कभी-कभी वक्त सिर्फ गुजरता नहीं, भीतर तक खरोंच देता है. उन 26 परिवारों के लिए 22 अप्रैल की तारीख ऐसी ही एक खरोंच बनकर रह गई है, जिन्होंने पहलगाम के आतंकी हमले में अपनों को खो दिया. एक साल बीत चुका है, लेकिन दर्द का आकार जस का तस है. कानपुर के शुभम द्विवेदी की पत्नी ऐशान्या जब इस दिन को याद करती हैं, तो शब्द जैसे खुद-ब-खुद टूटने लगते हैं. वह कहती हैं कि सिर्फ मेरे लिए नहीं, उन सभी 26 परिवारों के लिए यह साल बेहद मुश्किल रहा होगा.

ऐशान्या बताती हैं कि उनकी शादी को महज दो महीने ही हुए थे, जब पहलगाम में उनके सामने ही शुभम की गोली मारकर हत्या कर दी गई. घर लौटना, उन्हीं दीवारों के बीच रहना जहां वो नहीं हैं ये बहुत मुश्किल है. वे बताती हैं कि कई बार ऐसा होता है जब वो शुभम की तस्वीर के सामने बैठकर उनसे बात करने की कोशिश करती हैं. वह कहती हैं कि मैं उसे बताना चाहती हूं कि आज मैंने क्या किया, क्या महसूस किया… लेकिन वो है ही नहीं. उसकी आवाज याद करने की कोशिश करती हूं जो बहुत मुश्किल है.

सीएम योगी से मुलाकात अब तक नहीं

प्रधानमंत्री से मुलाकात का जिक्र करते हुए ऐशान्या बताती हैं कि उस वक्त हालात बेहद भावुक थे, वे अपनी बात रख पाईं. वह कहती हैं कि पीएम से बात हुई, उन्होंने मेरी बातें सुनीं.साथ ही वह बताती हैं कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात अब तक नहीं हो सकी. वह कहती हैं कि जब सीएम योगी हमारे यहां आए थे उस समय ऐसी स्थिति नहीं थी कि हम उनसे कुछ बात कर सकते थे. ऐशान्या के मुताबिक अब मैंने कई बार समय मांगा है. 2-3 बार कोशिश की, लेकिन मुलाकात नहीं हो पाई. मैं इस राज्य की बेटी हूं, कम से कम एक बार सामने बैठकर बात करना चाहती हूं.

कश्मीर को लेकर ऐशान्या का नजरिया बिल्कुल साफ है. वे मानती हैं कि पर्यटन से वहां के लोगों की जिंदगी बेहतर हो सकती है. जब लोगों को सही तरीके से पैसा मिलेगा, तो वे गलत रास्ते क्यों चुनेंगे? लेकिन वे यह भी कहती हैं कि कश्मीर का एक दूसरा पक्ष भी है जहां कुछ लोग आतंकियों को पनाह देते हैं. दोनों साइड हैं. अब लोगों को खुद तय करना है कि उन्हें वहां जाना चाहिए या नहीं. अपने बारे में वे साफ कहती हैं कि मैं कभी कश्मीर नहीं जाऊंगी क्योंकि उस जगह ने मुझसे सब कुछ छीन लिया.

परिवार बना सहारा, लेकिन खालीपन कायम

ऐशान्या मानती हैं कि शुभम का परिवार उनके लिए सबसे बड़ा सहारा बना. वह कहती हैं कि मैं खुशकिस्मत हूं कि मुझे इतना मजबूत परिवार मिला है. उन्होंने हर पल मेरा साथ दिया.लेकिन इसके बावजूद, एक ‘सैचुरेशन पॉइंट’ आता है जब भीतर का दर्द बाहर आ ही जाता है.

ऑपरेशन सिंदूर और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई

ऐशान्या कहती हैं कि हमले के बाद केंद्र सरकार ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसे अभियान चलाए. काम चल रहा है, आर्मी लगातार ऑपरेशन कर रही है. लेकिन जब तक आतंकवाद 0.01 प्रतिशत भी बाकी है, तब तक हमें रुकना नहीं चाहिए.
वे दो टूक कहती हैं आतंकवाद के लिए ‘जीरो टॉलरेंस’ होना चाहिए. जो लोग आतंक फैलाते हैं या उसका समर्थन करते हैं, उन्हें जीने का अधिकार नहीं होना चाहिए. हालांकि, वे यह भी जोड़ती हैं कि किसी की जान लेने का अधिकार सिर्फ ईश्वर को है इंसान का इंसान की जान लेना गलत है लेकिन जो आतंकवाद फैला रहे हैं, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई जरूरी है.

पाकिस्तान पर कड़ा रुख: शांति की बात करना दिखावा

ऐशान्या का गुस्सा पाकिस्तान को लेकर भी साफ झलकता है. वे कहती हैं कि जो देश खुद आतंकवाद को पनाह देता है, वही शांति की बात करे ये सिर्फ दिखावा है. उनका मानना है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी छवि सुधारने के लिए पाकिस्तान इस तरह के कदम उठाता है. दुनिया को ऐसे देशों का बहिष्कार करना चाहिए.

26 जिंदगियों के लिए राष्ट्रीय सम्मान की मांग

ऐशान्या की सबसे बड़ी मांग है उन 26 लोगों को ‘राष्ट्रीय सम्मान’ दिया जाए, जो इस हमले में मारे गए. वह कहती हैं कि ये कोई सामान्य आतंकी हमला नहीं था. लोगों से धर्म पूछकर उन्हें निशाना बनाया गया. यह देश पर सीधा हमला था. वे ‘शहीद’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए साफ करती हैं कि मेरा मतलब सेना से नहीं है, बल्कि उस सम्मान से है जो इन लोगों को मिलना चाहिए. उन्होंने अपने धर्म और देश के लिए जान दी है.

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