प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज 14 अप्रैल को उत्तराखंड पहुंच रहे हैं. इस मौके पर देहरादून और सहारनपुर बॉर्डर पर बने मां डाट काली मंदिर के दर्शन करने भी जाएंगे. पीएम मोदी इस मंदिर में पहली बार पहुंच रहे हैं. मां डाट काली का मंदिर का इतिहास लगभग 200 साल पुराना है.
यह मंदिर बहुत चमत्कारी माना जाता है. यहां दर्शन करने के साथ ही मनोकामना को लेकर श्रद्धालु सिर्फ उत्तराखंड ही नहीं, विदेशों से भी आते हैं. देवी काली को समर्पित यह मंदिर इलाके के पुराने मंदिरों में से एक है. देवी काली को हिंदू धर्म में दिव्य स्त्री शक्ति (शक्ति) का स्वरूप माना जाता है, जो उनका उग्र और ममता भरा दोनों ही स्वरूप है.
इसके अलावा देवी काली को प्रारंभ यानी शुरुआत की भी देवी माना जाता है. वह रास्ते की रक्षक देवी हैं और राहगीरों को भी सुरक्षा देती हैं. इसलिए उत्तराखंड के प्रवेश पर ही रास्ते के ठीक किनारे ही मां डाट काली का मंदिर है.
मंदिर की वास्तुकला और परंपरा
मंदिर की वास्तुकला स्थानीय पत्थर और लकड़ी से निर्मित है, जो इसे एक खास पारंपरिक रूप देती है. मुख्य गर्भगृह में देवी काली की काले पत्थर की मूर्ति स्थापित है. मंदिर चारों ओर हरियाली और सुंदर पहाड़ों से घिरा हुआ है, जो इसे शांत और आध्यात्मिक वातावरण प्रदान देता है.
हिंदुओं के लिए इस मंदिर का विशेष धार्मिक महत्व है. आज भी कई लोग नई गाड़ी खरीदने के बाद यहां आकर देवी का आशीर्वाद लेते हैं. इस दौरान पुजारी विशेष पूजा करते हैं, जिसमें गाड़ी पर काला धागा बांधा जाता है और नारियल चढ़ाया जाता है. “वाहन दुर्घटना यंत्र” नामक एक विशेष यंत्र भी गाड़ी में लगाया जाता है, जो दुर्घटनाओं, नजर दोष और अन्य संकटों से सुरक्षा के लिए माना जाता है.
दुर्गा सप्तशती से कनेक्शन
दुर्गा सप्तशती में देवी का एक स्वरूप ऐसा भी है, जिसमें उन्हें सभी रास्तों की देवी और सभी वाहनों की देवी भी कहा गया है.
ज्ञान, कर्म, जो शुद्ध और उत्थानकारी और शाश्वत है, ज्ञान देता है।
बुला बुला प्रेमा सभी वाहन
इसलिए सभी प्रकार के वाहन देवी दुर्गा का ही रूप माने जाते हैं. आपने ध्यान दिया होगा कि ट्रक या बस के ड्राइवर्स अपने बस-ट्रक को बहुत सजाते हैं. उन्हें काली चोटी, परांदा, चुनरी, लहरिया, फूल-माला आदि से सजाते हैं. इसके साथ ही वह काली स्वरूप का एक मुखौटा ट्रक या बस के आगे लगाते हैं. पीछे की ओर कीर्तिमुख नाम के दैत्य की तस्वीर लगाकर ‘बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला’ लिखते हैं. यह मंदिर देवी के इसी वाहन स्वरूप का भी माना जाता है. इसीलिए यहां नए वाहन की पूजा होती है.

लोग घर, मकान, जमीन आदि भी खरीदकर यहां देवी की पूजा करने पहुंचते हैं. लोगों की मान्यता है कि देवी उनके निर्माण कार्यों को पूरा कराती हैं और उसकी रक्षा-सुरक्षा भी करती हैं.
कैसे पड़ा नाम ‘डाट काली मंदिर’
‘डाट’ शब्द का अर्थ ‘दांत’ होता है. इस मंदिर का नाम देवी काली के उग्र रूप से जुड़ा है, जिसमें उनके दांत बाहर निकले हुए दर्शाए जाते हैं. स्थानीय लोग बताते हैं कि मंदिर का प्राचीन नाम दंतकाली मंदिर है, लेकिन अंग्रेज अफसर संस्कृत में इसका उच्चारण नहीं कर पाते थे जिससे इसका नाम डाट काली पड़ गया. इस मंदिर की स्थापना 30 जून 1804 को हुई थी. यह मंदिर देहरादून-सहारनपुर हाईवे के निर्माण के दौरान स्थापित किया गया था.
एक लोककथा के अनुसार, जब एक इंजीनियर इस हाईवे परियोजना पर काम कर रहा था, तो उसे सपने में देवी काली के दर्शन हुए. देवी ने उसे अपनी मूर्ति देकर उसी स्थान पर मंदिर बनाने का निर्देश दिया. इसके बाद इंजीनियर ने यह मूर्ति मेहनत सुखबीर गुसाईं को दी, जिन्होंने मंदिर का निर्माण कराया और इसका नाम डाट काली मंदिर रखा.
अक्टूबर से फरवरी के बीच यहां आने का सबसे अच्छा समय माना जाता है. इस दौरान देहरादून का मौसम सुहावना रहता है और तापमान लगभग 10 से 25 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है. इन महीनों में नवरात्रि का पर्व भी आता है, जिसे मंदिर में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है.
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