जरूरी नहीं कि हर आईआईटी टॉपर तकनीकी दुनिया या कॉर्पोरेट लीडरशिप के उस रास्ते पर चले, जो पहले से तय है. कुछ ऐसे भी होते हैं जो उन गहरे वैज्ञानिक सवालों के पीछे भागते हैं, जो पारंपरिक करियर की सीमाओं से परे हैं. न‍ित‍िन गुप्ता एक ऐसे ही शिक्षाविद हैं, जिनका सफर इंजीनियरिंग से शुरू होकर इंसानी दिमाग की कार्यप्रणाली को डिकोड करने तक पहुंचा है.

साल 2000 में जब उन्होंने आईआईटी-जेईई (IIT-JEE) में ऑल इंडिया रैंक 1 हासिल की और आईआईटी कानपुर में कदम रखा, तो टेक्नोलॉजी की दुनिया में उनका करियर लगभग तय लग रहा था. लेक‍िन, उन्होंने धीरे-धीरे न्यूरोसाइंस की ओर रुख क‍ियाा, एक ऐसा क्षेत्र जो बायोलॉजी, कंप्यूटेशन और इंसानी व्यवहार का संगम है.

आईआईटी कानपुर से ग्लोबल रिसर्च लैब्स तक
प्रोफेसर गुप्ता ने 2004 में आईआईटी कानपुर से कंप्यूटर साइंस में बीटेक पूरा क‍िया. उनकी शुरुआती पढ़ाई इंजीनियरिंग में रची-बसी थी, लेक‍िन धीरे-धीरे उनकी रुचि बायोलॉजी और डेटा साइंस की ओर बढ़ गई.

उनके प्रोफेशनल प्रोफाइल के अनुसार, उन्होंने 2004 से 2009 के बीच यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, सैन डिएगो (UCSD) से पीएचडी की, जहां उनका मुख्य विषय बायोइन्फॉरमैटिक्स और सिस्टम्स बायोलॉजी था. इस दौरान, उन्होंने प्रोटीन की पहचान करने और बायोलॉजिकल डेटा को सटीक बनाने के लिए एल्गोरिदम विकसित क‍िए. उनका शोध ‘प्रोटिओजेनोमिक्स’ के उभरते क्षेत्र में था, जिसका उद्देश्य यह समझना है कि जीन प्रोटीन में कैसे बदलते हैं.

उन्होंने एमजेन (Amgen) और जेनोमेटिका जैसी बड़ी बायोटेक और फार्मास्युटिकल कंपनियों में भी काम क‍िया, जहाँ उन्होंने सीखा कि कैसे कंप्यूटेशनल रिसर्च का इस्तेमाल असल दुनिया की समस्याओं को सुलझाने में होता है.

डेटा से इंसानी दिमाग की ओर
न‍ित‍िन गुप्ता का न्यूरोसाइंस का सफर सैन डिएगो में पोस्टडॉक्टरल रिसर्च के दौरान शुरू हुआ. यहाँ उन्होंने कॉग्निटिव न्यूरोसाइंस लैब में काम करते हुए ‘ट्रांसक्रैनियल मैग्नेटिक स्टिमुलेशन’ (TMS) जैसे टूल का उपयोग क‍िया, ताकि यह समझा जा सके कि प्रेरणा और दिमागी गतिविधि के बीच क्या संबंध है.

बाद में, वे नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ (NIH) से जुड़े, जहां उन्होंने ‘इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी’ पर गहरा शोध क‍िया. यहां उन्होंने पढ़ा कि न्यूरॉन्स आपस में कैसे संवाद करते हैं और कैसे दिमाग के संकेतों से हम चीजों को महसूस करते हैं. यह उनके करियर का वह मोड़ था जहां उन्होंने बायोलॉजिकल डेटा को समझने के बजाय सीधे ब्रेन सर्किट्स का अध्ययन शुरू क‍िया.

आईआईटी कानपुर में न्यूरोसाइंस प्रोग्राम की नींव
2014 में आईआईटी कानपुर वापस आकर वे फैकल्टी के रूप में जुड़े और 2020 में एसोसिएट प्रोफेसर बने. आज उनका काम न्यूरोसाइंस, कंप्यूटेशन और व्यवहार के बीच की कड़ी है.

उनकी लैब इस बात पर केंद्रित है कि दिमाग बाहरी संकेतों (Sensory Inputs) को कैसे प्रोसेस करता है. उनके शोध का एक बड़ा हिस्सा मच्छरों जैसे कीटों के जरिए ‘सूंघने की शक्ति’ (Olfaction) का अध्ययन करना है. यह शोध स‍िर्फ लैब तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके जरिए बीमारियों को फैलने से रोकने और सार्वजनिक स्वास्थ्य रणनीतियों को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है.

लैब से बाहर भी क‍िया कमाल
न्यूरोसाइंस के अलावा, गुप्ता ने मेंटल हेल्थ के क्षेत्र में भी इनोवेशन क‍िया है. वे ‘ट्रेडविल’ जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के विकास में शामिल रहे हैं, जो कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (CBT) पर आधारित है. उनका उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाना है.

न‍ित‍िन गुप्ता का सफर उनकी जिज्ञासा का परिणाम है. कंप्यूटर साइंस से कंप्यूटेशनल बायोलॉजी और फिर न्यूरोसाइंस तक उनका करियर पारंपरिक लीक पर चलने के बजाय मौलिक सवालों को खोजने की इच्छा से बना है. उनका काम आज भी एक ही विचार के इर्द-गिर्द घूमता है: यह समझना कि दिमाग कैसे संकेतों को व्यवहार में बदलता है.

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