राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के लिए मजबूर करने की योजना बनाई है, जिसके लिए वे जलडमरूमध्य की नाकाबंदी करेंगे. 12 अप्रैल को ईरान और अमेरिका के बीच इस्लामाबाद में हुई 21 घंटे की शांति वार्ता के विफल होने के तुरंत बाद, ट्रंप ने कहा कि वह ‘होर्मुज जलडमरूमध्य में प्रवेश करने या वहां से निकलने की कोशिश करने वाले किसी भी और सभी जहाजों की नाकाबंदी’ करेंगे. वह एक प्राचीन समुद्री रणनीति चोक पॉइंट वॉरफेयर (choke point warfare) का जवाब दूसरी क्लासिक नौसैनिक नाकाबंदी से दे रहे थे.

यह ईरान-अमेरिका युद्ध के एक नए चरण की शुरुआत है, जो 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल हवाई अभियान के साथ छिड़ा था.

13 अप्रैल को अमेरिकी केंद्रीय कमान (CENTCOM) के एक बयान में स्पष्ट किया गया कि नाकाबंदी केवल ईरानी बंदरगाहों में प्रवेश करने और बाहर निकलने वाले समुद्री यातायात के लिए थी. अमेरिकी नौसेना की 2022 की नियमावली के अनुसार, ‘नाकाबंदी’ (Blockade) एक ऐसी सैन्य कार्रवाई है, जिसमें किसी दुश्मन देश के बंदरगाहों, हवाई अड्डों या तटों की घेराबंदी कर दी जाती है. इसका मकसद किसी भी देश के जहाज या विमान को वहां आने-जाने से पूरी तरह रोकना होता है.

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अमेरिका का क्या प्लान?

ट्रंप ने कहा कि ईरान ने वार्ता की मुख्य पूर्व शर्त का उल्लंघन किया है जो कि होर्मुज जलडमरूमध्य को खुला रखने की शर्त थी. ईरान ने जलडमरूमध्य को फिर से खोला तो सही, लेकिन एक नई चाल के साथ.

ईरानी अधिकारियों ने जहाजों को ईरानी क्षेत्रीय जलक्षेत्र (territorial waters) के भीतर स्थित क्युशम (Qeshm) और लारक (Larak) द्वीपों के बीच से होकर एक नए शिपिंग कॉरिडोर का उपयोग करने की सलाह दी. ईरान ने इसके पीछे मानक अंतरराष्ट्रीय शिपिंग लेन में समुद्री सुरंगों के खतरों का हवाला दिया.

जाहिर है, ये सुरंगें ईरान द्वारा ही बिछाई गई थीं, जब अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी को अपने हमले शुरू किए थे. शिपिंग अधिकारी इस नए मार्ग को ‘तेहरान टोल बूथ’ कह रहे हैं और उनका मानना है कि ईरान जलडमरूमध्य में प्रवेश करने या वहां से बाहर निकलने वाले जहाजों से टोल वसूल रहा है.

युद्धविराम के बाद से एक दर्जन से भी कम व्यापारिक जहाजों ने इस नए मार्ग को पार किया है. यह स्पष्ट नहीं है कि उन्होंने ईरान को टोल का भुगतान किया है या नहीं. अमेरिका का लक्ष्य अब एक ‘जवाबी नाकाबंदी’ करना है. वह ईरानी बंदरगाहों में प्रवेश करने या वहां से निकलने वाले जहाजों को रोकेगा, जबकि जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों के लिए इस रास्ते को खुला रखेगा.

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13 अप्रैल के CENTCOM के बयान में कहा गया कि यह नाकाबंदी ‘ईरानी बंदरगाहों और तटीय क्षेत्रों में प्रवेश करने या वहां से निकलने वाले सभी देशों के जहाजों के खिलाफ निष्पक्ष रूप से लागू की जाएगी, जिसमें अरब की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के सभी ईरानी बंदरगाह शामिल हैं. सेंटकॉम उन जहाजों को नहीं रोकेगी जो होर्मुज जलडमरूमध्य का इस्तेमाल उन बंदरगाहों पर जाने के लिए कर रहे हैं जो ईरान के नहीं हैं. यानी, दूसरे देशों के व्यापारिक जहाजों के आने-जाने पर कोई रोक नहीं लगाई जाएगी.

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण ‘एनर्जी लाइफलाइन’ है. दुनिया का 20 प्रतिशत से अधिक तेल और गैस इसी संकरे जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है. इस ऊर्जा प्रवाह का बड़ा हिस्सा पूर्व की ओर भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे दुनिया के सबसे बड़े तेल उपभोक्ता देशों को जाता है. अमेरिका और यूरोप इस मार्ग से आने वाली ऊर्जा पर कम निर्भर हैं, लेकिन खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के छह में से कम से कम पांच देश अपने अस्तित्व के लिए इसी जलडमरूमध्य पर निर्भर हैं.

ईरान और ओमान फारस की खाड़ी के केवल दो ऐसे देश हैं जिनकी पहुंच अरब सागर तक है. ईरान तेल और गैस के निर्यात के लिए समुद्री मार्गों पर निर्भर है. साथ ही, हालिया अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, वह चीन से ‘सोडियम पेट्रोक्लोरेट’ जैसे प्रीकर्सर रसायनों के आयात के लिए भी इन्हीं रास्तों का उपयोग करता है, जिनका इस्तेमाल बैलिस्टिक मिसाइलों के ठोस बूस्टर ईंधन बनाने के लिए किया जाता है. अमेरिका की यह नाकाबंदी ईरान को एक ‘लैंड-लॉक्ड’ देश बना देगी.

