दुनिया भर की नदियों और झीलों में नशीले पदार्थों के बचे हुए केमिकल अब भी मौजूद हैं. कोकीन और उसका केमिकल पानी में मिल रहा है. जैसे घर में धुआं सांस लेने वाले बच्चों को नुकसान पहुंचाता है, वैसे ही प्रदूषित पानी में रहने वाली छोटी-छोटी जीव, मछलियां और यहां तक कि शार्क भी केमिकल को शरीर में सोख रही हैं.

पहली बार वैज्ञानिकों ने असली जंगली मछलियों पर प्रकृति में ही अध्ययन किया है. स्वीडन की टीम ने अटलांटिक सैल्मन मछलियों पर प्रयोग किया. नतीजा चौंकाने वाला था – कोकीन वाले पानी में रहने वाली मछलियां ज्यादा दूर-दूर तक भटकने लगीं. यह अध्ययन आज करंट बायोलॉजी मैगजीन में छपा है.

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पानी में कोकीन क्यों पहुंच रहा है?

नशे का असर तो इंसान पर कुछ घंटों में चला जाता है, लेकिन कोकीन और उसका केमिकल (बेंजॉइलेकोगोनिन) लंबे समय तक पानी में रह जाता है. दुनिया भर की नदियां और झीलें इससे भरी पड़ी हैं. लैब के प्रयोगों में देखा गया कि कोकीन मिलने पर पानी के छोटे कीड़े तेजी से तैरने लगते हैं.

कोकीन प्रदूषण सैल्मन भटकन की लालसा

क्रेफिश अपने सुरक्षित छुपने की जगह छोड़कर खतरनाक जगहों पर चले जाते हैं. लेकिन अब तक जंगली मछली पर असली प्रकृति में कोई अध्ययन नहीं हुआ था. स्वीडन के वैज्ञानिक जैक ब्रैंड और माइकल बर्ट्रम की टीम ने यह पहला काम किया.

वैज्ञानिकों ने हैचरी से ली गई दो साल पुरानी सैल्मन मछलियों को चुना. उन्होंने इनके शरीर में छोटी-छोटी सर्जरी करके डिवाइस लगाईं. ये डिवाइस धीरे-धीरे कोकीन या उसके मुख्य बचे हुए केमिकल को शरीर में छोड़ती रहती थीं. मात्रा ऐसी रखी गई कि यह प्रदूषित पानी में रहने वाली मछली जितनी ही हो.

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कुल 105 मछलियों को तीन ग्रुप में बांटा गया – एक को कोकीन, दूसरे को बेंजॉइलेकोगोनिन और तीसरे को बिना किसी केमिकल वाला कंट्रोल्ड ग्रुप. सभी मछलियों पर छोटे ट्रैकिंग टैग लगाए गए. फिर इन्हें स्वीडन की वेटर्न झील में छोड़ दिया गया और दो महीने तक उनकी हरकतों पर नजर रखी गई.

कोकीन प्रदूषण सैल्मन भटकन की लालसा

नतीजे देखकर हैरानी हुई

सामान्य सैल्मन मछलियां छोड़े जाने के बाद पहले ज्यादा घूमती हैं, फिर धीरे-धीरे एक जगह बस जाती हैं. लेकिन इस बार कोकीन और उसके बचे हुए केमिकल वाली मछलियां लंबे समय तक भटकती रहीं. बेंजॉइलेकोगोनिन वाली मछलियां हर हफ्ते कंट्रोल्ड मछलियों से 1.9 गुना ज्यादा दूरी तय कर रही थीं.

दो महीने बाद नियंत्रण वाली मछलियां झील के दक्षिणी किनारे से करीब 20 किलोमीटर दूर बस गईं. कोकीन वाली थोड़ी और दूर चली गईं, जबकि बेंजॉइलेकोगोनिन वाली करीब 32 किलोमीटर दूर पहुंच गईं. वैज्ञानिकों ने पाया कि कोकीन का मुख्य टूटा हुआ केमिकल ज्यादा समय तक मछली के शरीर में रहता है, इसलिए उसका असर भी ज्यादा था.

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अभी यह साफ नहीं है कि ये बदलाव मछलियों के जीवन को कितना नुकसान पहुंचाएंगे. हो सकता है कि ज्यादा भटकने से वे शिकार ढूंढने में अच्छी हों, या फिर खुद शिकारियों का आसान शिकार बन जाएं. वैज्ञानिक कहते हैं कि आगे और अध्ययन करने की जरूरत है.

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एक और सवाल यह भी है कि क्या खुली नदी मछलियों पर भी यही असर होगा? क्योंकि हैचरी की मछलियां स्वाभाविक रूप से कम सावधानी बरतती हैं. लेकिन एक बात पक्की है – नशीले पदार्थों के अवशेष और दूसरे प्रदूषक अब पानी की जिंदगी के लिए बड़ा खतरा बन चुके हैं.

वैज्ञानिकों की चिंता और हमें क्या करना चाहिए?

यूनिवर्सिटी ऑफ वॉटरलू के विशेषज्ञ मार्क सर्वोस ने कहा कि यह बहुत जरूरी और रोचक स्टडी है. हमें समाज में इस्तेमाल होने वाले हर केमिकल को समझना और प्रबंधित करना चाहिए जो हमारे नदियों और झीलों में पहुंच रहे हैं. यह अध्ययन सिर्फ सैल्मन तक सीमित नहीं है.

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इससे साफ है कि प्रदूषित पानी में रहने वाले सारे जीव-जंतुओं का व्यवहार बदल सकता है. अब सरकारों और वैज्ञानिकों को मिलकर जल प्रदूषण पर सख्त कदम उठाने चाहिए, ताकि प्रकृति का संतुलन बिगड़ने से बचाया जा सके. कोकीन प्रदूषण अब सिर्फ इंसानों की समस्या नहीं, बल्कि पूरी प्रकृति की समस्या बन चुका है.

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