‘स्कूल की हर दिन की नई डिमांड, कभी यूनिफॉर्म तो कभी किताबें तो कभी बढ़ी फीस. इन सब चोंचलों के साथ भी बच्चा सीख क्या रहा था. हीन भावना?’ नोएडा के एक पेरेंट्स ने अपने बच्चों को बड़े प्राइवेट स्कूल से खीझकर उन्हें दोबारा कभी स्कूल न भेजने की सोची. इसी रिसर्च में उन्हें होम स्कूलिंग का आइडिया आया और फिर कुछ पेरेंट्स ने मिलकर होम स्कूलिंग शुरू कर दी.
ये शुरुआत आसान नहीं थी. बच्चे के समाज से कट जाने का डर, अकेले रहकर पढ़ाने का रिस्क ये सब पीछा कर रहे थे. लेकिन उन्होंने अपने डर से पार पाया और आज भी उनका बच्चा छह साल से होम स्कूलिंग कर रहा. ये अकेले पेरेंट्स नहीं हैं जो होम स्कूलिंग को अपना चुके हैं. बदलते दौर में पढ़ाई का तरीका तेजी से बदल ही रहा है. देश के बड़े शहरों जैसे बेंगलुरु, मुंबई और दिल्ली ही नहीं अब छोटे शहरों में भी ‘होमस्कूलिंग’ का क्रेज तेजी से बढ़ रहा है.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बूम आने के बाद कई रिपोर्ट्स बता रही हैं कि ये चलन और तेजी से बढ़ने वाला है. जब बच्चे को ढर्रे की पढ़ाई से ज्यादा स्किल्ड बनाने का चैलेंज बढ़ रहा. यही वजह है कि कई माता-पिता अपने बच्चों को पारंपरिक स्कूल के बोझिल माहौल से निकालकर घर पर ही उनकी रुचि के अनुसार पढ़ाना पसंद कर रहे हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत में ये सिस्टम कानूनी है? अगर बच्चा होम स्कूलिंग में किसी ग्रुप के साथ या घर पर बैठकर पढ़ भी लेता है तो वो बोर्ड परीक्षा कैसे देगा? और क्या उसे कॉलेज में एडमिशन मिलेगा? ऐसे तमाम सवाल सामने हैं. चलिए यहां इनके जवाब और पेरेंट्स के स्कूल छुड़वाने के डर को समझते हैं.
क्या भारत में होमस्कूलिंग कानूनी है?
कानून की बात करें तो भारत में होमस्कूलिंग पूरी तरह लीगल है. शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act 2009) 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा अनिवार्य करता है, लेकिन ये कहीं नहीं है कि ये शिक्षा सिर्फ स्कूल की चारदीवारी के भीतर ही होनी चाहिए.
NEP 2020 यानी नई शिक्षा नीति भी वैकल्पिक और व्यक्तिगत शिक्षा को बढ़ावा देती है, जिससे होमस्कूलिंग करने वाले परिवारों को एक मजबूत आधार मिला है.
अगर बोर्ड परीक्षा की बात करें तो होमस्कूलिंग का मतलब यह कतई नहीं है कि बच्चा परीक्षा नहीं देगा. भारत में इसके लिए NIOS (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग) है जो सरकार का बोर्ड है. इसके जरिए छात्र कक्षा 10वीं और 12वीं की परीक्षा ‘प्राइवेट कैंडिडेट’ के तौर पर दे सकते हैं. इसकी मार्कशीट CBSE और अन्य बोर्ड के बराबर मान्य है.
इसके अलावा IGCSE (कैम्ब्रिज) है, इसमें जो छात्र अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पढ़ाई करना चाहते हैं, वे कैम्ब्रिज इंटरनेशनल बोर्ड के जरिए प्राइवेट छात्र के रूप में परीक्षा दे सकते हैं.
अब सवाल यह उठता है कि ये छात्र क्या JEE और NEET दे पाएंगे? माता-पिताओं को भी टेंशन होती है कि क्या होमस्कूलिंग वाला बच्चा डॉक्टर या इंजीनियर बन पाएगा? इसका जवाब भी हां में है, यानी NIOS से 12वीं करने वाले छात्र JEE (इंजीनियरिंग), NEET (मेडिकल) और CLAT (लॉ) जैसी सभी प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठ सकते हैं. भारत का हर विश्वविद्यालय NIOS के प्रमाणपत्र को स्वीकार करता है.
महंगी या सस्ती पढ़ाई?
इसका जवाब थोड़ा कठिन है. अब तक हमने होम स्कूल का जो क्रेज देखा उसमें होमस्कूलिंग महंगी भी हो सकती है और सस्ती भी. इसमें NIOS के जरिए पढ़ाई करना बेहद सस्ता है. इसकी रजिस्ट्रेशन फीस 5,000 रुपये से भी कम है. लेकिन कई पेरेंट्स एकजुट होकर 5 से 10 बच्चों को एक साथ घर पर पढ़वाते हैं. इससे उन्हें ये पढ़ाई काफी महंगी पड़ती है. ये ग्रुप में पढ़ाई के पीछे पेरेंट्स के मन में ये डर रहता है कि मेरा बच्चा अगर स्कूल सिस्टम से कट गया तो वो सोशल कैसे बनेगा.
एक्सपर्ट मानते हैं कि बच्चा स्कूल में सिर्फ पढ़ाई ही नहीं करता, यहां उसके संपूर्ण व्यक्तित्व का विकास होता है. होम स्कूलिंग वाले बच्चे उस तरह का अनुशासन और सोशल स्किल नहीं सीख सकते जितना एक रेगुलर बच्चा सीखता है.
यही वजह है कि स्कूल न जाने पर बच्चा ‘अकेला’ न पड़ जाए, इसके लिए भारत में अब ‘होमस्कूलिंग कम्युनिटीज’ बन गई हैं. बच्चे स्पोर्ट्स क्लब, म्यूजिक क्लास और आर्ट वर्कशॉप्स के जरिए दूसरे बच्चों से मिलते हैं. कई शहरों में होमस्कूलर बच्चे मिलकर ट्रिप्स और एक्टिविटीज प्लान करते हैं. इन कम्यूनिटीज में बच्चों को पढ़ाना कई बार महंगा पड़ता है.
वहीं यदि आप ऑनलाइन इंटरनेशनल स्कूल या प्राइवेट ट्यूटर्स की मदद लेते हैं, तो खर्च और बढ़ सकता है, लेकिन यह बड़े प्राइवेट स्कूलों की फीस से फिर भी कम रहता है.
होमस्कूलिंग की तरफ शिफ्ट होने के लिए पेरेंट्स का मोटिवेट होना बहुत जरूरी है. उन्हें खुद से पूछना होगा कि पारंपरिक स्कूलों से हटकर क्या वो आपके बच्चे किस स्कूल में पढ़ते हैं, का जवाब देने को तैयार हैं. फिर इंडियन या इंटरनेशनल बोर्ड चुनना और कम्यूनिटी का नेचर परखने जैसी चुनौतियां भी हैं. यही नहीं घर पर पढ़ाई के लिए एक निश्चित टाइम-टेबल बनाना बहुत जरूरी है, वरना पढ़ाई पिछड़ सकती है.
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