World Earth Day 2026: धरती पर हर साल विलुप्त हो रहीं 27 हजार प्रजातियां, सद्गुरु ने जताई चिंता – world earth day 2026 sadhguru 27 thousand species extinct every year tvisu


आज, मानवता के इतिहास में पहली बार, हमें इस धरती को बचाने के बारे में बात करनी पड़ रही है. वह धरती जिसने इंसान की हजारों पीढ़ियों का पोषण किया है. पिछले 50 सालों में इस धरती से रीढ़ वाले जीवों की 73% आबादी और कीड़े-मकोड़ों का 80% बायोमास खत्म हो चुका है. जिस तरह से हम इस धरती पर रह रहे हैं, ऐसा लगता है जैसे हम इस धरती पर आखिरी पीढ़ी होने की योजना बना रहे हैं.

कुछ साल पहले कोई मुझे बता रहा था कि कुछ लाख प्रकाश-वर्ष दूर ऐसे कई ग्रह हैं, जो बिल्कुल पृथ्वी जैसे हैं. उन्होंने कहा, ‘हमें वहां जाकर उन्हें ढूंढना चाहिए.’ मैंने कहा, ‘अगर आपको लगता है कि वही उसका हल है तो आपको शुभकामनाएं!’ हम इसी पृथ्वी से पैदा हुए हैं और इसी में समा जाएंगे. सच कहूं तो अभी ऐसी कोई दूसरी जगह नहीं है जहां आप रह सकें. न चांद, न मंगल और न ही कहीं और. हमारे जीवन के लिए एकमात्र उपयुक्त जगह यही पृथ्वी है.

लोगों का मानना है कि अगर शेयर बाजार ऊपर चढ़ेगा तो उनका जीवन शानदार हो जाएगा. नहीं, हमारा जीवन तब शानदार होगा, जब हम पौष्टिक खाना खाएंगे. साफ पानी पिएंगे और शुद्ध हवा में सांस लेंगे. इस सब के लिए हमें एक समृद्ध इकोसिस्टम की जरूरत है. लेकिन इस धरती पर हर साल लगभग 27,000 प्रजातियां विलुप्त होती जा रही हैं.

इन सभी में सबसे बुनियादी पर्यावरण समस्या मिट्टी का क्षरण या विलुप्त होना है. इस धरती पर 95% जीवन मिट्टी पर निर्भर है. लेकिन अभी मिट्टी की हालत इतनी ज्यादा नाजुक है कि संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियां कह रही हैं कि इस धरती पर खेती लायक मिट्टी अब सिर्फ अगले 80 से 100 फसलों के लिए ही बची है!

एक बुनियादी समस्या यह है कि हम मिट्टी को बेजान चीज मान रहे हैं. नहीं, यह एक जीवित प्रणाली है. इस ब्रह्मांड में ज्ञात सबसे बड़ी जीवित प्रणाली. किसी उष्ण कटिबंधीय देश में मुट्ठी भर मिट्टी में 5-7 अरब सूक्ष्म जीव होते हैं. उनकी सक्रियता के बिना हमारा अस्तित्व संभव नहीं है. यहां तक कि विकास के क्रम में भी इन्हीं सूक्ष्म जीवों की सक्रियता ने हमें वह बनाया है जो आज हम हैं.

लोग सोचते हैं कि पौधे मिट्टी से पोषण लेते हैं. नहीं! सूक्ष्मजीवों की मदद के बिना पौधे मिट्टी से कोई भी पोषण सोख नहीं सकते. अभी वो माध्यम बहुत कमजोर हो गए हैं, क्योंकि सूक्ष्म जीवों की मात्रा बहुत कम हो गई है. अगर मिट्टी कमजोर है तो पौधा भी कमजोर होगा. और अगर पौधा कमजोर है तो आपको ऐसा क्यों लगता है कि आप कमजोर नहीं हुए हैं?

दुनिया के सबसे अमीर देश पर भी संकट
जब मिट्टी में पर्याप्त ताकत नहीं होती तो आपके खाने में जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्व भी मौजूद नहीं रहते. अमेरिका के ‘सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन’ के एक अध्ययन के मुताबिक, सभी अमेरिकी पोटैशियम की कमी से जूझ रहे हैं. 90% लोगों में विटामिन E की कमी है. 70% में विटामिन K की. 45% में मैग्नीशियम की. 43% में विटामिन A की और 39% में विटामिन C की. और ऐसा दुनिया के सबसे अमीर देश में हो रहा है! इसका सीधा सा मतलब है कि भले ही आप पर्याप्त खाना खा लें, लेकिन उसमें पर्याप्त पोषक तत्व नहीं होते, क्योंकि मिट्टी में अब कोई जान ही नहीं बची है.

