ये तीसरा साल था जब मैं केदारनाथ धाम के कपाट खुलने पर कवरेज के लिए गई थी, लेकिन पहला मौका बाबा की शीतकालीन गद्दी स्थल से डोली की केदारनाथ जाने की पूरी प्रक्रिया को कवर करने का.
हम दिल्ली से लगभग 450 किलोमीटर तय कर रात करीब 11 बजे ऊखीमठ पहुंचे. तापमान 13 डिग्री के आस पास था. मौसम एकदम सुहाना था. लेकिन 13 घंटे का सफर तय करने के बाद मौसम को फील करने का मेरा कोई इरादा नहीं था. तो बस… मैंने पहाड़ी दाल और दो रोटी खाई और फिर थककर सो गई.
सुबह 6 बजे हम उठे और ऊखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर की ओर चल पड़े. सुबह का समय, हिमालय की खूबसूरत वादियां और उन वादियों के बीच स्थित लगभग 5000 साल पुराना नागर शैली में बना ये मंदिर. यहां पहुंचकर एक अलग ही एहसास हो रहा था.
पूरा मंदिर फूल मालाओं से सजा हुआ था और मंदिर के प्रांगण में हजारों की तादाद में जय श्री केदार का उद्घोष करते श्रद्धालु. यहां पहुंचते ही एक श्रद्धालु मंदिर प्रांगण में खूबसूरत सी रंगोली बनाता हुआ मुझे दिखा. बात की तो पता चला कि ये महाशय महाराष्ट्र से आए हैं और इनका संकल्प पूरी केदारनाथ यात्रा तक 101 रंगोली बनाने का है. बस मेरी स्टोरी की शुरुआत वहीं से हुई.
इसके बाद शिव की मूर्ति अपने कंधे पर उठाए शिव भक्त से लेकर सिख रेजिमेंट की ओर से ‘ओम जय जगदीश हरे’ की मधुर धुन बजाते सेना का बैंड… सब कवर किया.
कुछ नया या अनूठा ढूंढते-ढूंढते मेरी नजर एक महिला पर गई जो तमाम श्रद्धालुओं से बिल्कुल अलग थी. उम्र कोई 45-50 के बीच रही होगी. चेहरे पर सादगी. हल्के रंग के कपड़े पहने थे. और हां कंधे पर एक असमिया गामोसा रखा था. सफेद रंग का सूरी कपड़ा जिसके तीन तरफ लाल बॉर्डर और एक तरफ कढ़ाई होती है.
मैं उनके पास गई और पूछा तो पता चला कि वो असम से पहली बार ऊखीमठ आई हैं. उन्होंने कहा, ‘केदारनाथ मैं कई बार जा चुकी हूं. मगर इस बार मन था बाबा के शीतकालीन गद्दी स्थल ऊखीमठ जाकर उत्सव डोली का शृंगार और रावल द्वारा कराई जाने वाली पूजन विधि को देखने का. सच कहूं तो वो सिर्फ देख ही रही थी. ऐसा लगा मानो इस यात्रा के शुरुआती युग में जाकर चीजों को समझने और जानने कोशिश कर रही हूं.’
मैं भी वैसे ऐसी ही हूं. मैं भी बिना किसी शोर-शराबे के बस एकांत में बैठकर हमारी सदियों पुरानी परंपरा और संस्कृति को जानना चाहती हूं और उस पल को जीना चाहती हूं. मगर इसके लिए भी वक्त कहां है. एक पल के लिए मैं खो सी गई. फिर अचानक याद आया कि मैं ऑफिशियल ट्रिप पर हूं और मुझे स्टोरीज भेजनी हैं. बस सारा एहसास और अनुभूति रफू चक्कर हो गए. मैं अपने काम पर फिर से लग गई.
