परिसीमन के लिए महिला आरक्षण का जाल, क्या मोदी सरकार के दांव में फंसेगा विपक्ष? – women reservation modi parliament delimitation assembly elections ntcpmr


बिहार में नई सरकार बन चुकी है. और, अब बचे हुए दो राज्यों में विधानसभा चुनाव के लिए वोटिंग से पहले, 16 अप्रैल को संसद का विशेष सत्र शुरू होने जा रहा है. केंद्र की बीजेपी सरकार ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को 2029 के आम चुनाव से लागू करने के लिए तीन दिनों के संसद सत्र में तीन संशोधन विधेयक लाने वाली है.

2029 के लोकसभा चुनाव में महिला आरक्षण कानून लागू हो जाने के बाद लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 की जा सकती है. रिपोर्ट के अनुसार, राज्यों के लिए 815 सीटें और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 35 सीटें प्रस्तावित हैं. फिलहाल लोकसभा में सीटों की संख्या 543 है.

नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण मिलने वाला है. अब तक जो बातें मालूम हुई हैं उनके अनुसार, बढ़ी हुई सीटें महिलाओं के हिस्से में ही जाएंगी – और बढ़ी हुई ये सीटें 300 से ज्यादा होने वाली हैं.

मोदी की महिलाओं से अपील

16, 17 और 18 अप्रैल को चलने वाले संसद के विशेष सत्र में तीन संशोधन विधेयक लाए जा रहे हैं. ये तीन विधेयक हैं – संविधान (131वां संशोधन) बिल, परिसीमन विधेयक (संशोधन) और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) बिल, 2026 – बिल का ड्राफ्ट सभी सांसदों को भेजा गया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा और राज्यसभा के सभी संसदीय दलों के नेताओं को पत्र लिखकर नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण कानून) के संशोधन पर पूर्ण समर्थन की अपील की है. प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पत्र में लिखा है, 16 अप्रैल से देश की संसद में नारी शक्ति वंदन अधिनियम से जुड़ी ऐतिहासिक चर्चा होने जा रही है. यह विशेष बैठक हमारे लोकतंत्र को और मजबूत बनाने का अवसर है. यह सबको साथ लेकर चलने की हम सभी की प्रतिबद्धता को दोहराने का अवसर है. इसी भावना और उद्देश्य से मैं आपको यह पत्र लिख रहा हूं.

प्रधानमंत्री मोदी लिखते हैं, यह बैठक एक साथ आगे बढ़ने और सबको साथ लेकर चलने की हमारी सामूहिक प्रतिबद्धता को दोहराने का क्षण है. कहा है, भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के अपने सपने को साकार करने के लिए यह आवश्यक है कि महिलाएं इस यात्रा में बड़ी और सक्रिय भूमिका निभाएं.

सोशल साइट X पर एक पोस्ट में मोदी ने लिखा है, यहां भारत की नारी शक्ति के नाम मेरा पत्र है, जिसमें मैं उस वादे को पूरा करने की हमारी प्रतिबद्धता दोहरा रहा हूं, जो दशकों से लंबित था… मैंने अपने साथी नागरिकों के साथ उस संकल्प को जल्द ही साकार करने के विषय पर अपने विचार साझा किए हैं.

1. ‘मैं आपसे आग्रह करता हूं कि अपने सांसदों को पत्र लिखें, और इस ऐतिहासिक संसद सत्र में हिस्सा लेते समय उनका हौसला बढ़ाएं.’

2. ‘जब महिलाएं कई क्षेत्रों में बेहतरीन काम कर रही हैं, तो यह बिल्कुल सही है कि विधायी संस्थाओं में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़े.’

3. ‘2029 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव महिलाओं के लिए पूरे आरक्षण के साथ होते हैं, तो लोकतंत्र और भी ज्यादा मजबूत हो जाएगा.’

महिला आरक्षण 2029 से लागू करने का प्रयास

1. महिला आरक्षण कानून की मौजूदा स्थिति को बरकरार रखते हुए SC/ST आरक्षण को पहले की तरह जारी रखा गया है, लेकिन OBC आरक्षण के लिए अलग से कोई प्रावधान नहीं किया गया है. ध्यान रहे, ओबीसी आरक्षण की डिमांड के कारण ही महिला आरक्षण बिल बरसों लटका रहा.

2. विधेयक में अनुच्छेद 81 में संशोधन का प्रस्ताव भी शामिल है. यह इसलिए ताकि 1971 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों की संख्या पर लगी रोक को हटाया जा सके. इसी के चलते 1976 से ही लोकसभा की सीटें नहीं बढ़ाई जा सकी हैं.

3. रिपोर्ट के मुताबिक, विधेयकों के उद्देश्य में कहा गया है कि परिसीमन की प्रक्रिया लेटेस्ट जनगणना के आधार पर होगी. मतलब, 2011 की जनगणना के आधार पर होगी, क्योंकि आखिरी प्रकाशित जनगणना वही है – और यही वो मसला है जो दक्षिण के राज्यों में बिल के विरोध की वजह बन रहा है.

विरोध किस बात का हो रहा है

महिला आरक्षण संशोधन बिल का बीएसपी नेता मायावती से लेकर पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल तक ने समर्थन किया है. लेकिन, कांग्रेस सहित दक्षिण भारत के कई नेता कड़ा विरोध जता रहे हैं. विरोध करने वालों में तो ममता बनर्जी भी शामिल हैं.