अमेरिका इस नाकाबंदी को कैसे लागू करेगा?

अमेरिकी नौसेना को दो काम करने होंगे अंतरराष्ट्रीय शिपिंग चैनल में ईरान द्वारा बिछाई गई समुद्री सुरंगों को नष्ट करना, और ईरानी बंदरगाहों में आने-जाने वाले जहाजों को रोकने के लिए अपनी सेना तैनात करना.

12 अप्रैल को अमेरिकी नौसेना के दो युद्धपोतों ने जलडमरूमध्य को पार किया और सुरंग हटाने का अभियान चलाया. 28 फरवरी को युद्ध शुरू होने के बाद से जलडमरूमध्य को पार करने वाले ये पहले अमेरिकी युद्धपोत हैं. अमेरिकी नौसेना ने कहा कि वह सुरंग हटाने के कार्यों के लिए अंडरवाटर ड्रोन सहित अतिरिक्त यूनिट्स को इस क्षेत्र में भेजेगी. अरब सागर में अमेरिका के पास यूएसएस अब्राहम लिंकन कैरियर स्ट्राइक ग्रुप (CSG) और यूएसएस इवो जिमा एम्फीबियस रेडी ग्रुप (ARG) मौजूद हैं.

इन इकाइयों में यूएसएस रोनाल्ड रीगन सीएसजी और यूएसएस बॉक्सर एआरजी भी शामिल हो जाएंगी. इससे ट्रंप को दो सीएसजी और दो एआरजी मिल जाएंगी, जिनमें 20 से अधिक युद्धपोत और 200 से अधिक विमान शामिल हैं, जिनका उपयोग बारूदी सुरंगों को हटाने और नाकाबंदी करने के लिए किया जा सकता है.

ईरान इस पर क्या प्रतिक्रिया देगा?

आधुनिक पनडुब्बी युद्ध (submarine warfare) का जन्म नौसैनिक नाकाबंदी के दौरान ही हुआ था. अमेरिकी गृहयुद्ध (1861-1865) के समय ‘यूनियन’ ने नाकाबंदी लागू करने के लिए ‘कॉन्फेडरेट’ बंदरगाहों के तट पर युद्धपोत तैनात कर उनकी घेराबंदी कर दी थी. 1864 में, चार्लस्टन हार्बर में एक कॉन्फेडरेट पनडुब्बी ‘HL हनली’ (HL Hunley) ने ‘स्पार टॉरपीडो’ (विस्फोटक लगा एक हारपून) से ‘USS हौसाटोनिक’ पर हमला किया था, इस हमले में हनली अपने सभी आठ चालक दल के सदस्यों के साथ डूब गई, लेकिन वह युद्ध में किसी युद्धपोत को सफलतापूर्वक डुबोने वाली पहली पनडुब्बी बनी.

दिलचस्प बात यह है कि ईरान के पास आज की ‘हनली’ कही जाने वाली करीब 20 छोटी ‘ग़दीर क्लास’ पनडुब्बियां हैं. इन्हें उत्तर कोरियाई मॉडल पर ईरान में ही तैयार किया गया है. 125 टन से अधिक वजनी इन पनडुब्बियों में 7 क्रू सदस्य होते हैं और ये दो 533 मिमी टॉरपीडो से लैस हैं. साथ ही, ईरान के तरकश में कई जहाज-रोधी मिसाइलें और ड्रोन भी शामिल हैं. ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वह अमेरिका की इस घेराबंदी को चुनौती देने की कोशिश करता है.

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‘एक जहाज का किले से लड़ना बेवकूफी है’, यह कहावत गलत तरीके से लॉर्ड होरेशियो नेल्सन के नाम दर्ज है. यह कहावत 18वीं शताब्दी के उन अनुभवों से निकली थी, जब रॉयल नेवी ने डच, स्पेनिश और फ्रांसीसी किलों से लड़ने की कोशिश की थी, जिसमें उन्हें अक्सर असफलता हाथ लगी.

ईरान के पास एक शक्तिशाली ‘किला’ है मिसाइलें, ड्रोन, समुद्री सुरंगें और गनबोट लेकिन उसके पास फारस की खाड़ी से दूर जाने वाले जहाजों की रक्षा करने की क्षमता नहीं है, क्योंकि उसकी अधिकांश समुद्री नौसेना अमेरिका द्वारा डुबो दी गई थी. अब वह केवल जलडमरूमध्य (strait) के करीब काम करने वाली अमेरिकी नौसेना को निशाना बनाने की उम्मीद कर सकता है. वह ऐसा कुछ भी कर सकता है जिसकी उसने अमेरिकी जमीनी हमले की स्थिति में धमकी दी थी, यानी ‘फ्री-फ्लोटिंग’ समुद्री सुरंगें छोड़ना, जो नौसैनिक युद्ध के सबसे विनाशकारी हथियारों में से एक हैं.

21वीं सदी की ‘जहाज बनाम किले’ की लड़ाई शुरू हो चुकी है.  एक तरफ ईरान की मिजेट पनडुब्बियां, सुरंगें, ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलें हैं, तो दूसरी तरफ दुनिया की सबसे शक्तिशाली नौसेना की ताकत. पूरी दुनिया बड़ी चिंता के साथ इस पर नजर रख रही है.

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