जैसे-जैसे सूक्ष्मजीव खत्म होते जाएंगे, मानसिक रूप से स्थिर बने रहना एक बड़ी चुनौती बन जाएगा. इसका मतलब है कि हमारा ‘सॉफ्टवेयर’ बिखरने लगेगा. आज इस बात के पुख्ता सबूत मौजूद हैं कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं सीधे तौर पर सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी से जुड़ी होती हैं. लेकिन अगर जीवों की प्रजातियों के खत्म होने का सिलसिला इसी तरह जारी रहा तो अगले 25 से 40 सालों में हमारा ‘हार्डवेयर’ भी बिखरने लगेगा.

इसीलिए हमने पूरी दुनिया में ‘कॉन्शस प्लैनेट-सेव सॉयल’ नाम से एक बहुत बड़ा अभियान शुरू किया. ताकि एक ऐसी वैश्विक नीति बनाई जा सके जिसके तहत खेती की जमीन में क्षेत्रीय परिस्थितियों के आधार पर कम से कम 3-6% जैविक पदार्थ जरूर हो. अब दुनिया का ध्यान मिट्टी की ओर सफलतापूर्वक खींचा जा चुका है और मुझे पूरा यकीन है कि मिट्टी से जुड़ी नीतियां लागू की जाएंगी. लेकिन हमें यह समझना होगा कि एक सदी से ज्यादा के समय में मिट्टी को जो नुकसान हुआ है, उसे हम रातों-रात ठीक नहीं कर सकते.

लोगों में बढ़ रहीं मानसिक समस्याएं
लेकिन ‘मानव सॉफ्टवेयर’ के टूटने के शुरुआती संकेत अभी से दिखाई देने लगे हैं. कुछ ही दशक पहले तक मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं ऐसी चीजें थीं जो किसी दूसरे के साथ होती थीं. लेकिन आज या तो आपका कोई जानने वाला इससे गुजर रहा है. या शायद आप खुद ही इससे गुजर रहे हों. अमेरिका में सर्जन जनरल का कहना है कि हर दो में से एक व्यक्ति अकेलापन महसूस कर रहा है. यह सिर्फ अमेरिका की बात नहीं है. ऐसा पूरी दुनिया में होने लगा है. एक बार जब अकेलापन हावी होता है तो यह मनोवैज्ञानिक बीमारियों के पनपने का शुरुआती दौर बन जाता है.

इस समस्या को हल करने के लिए फरवरी 2025 में हमने ‘मिरेकल ऑफ माइंड’ ऐप लॉन्च किया था. यह ऐप एक आसान सात मिनट की ध्यान-प्रक्रिया प्रदान करता है, जिसका अभ्यास कहीं भी किया जा सकता है. ताकि व्यक्ति अपने जीवन में शांति, आनंद और उल्लास का अनुभव कर सके.

यही समय है कि हम यह समझें कि ‘व्यक्तिगत जीवन’ की सोच मूर्खतापूर्ण सोच है. यह सृष्टि की उदारता है कि उसने हमें एक व्यक्तिगत अनुभव दिया है. लेकिन असल में जीवन एक विशाल घटना के रूप में घटित हो रहा है. यदि आप इसके किसी एक हिस्से को तोड़ते हैं तो इसका असर हर दूसरे हिस्से पर भी पड़ेगा. यह ‘पृथ्वी दिवस’ हमें इस बात की याद दिलाने का सही अवसर है. एक पीढ़ी के तौर पर हमने इस धरती का सबसे अधिक दोहन किया है. अब समय आ गया है कि हम जागें और अपने तथा आने वाली पीढ़ियों की खुशहाली के लिए सुधारात्मक कदम उठाएं.

भारत के 50 सबसे प्रभावशाली लोगों में शुमार, सद्गुरु एक योगी, रहस्यदर्शी, दूरदर्शी और ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ के बेस्टसेलिंग लेखक हैं. सद्गुरु को वर्ष 2017 में भारत सरकार द्वारा ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया गया, जो असाधारण और विशिष्ट सेवा के लिए दिया जाने वाला देश का सर्वोच्च वार्षिक नागरिक सम्मान है. वे दुनिया के सबसे बड़े जन अभियान ‘कॉन्शस प्लैनेट-सेव सॉयल’ के संस्थापक भी हैं, जिसने 4 अरब से अधिक लोगों को छुआ है.

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