असल में विरोध महिला आरक्षण कानून में संशोधन का नहीं, बल्कि उसे 2029 तक लागू करने के लिए परिसीमन के लिए लाए जा रहे संशोधन विधेयक के खिलाफ है. तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने पत्र लिखकर एमके स्टालिन, चंद्रबाबू नायडू, सिद्धारमैया, पिनाराई विजयन और एन. रंगास्वामी से एकजुट होने की अपील की है – विरोध के कड़े तेवर तो तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने दिखाया है.

एक वीडियो संदेश में एमके स्टालिन ने कहा है, राज्य सरकारों से सलाह किए बगैर परिसीमन को आगे बढ़ाने की कोशिश लोकतंत्र पर हमला है. स्टालिन का कहना है, जब केंद्र सरकार ने हमसे जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण, छोटे परिवार रखने और परिवार नियोजन के उपाय अपनाने को कहा, तो हमने (तमिलनाडु) उसका पालन किया. क्या अब अनुशासित तरीके से काम करने की यही सजा मिल रही है?

केरल से सीपीएम सांसद जॉन ब्रिटास ने अलग ही आशंका जताई है. उनका कहना है, लोकसभा सीटें 543 से 816 किए जाने पर दक्षिण भारत को 63-65 और उत्तर को 200 से ज्यादा सीटें मिलेंगी, जिससे बैलेंस बिगड़ सकता है.

केंद्र को स्पष्ट शब्दों में चेतावनी देते हुए स्टालिन ने कहा है, अगर परिसीमन से तमिलनाडु को नुकसान हुआ या उत्तर भारत की राजनीतिक ताकत बढ़ाई गई तो तमिलनाडु ठहर जाएगा, हर परिवार सड़कों पर उतरेगा. अगर जरूरत पड़ी तो वैसा ही आंदोलन होगा जैसा 50-60 के दशक में डीएमके ने किया था. हम चुप नहीं बैठेंगे. यह आखिरी चेतावनी है. तमिलनाडु लड़ेगा और जीतेगा.

क्या विरोध बीजेपी के लिए नुकसानदेह है

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन के तेवर सख्त होने की वजह विधानसभा के चुनाव भी हैं. स्टालिन की पार्टी डीएमके की विरोधी AIADMK और बीजेपी का गठबंधन करके चुनाव लड़ रहे हैं. कड़ा विरोध स्टालिन को चुनावों में फायदा दिला सकता है. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने परिसीमन विधेयक को बंगाल को बांटने की साजिश करार दिया है.

कांग्रेस भी चुनावों के बीच संसद सत्र बढ़ाकर महिला बिल लाने का विरोध कर रही है. सोनिया गांधी ने अखबार में लेख लिखा है, और मोर्चे पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे डटे हुए हैं. मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री मोदी के पत्र के जवाब में कहा कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम को संसद द्वारा पारित किए हुए 30 महीने हो चुके हैं, और यह विशेष सत्र विपक्ष को विश्वास में लिए बिना बुलाया गया है. मल्लिकार्जुन खड़गे का कहना है कि परिसीमन और अन्य विवरण के बिना, इस ऐतिहासिक कानून पर कोई भी सार्थक चर्चा करना असंभव होगा.

कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे का कहना है कि विपक्षी दल सरकार से 29 अप्रैल को चुनाव खत्म होने के बाद परिसीमन के मुद्दे पर चर्चा के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग कर रहे हैं. मल्लिकार्जुन खड़गे का आरोप है कि सरकार महिलाओं को वास्तव में सशक्त बनाने के बजाय राजनीतिक फायदे के लिए महिला कानून लागू करने में जल्दबाजी कर रही है.

1. अनुच्छेद 368 के अनुसार, संविधान में बदलाव से जुड़े बिल पास कराने के लिए विशेष बहुमत की जरूरत होती है. विशेष बहुमत से आशय, सदन की कुल संख्या का बहुमत और वोटिंग कर रहे सदस्यों की दो तिहाई संख्या है.

2. प्रस्तावित तीन बिलों में से एक 131वां संविधान संशोधन बिल है. संविधान संशोधन बिल को पास करवाने के लिए दोनों सदनों में विशेष बहुमत की जरूरत होगी. संख्या बल को देखें तो लोकसभा में सरकार के सामने चुनौती खड़ी हो सकती है. हां, बाकी दोनों बिलों को पास कराने के लिए महज 50 फीसदी बहुमत की जरूरत होगी, जो सरकार के पास दोनों सदनों में है.

अब अगर विपक्ष के असहयोग आंदोलन की वजह से महिला आरक्षण कानून 2029 के आम चुनाव में लागू नहीं हो पाता, तो बीजेपी को यह बोलने का मौका मिल जाएगा कि विपक्ष महिलाओं के लिए काम नहीं करने दे रहा है. ठीक वैसे ही जैसे बीजेपी कांग्रेस पर राम मंदिर निर्माण से लेकर देश की तरक्की के रास्ते में बाधा डालने का आरोप लगाती रही है – देखा जाए, तो महिला कानून का पास हो जाना, और न हो पाना दोनों ही स्थितियां केंद्र में सत्ताधारी बीजेपी के लिए फायदेमंद है.

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