पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में उत्तर 24 परगना जिले के मतुआ बहुल इलाकों में एक बड़ा राजनीतिक संकट सामने आया है. हजारों मतुआ समुदाय के लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने की खबर ने भाजपा के लिए चिंता बढ़ा दी है. जिन लोगों ने नागरिकता के वादे पर भाजपा का साथ दिया था, वही अब अपने वोटर कार्ड बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं.
आज तक की रिपोर्ट के मुताबिक, गाइघाटा, बोंगांव दक्षिण और हाबरा जैसे विधानसभा क्षेत्रों में बड़ी संख्या में मतुआ परिवारों के नाम मतदाता सूची से हटे हैं. यह मामला चुनाव आयोग की विशेष गहन समीक्षा प्रक्रिया (SIR) के बाद सामने आया है. यही प्रक्रिया अब पश्चिम बंगाल की राजनीति में सबसे बड़ा मुद्दा बन चुकी है.
वोटर लिस्ट में नहीं है नाम
ठाकुरनगर, जो मतुआ समुदाय का मुख्य केंद्र माना जाता है, वहां ठाकुरबाड़ी से कुछ ही दूरी पर रहने वाले नीरेंद्रु बिस्वास और उनके बेटे सूरज का नाम वोटर सूची से हटा दिया गया है. नीरेंद्रु ने 2021 विधानसभा चुनाव, 2024 लोकसभा चुनाव और ग्राम पंचायत चुनाव में मतदान किया था. उनके पास सभी जरूरी दस्तावेज हैं, लेकिन फिर भी उनका नाम सूची से बाहर है.
नीरेंद्रु कहते हैं कि उन्हें नागरिकता कानून के तहत भारतीय नागरिकता मिलने का भरोसा दिया गया था, लेकिन अब उनका वोटर कार्ड ही खतरे में है. उनकी पत्नी पूर्णिमा का नाम सूची में है, क्योंकि वह स्थानीय निवासी हैं. लेकिन बेटे का नाम हटने से परिवार चिंतित है. उनके बेटे को सुनने और बोलने में दिक्कत है.
बिस्वजीत बिस्वास को निराशा हाथ लगी
बोंगांव दक्षिण के चांदपाड़ा में रहने वाले 33 वर्षीय बिस्वजीत बिस्वास के परिवार के पांच सदस्यों के नाम भी सूची से हट गए हैं. केवल उनकी पत्नी का नाम बचा है. बिस्वजीत ने बताया कि उनके माता-पिता 1992 में बांग्लादेश से सुरक्षा कारणों से भारत आए थे. परिवार ने भाजपा को इसलिए वोट दिया था क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि नागरिकता मिलेगी. अब वही वोटर अधिकार छिनता दिख रहा है.
भाजपा से नाराजगी
उन्होंने सवाल उठाया कि अगर वे 2019 और 2024 में वोट डाल सकते थे, तो अब अचानक उनका नाम क्यों हटा दिया गया. बिस्वजीत ने भाजपा से नाराजगी जताई और कहा कि स्थानीय भाजपा नेता अब इलाके में नहीं आ रहे, जबकि तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार लोगों से मिल रहे हैं.
हाबरा के सुकांत सरणी इलाके में भी यही स्थिति है. यहां सिर्फ मतुआ ही नहीं, बल्कि अन्य हिंदू परिवारों के नाम भी हटे हैं. उन्नति पाल ने बताया कि उनके माता-पिता का नाम 2002 की मतदाता सूची में था, लेकिन अब उनका नाम हट चुका है. उनके बेटे का नाम सूची में है, लेकिन उनका खुद का नहीं.
कई लोगों की एक तरह की शिकायत
मतुआ समुदाय के बाबूराम पाल, जो 15 साल पहले बांग्लादेश के जेसोर से भारत आए थे, वे कहते हैं कि उन्होंने पिछले तीन चुनावों में इसी वोटर पहचान पत्र से मतदान किया था. उन्होंने आधार, पैन, राशन कार्ड जैसे दस्तावेज भी दिखाए, लेकिन नाम बहाल नहीं हुआ.
क्या बोले भाजपा विधायक?
इस मुद्दे पर भाजपा नेता और गाइघाटा से विधायक सुभ्रत ठाकुर ने माना कि हजारों मतुआ मतदाताओं के नाम हटे हैं. हालांकि उन्होंने कहा कि सभी मतुआ भाजपा समर्थक नहीं हैं और राज्य सरकार के खिलाफ माहौल भाजपा को फायदा देगा. उन्होंने भरोसा दिलाया कि नाम दोबारा जोड़े जाएंगे और नागरिकता कानून के जरिए राहत मिलेगी.
वहीं केंद्रीय मंत्री और बोंगांव सांसद शांतनु ठाकुर ने कहा कि मतुआ समुदाय में कोई चिंता नहीं है. उन्होंने दावा किया कि जिनके नाम हटे हैं, वे फिर से जोड़े जाएंगे और नागरिकता प्रक्रिया के तहत उन्हें अधिकार मिलेगा. उन्होंने यह भी कहा कि अब तक 3000 से 4000 मतुआ लोगों को भारतीय नागरिकता मिल चुकी है.
45 से 50 विधानसभा सीटों पर मतुआ का असर
मतुआ या नामशूद्र समुदाय पश्चिम बंगाल की सबसे बड़ी दलित आबादी में से एक है. विशेषज्ञों के अनुसार, इनका असर राज्य की 45 से 50 विधानसभा सीटों पर है. उत्तर 24 परगना, नदिया और दिनाजपुर जैसे इलाके इनके प्रभाव वाले क्षेत्र हैं.
2019 में भाजपा ने नागरिकता संशोधन कानून के वादे के जरिए मतुआ समुदाय का समर्थन हासिल किया था. 2021 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 33 में से 5 सीटें जीती थीं. इनमें गाइघाटा, बागदाबोंगांव दक्षिण, बोंगांव उत्तर और भाटपाड़ा शामिल हैं. कई सीटों पर जीत का अंतर सिर्फ 1 से 5 प्रतिशत के बीच था.
ऐसे में मतदाता सूची से नाम हटना भाजपा के लिए बड़ा खतरा बन सकता है. जिन लोगों की पहचान और उम्मीद वोटर कार्ड से जुड़ी थी, वे अब खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं. नागरिकता की उम्मीद से शुरू हुआ सफर अब वोटर पहचान बचाने की जंग में बदल चुका है.
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