वेंस का फ़ोन और बिगड़ गई बात… नेतन्याहू ने बताया कि इस्लामाबाद वार्ता क्यों विफल रही – iran us israel middle east war Islamabad talks failed JD Vance Netanyahu mdsb ntc

ByCrank10

April 13, 2026 , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , ,


इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सोमवार को कहा कि इस्लामाबाद में अमेरिका-ईरान बातचीत सिर्फ़ टूटी ही नहीं, बल्कि एक कॉल के साथ खत्म हुई. उन्होंने इसके लिए वॉशिंगटन की उस प्रतिक्रिया को ज़िम्मेदार ठहराया, जिसे उसने ईरान द्वारा सीज़फ़ायर की शर्तों के उल्लंघन के तौर पर देखा था.

नेतन्याहू ने अपनी कैबिनेट को बताया कि उन्होंने अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस से बात की थी. वेंस ने समझौता न होने के बाद पाकिस्तान से लौटते वक्त अपने विमान से ही उन्हें इस बारे में जानकारी दी.

नेतन्याहू ने कहा, “मैंने कल उपराष्ट्रपति जेडी वेंस से बात की. उन्होंने मुझे बातचीत में हुई प्रगति के बारे में विस्तार से बताया. उनके मुताबिक, अमेरिका इस नतीजे पर पहुंचा था कि ईरान सीज़फ़ायर से जुड़ी एक अहम शर्त को पूरा करने में नाकाम रहा है. वह शर्त थी, होर्मुज़ स्ट्रेट के रास्ते को फिर से खोलना.

उनके बयान से पता चलता है कि बातचीत टूटने की तात्कालिक वजह सिर्फ परमाणु मुद्दे से जुड़ी न होकर, समुद्री पहुंच और होर्मुज से जुड़ी थी. हालांकि, नेतन्याहू ने वॉशिंगटन की उस मुख्य और गैर-समझौता योग्य मांग का भी ज़िक्र किया, जो उन्होंने ईरान के परमाणु कार्यक्रम के संबंध में बताई थी.

“उन्होंने मुझे यह भी बताया कि बड़ा मुद्दा सभी संवर्धित सामग्री को हटाना है और यह तय करना है कि आने वाले वर्षों में कोई और संवर्धन न हो. ईरान के अंदर कोई संवर्धन नहीं होना चाहिए.”

पिछले हफ्ते वेंस ने कहा कि इस्लामाबाद में 21 घंटे की बातचीत के बाद भी अमेरिका ईरान के साथ किसी समझौते पर पहुंचने में असफल रहा, जबकि सफलता पाने के लिए लगातार प्रयास किए गए थे.

अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि बातचीत तब टूट गई, जब ईरान ने वॉशिंगटन की इस मुख्य मांग को मानने से इनकार कर दिया कि वह परमाणु हथियार बनाने के किसी भी रास्ते को छोड़ दे और अपनी संवर्धन सुविधाओं को कम करे.

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रविवार को इसी रुख को दोहराते हुए कहा कि ईरान के पास कभी भी परमाणु हथियार नहीं होगा और बातचीत की विफलता के लिए तेहरान के उस मांग को मानने से इनकार करने को ज़िम्मेदार ठहराया.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?

विश्लेषकों का कहना है कि बातचीत शायद परस्पर विरोधी अपेक्षाओं और एक-दूसरे से मेल न खाने वाली ‘रेड लाइन्स’ के दबाव में टूट गई हो. मिडिल ईस्ट और खुफिया मामलों के जानकार डैनी सिट्रिनोविच ने कहा कि एक व्यावहारिक समझौता अभी भी मुमकिन था, जिसमें सख्त शर्तों के तहत सीमित यूरेनियम संवर्धन, एक समय-सीमा के अंदर रोक और गहन निगरानी शामिल हो सकती थी, जैसा कि पहले ओमान के बैकचैनल समझौतों में हुआ था.

यह भी पढ़ें: वेंस को आए नेतन्याहू के एक कॉल से फेल हो गई शांति वार्ता? ईरानी विदेश मंत्री ने बताई अंदर की कहानी

हालांकि, नेतन्याहू का बयान अमेरिका के कहीं ज्यादा कठोर रुख की ओर इशारा करता है, जिसमें प्रभावी रूप से यह मांग की गई है कि सब कुछ बाहर कर दिया जाए और कुछ भी अंदर न रहे, यानी ईरान के अंदर वर्षों तक और संभवतः दशकों तक, किसी भी तरह के संवर्धन की अनुमति न हो.

यह विरोधाभास उस खाई को उजागर करता है, जिसे इस्लामाबाद की बातचीत पाट नहीं सकी. जहां एक तरफ ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि दोनों पक्ष एक ‘समझौता ज्ञापन’ (MOU) पर हस्ताक्षर करने से बस कुछ ही इंच दूर थे. वहीं, नेतन्याहू ने ज़ोर देकर कहा कि बातचीत सीजफायर के पालन और होर्मुज तक पहुंच के मुद्दे पर अचानक टूट गई. ये दो विरोधी बातें है. एक जो लगभग हो चुके समझौते की ओर इशारा करती है, और दूसरी जो ऐसी मांगों की ओर इशारा करती है, जिन्हें पूरा करना नामुमकिन था. उसी नाकाम बातचीत में मौजूद दो अलग-अलग दरारों को दिखाती हैं.

इस बातचीत के टूटने के बाद से ही इस इलाके में तनाव काफ़ी बढ़ गया है. इसमें अमेरिका की वह कार्रवाई भी शामिल है, जिसके तहत उसने होर्मुज़ स्ट्रेट से आने-जाने वाले जहाज़ों पर समुद्री नाकेबंदी लागू करने की कोशिश की है, जिससे एक बड़े टकराव का खतरा बढ़ गया है.

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