लग सकती है, लेकिन जब इसे खर्चों के तराजू पर तौला जाता है, तो तस्वीर कुछ और ही बताती है.

कमाई: ₹15,000 – ₹20,000 प्रति माह

कमरे का किराया: ₹5,000 (नोएडा जैसे शहर में)

परिवार: पत्नी और 3 बच्चे (कुल 5 सदस्य)

प्रहलाद भावुक होकर कहते हैं कि लोग पूछते हैं कि क्या 2008 से अब तक घर बना लिया? घर तो दूर की बात है, यहां तो रोजाना की जरूरतें ही मुश्किल से पूरी होती हैं. बस जैसे-तैसे मैनेज करना पड़ता है.

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सरकारी स्कूल का सहारा और बारिश का सीजन

झालमुड़ी के धंधे में सीजन के बारे में पूछने पर उन्होंने एक दिलचस्प बात बताई. उन्होंने कहा कि वैसे तो झालमुड़ी का स्वाद हर मौसम (गर्मी-ठंड) में लिया जाता है, लेकिन बारिश के मौसम में इसकी सेल सबसे ज्यादा होती है. तमाम महंगाई के बीच प्रहलाद जी अपने तीन बच्चों को पढ़ा रहे हैं. उन्होंने बताया कि बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं इसलिए शिक्षा का खर्च बच जाता है और इसी वजह से वह आज के दौर में भी घर का खर्च मैनेज कर पा रहे हैं वरना इतने कम पैसे में तो कुछ नहीं होता है.

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जब प्रशासन उठा ले जाता हैं ‘रोजी-रोटी’

काम में आने वाली परेशानियों पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि सबसे ज्यादा डर प्रशासन और पुलिस का होता है. कई बार उनका ठेला जब्त कर लिया जाता है, जिससे उनकी कई दिनों की कमाई और पूंजी दोनों का नुकसान हो जाता है. कई बार जब वह रात में अपना ठेला बंद करके जाते हैं और सुबह आते हैं तो उनका ठेला वहां पर नहीं होता है.

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