दूसरे दिन बाबा की पंचमुखी डोली को फाटा से गौरी कुंड जाना था, जो करीब 18 किलोमीटर दूर था. तो सुबह-सुबह फाटा से लाइव करके हम भी बढ़ चले गौरी कुंड की ओर. रास्ते में सोनप्रयाग में कुछ देर ठहरकर श्रद्धालुओं से मैंने बात की. कोई गुजरात से आया था तो कोई बिहार से. कोई पंजाब से था तो कोई मध्य प्रदेश से. इन सबके बीच था 10 साल का एक बच्चा, जिसने कहा मैं इसलिए केदारनाथ जा रहा हूं, क्योंकि मुझे पुलिस ऑफिसर बनकर देश की सेवा करनी है. यह सुनते ही वहां मौजूद सभी लोग ताली बजाने लगे और हर-हर महादेव का उद्घोष करने लगे. इसके बाद उस छोटे से बच्चे ने पूरा शिव तांडव स्तोत्र सुनाकर सबको चकित कर दिया.
ये सबकुछ हमारे कैमरे ने कैद किया. शाम होने को थी और हम डोली के साथ पहुंच चुके थे गौरी कुंड. जहां मौजूद है माता पार्वती को समर्पित गौरी मंदिर. इसका वर्णन स्कन्द पुराण में भी मिलता है. कहा जाता है कि माता पार्वती ने इसी जगह हजारों साल तक भोलेनाथ को पाने के लिए कठिन तपस्या की थी.
बैंड की धुन और महादेव के जयकारों के बीच बाबा की डोली अब पहुंच चुकी थी गौरी कुंड. मौसम हल्का धुंधला था और ठंडी हवाएं बह रही थीं. यहां भी मंदिर प्रांगण में भक्त हर-हर महादेव के जयकारे लगा रहे थे. तो कुछ बैंड की धुन पर झूम रहे थे. पूरा माहौल भक्तिमय हो उठा था.
ऐसे में मेरी नजर फिर उस महिला पर पड़ी जो चुपचाप अपने आधे शरीर को मंदिर की दीवार पर टिकाए ये सब देख रही थी. उसे देखकर न जाने ऐसा क्यों लगा कि वह बिना कुछ बोले भी बहुत कुछ बोल रही थी. लेकिन एक बार फिर मुझे ऑफिस और मेरा काम याद आ गया.
तीसरे दिन हम पहुंच चुके थे भोलेनाथ के धाम केदारनाथ. डोली के साथ भारी संख्या में श्रद्धालु भी यहां आ चुके थे, जिसके लिए उन्होंने 6 महीने तक इंतजार किया था. हिमालय की बर्फ से ढकी पहाड़ियां. कल-कल बहता मंदाकिनी का पानी और हाड़ कंपाने वाली ठंड. तापमान कुछ माइनस 6 डिग्री रहा होगा. पूरी केदार घाटी जय श्री केदार के उद्घोष से गूंज रही थी. हर कोई अपने फोन के कैमरे में इस लम्हे को कैद करना चाह रहा था. मैं भी लगातार लाइव कर रही थी और आंखों देखी दर्शकों को बता रही थी.
इसी बीच पूरे विधि-विधान के साथ मंदिर के कपाट खुल गए और फिर भक्तों का रेला बाबा केदार के दर्शनों को टूट पड़ा. बहुत सी कहानियां समेटने और लोगों से बातचीत के बाद अब बाबा के दर्शन कर वापस लौटने का वक्त आ गया था. लेकिन एक बार फिर वो महिला मुझे मंदिर प्रांगण में शांत भाव से नीचे बैठी मंदिर को एक टक देखती हुई मिलीं.
मैं नहीं जानती कि उस महिला से मैं दोबारा कभी मिल पाऊंगी या नहीं. मगर हां, इस यात्रा में उसने मुझे ये एहसास करा दिया कि दुनिया के शोर के बीच भी आप शांत रह सकते हैं. और उस शांति में आप खुद को और शिव दोनों को पा सकते हैं. और हां, कुछ चीजें केवल महसूस करने के लिए होती हैं. न की कैमरे में कैद करने के लिए. सोचा है कि अगली बार जाना हुआ तो बिना कैमरा और माइक के जाऊंगी और वहां पहुंचकर अंतरात्मा की तलाश शुरू करुंगी.
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